शादी के बाद लड़की अपना सरनेम क्यों बदले?

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शादी के बाद लड़कियां अक्सर अपना सरनेम बदल लेती हैं.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है, इसकी क्या ज़रूरत है या फिर ये केवल परंपरा के नाम पर होता है. कुछ लोग इसे पुरुषों के वर्चस्व से भी जोड़कर देखते हैं.
बीबीसी रेडियो-3 और आर्ट्स एंड ह्यूमनिटिज़ रिसर्च काउंसिल (एएचआरसी) की ओर से साल 2014 के लिए 'न्यू जेनरेशन थिंकर' का दर्जा पाने वाली डॉक्टर सोफ़ी कोलम्बेयू सवाल करती हैं, परंपरा के तहत शादी के बात पत्नियों को पति का नाम क्यों लेना चाहिए?
सोफ़ी कोलम्बेयू का लेख
मेरा नाम सोफ़ी कोलम्बेयू है. लेकिन अब से एक साल बाद, अगर मेरी शादी टूटती है तो यह कुछ और हो सकता है. मेरे लिए अपने पति का नाम लेना और अपना नाम ख़त्म करना बेहद गंभीर मुद्दा है, कि यह मेरी पहचान को किस तरह प्रभावित करता है.

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एक तरफ़ यह हमें परिवार के सूत्र में पिरोता है और यदि हमें कभी बच्चे होते हैं तो जन्म प्रमाण पत्र पर क्या नाम होना चाहिए, इसे आसान बनाता है, लेकिन दूसरी तरफ़ यह मुझे पहले और सबसे पहले पत्नी बनाता है, जबकि मेरे पति की पहचान पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.
1994 में यूरोबैरोमीटर के एक सर्वे में दावा किया गया था कि 94 प्रतिशत ब्रितानी महिलाएं शादी के बाद अपने पति का नाम अपना लेती हैं.
हालाँकि पिछले दो दशकों में इस आंकड़े में कुछ कमी आई है. ये महिलाएं ख़ासकर उच्च शिक्षित और युवा थीं. वर्ष 2013 में हुए सर्वे में पाया गया कि 75 प्रतिशत महिलाओं ने शादी के बाद अपने पति का नाम अपनाया.
क्योंकि ब्रिटेन के क़ानून के मुताबिक़ आप ख़ुद को जो भी नाम देना चाहें दे सकते हैं (बशर्ते आप कोई जालसाज़ी न कर रहे हों) में ऐसे सर्वे से किसी ख़ास निष्कर्ष पर पहुंचना बहुत कठिन है.
लोगों की भावनाएँ

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लेकिन एक मोटा अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ब्रिटेन में दो-तिहाई महिलाएं अब भी खुद को अपने पति के नाम से पेश करती हैं और दस्तावेज़ों पर अपने पति का सरनेम लिखती हैं.
वैसे ये इतना आसान भी नहीं होता है. सरनेम बदलने को लेकर लोगों की भावनाएं जुड़ी होती हैं. हाल ही में जॉर्ज क्लूनी से शादी करने पर नाम बदलने के अमल अमलुद्दीन के फ़ैसले की आलोचना हुई थी.
महिलाओं के हक़ के लिए लड़ने वाले लोगों का कहना है कि सरनेम बदलने से लड़कियों के करियर पर भी फ़र्क़ पड़ता है.
परंपरा के साथ

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कुछ लोगों का कहना है कि औरतें नाम बदलकर पति के प्रति अपना समर्पण जाहिर करती हैं और एक तरह से अपने ही बच्चों के सामने इस विचार को मान्यता देती हुई दिखती हैं कि महिलाएँ पुरुषों से कमतर हैं.
लेकिन एक तबका ऐसा भी है जो इस पहलू को सिरे से ख़ारिज कर देता है. वे यह कहते हैं कि जन्म से मिला नाम भी तो पिता का दिया होता है.
जो लोग ये सोचते हैं कि लड़कियों को शादी के बाद नाम बदल लेना चाहिए, अक्सर ये कहते सुने जाते हैं कि यह बात बहुत मायने नहीं रखती है. लेकिन जब उन्हें विकल्प दिया जाता है तो वे परंपरा के साथ चलना पसंद करते हैं.
क़ानूनी मान्यता

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हालांकि ये कोई सीधी सपाट बहस भी नहीं है. इसकी जड़ें कोई हज़ार साल पुरानी रवायत में खोजी जा सकती है. ब्रिटेन की बात करें तो उनके यहां यह चलन फ्रांस से आया था.
इस बात को क़ानूनी मान्यता थी कि शादी के बाद लड़की अपनी पति की संपत्ति हो जाती है और साल 1340 में एक अदालत ने कुछ इन शब्दों में यह बात कही थी, "जब कोई औरत एक पति चुन लेती है तो वह हर सरनेम खो देती है. उसका बस 'वाइफ़ ऑफ़' या '.... की पत्नी' का दर्जा रह जाता है."
लेकिन बाद के दौर में क़ानून के जानकार हेनरी डे ब्रैक्टन ने कहा कि शादी के बाद औरत और मर्द अलग-अलग नहीं होते बल्कि वे एक इकाई की तरह होते हैं.

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इस बीच क्लर्कों के द्वारा महिलाओं को उनके पति के सरनेम से बुलाने की आदत ने इस विचार को चलन में ला दिया. और महिलाएँ अपने पति का सरनेम अपनाने लगीं. यह उनके क़ानूनी और आध्यात्मिक एकता का प्रतीक था.
निजी तौर पर मुझे लगता है कि हर औरत को पति का सरनेम अपनाने का फ़ैसला अपने हक़ में करना चाहिए. मुझे भी ये लगा कि अपना सरनेम छोड़कर पति का सरनेम अपनाने का मतलब होगा कि सोफ़ी कोलम्बेयू नाम छोड़ना.
वो जो कुछ मैंने ज़िंदगी के तीस साल में हासिल किया था, सब छूट जाएगा. मैं बस अपने पति की पत्नी रह जाऊंगी. इसलिए मैं अपना सरनेम कोलम्बेयू जारी रखूंगी.
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