ओबामा को 'ज्ञान देने की होड़' मची

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- Author, ब्रजेश उपाध्याय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन से
ओबामा प्रशासन के अधिकारियों में उनकी नीतियों पर किताब लिखने और छपवाने की होड़ सी मची है.
ओबामा के कई पूर्व सहयोगियों को लग रहा है कि ये किताब लिखने का अच्छा मौक़ा है.
क्या कुछ ख़ास है, इन किताबों में, पढ़िए.
ब्रजेश उपाध्याय की डायरी
बचपन में अपने छोटे से शहर में रिक्शा पर बैठे, रुमाल लपेटे हुए माइक पर ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाकर माचिस बेचनेवाले उस आदमी के वो बोल अब भी याद हैं मुझे.
दमे से जकड़ी अपनी खड़खड़ाती आवाज़ में वो चिल्लाता था, “माचिस की है लूट, लूट सके तो लूट, नहीं तो रिक्शा जाएगा छूट.”
मुझे लगता है कुछ उसी तरह की आवाज़ इन दिनों ओबामा प्रशासन में काम कर चुके अधिकारियों के कानों में गूंज रही है.
मौक़े पर चौका
बस फ़र्क ये है कि लूट माचिस की नहीं, ओबामा की है.
रिक्शा छूटने में बस दो साल और रह गए हैं और सबको पता है कि इस मौक़े पर चौका नही लगाया तो फिर हाथ मलते रह जाएंगे.

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तो ओबामा के काम करने या फिर कुछ हद तक काम टालने के स्टाइल पर, उनकी पॉलिसी पर, उनकी विदेश नीति पर किताबें छापने की रेस लगी हुई है.
पहले रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स, फिर पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और अब सीआईए के पूर्व प्रमुख और 2013 तक रक्षा मंत्री रह चुके लियोन पनेटा.
सब एक ही मंत्र पर काम करते नज़र आ रहे हैं कि ओबामा के व्हाइट हाउस से निकलने से पहले, बस लिख डालो.
ओसामा हों या ओबामा, इराक़ हो या पाकिस्तान, इन सब पर जो भी याद आ जाए, बात नई हो या पुरानी, उसमें थोड़ा सा तड़का लगाओ और चेप डालो. किताब बिकेगी तो अभी, दो साल के बाद लिखोगे कोई नहीं पूछेगा.
हिट फॉर्मूला

किताब को मासूम सा जामा पहनाया जाता है. इस तरह कि लगे जैसे लिखने वाले ने अपने बारे में लिखा है, लेकिन हर पन्ना व्हाइट हाउस की तरफ़ खंजर मारता हुआ नज़र आता है.
हिट फॉर्मूला है,“मारो मगर प्यार से”. लिखने वाला ये भी कह देता है कि ओबामा का मेरे से बड़ा कोई शुभचिंतक नहीं है और उनकी भलाई के लिए ही मैंने ये किताब लिखी है!
सीरिया हो, इराक़ या फिर अफ़गानिस्तान, ये सारे मामले इन अधिकारियों की कमान में ही सरदर्द बन कर उभरे हैं.
अब ये सब एक ही सुर में अलापते हैं, हमने तो कहा था, किसी ने सुनी ही नहीं.
फ़ॉर्मूले की ख़ासियत ये भी है कि ओबामा के अलावा सबकी चांदी हो जाती है.
ज्ञान देने का मौका

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रिपब्लिकंस को बिन मांगे मसाला मिल जाता है, टीवी चैनल बिना कुछ खर्च किए घंटों तक एयरटाइम भर लेते हैं, अख़बारवालों को ओबामा को ज्ञान देने का मौक़ा मिल जाता है और सोशल मीडिया पर चुटकियां लेने का मौसम आ जाता है.
और बेचारे ओबामा दांत भींचकर रह जाते हैं. खुलकर जवाब दें तो मामला और खिंचेगा और न्यूज़ चक्र और लंबा चलेगा, तो दुभाषियों के ज़रिए थोड़ी बहुत बुदबुदाहट सुना दी जाती है और कोशिश होती है कि जल्द से जल्द कोई और ख़बर सामने आए और टीवी चैनल किताब की बात करना बंद करें.
मुझे तो लगता है कि ओबामा सोच रहे होंगे कि दो साल जल्दी से गुज़रें तो मैं भी किताब लिखूं और इन सब विभीषणों की पोल खोलूं.
हिलेरी के बारे में सोचते होंगे एक बार तुम बन जाओ राष्ट्रपति फिर मैं ज्ञान दूंगा कि दुनिया कैसे चलाई जाती है.
सुकून

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अब तो उन्हें ये डर भी सताता होगा कि कहीं कल के दिन जॉन केरी, चक हेगेल और जो बाइडन का इस्तीफ़ा न आ जाए.
क्योंकि इस्तीफ़ा देते ही उनका भी काम वही होगा, किताब लिख डालो.
सुना है दिसंबर में ओबामा अपनी कैबिनेट में कुछ नई बहाली करने वाले हैं.
इस बार बेहतर होगा पहले से ही करारनामा लिखवा लें कि अगले दो साल तक नौकरी में रहो या नहीं, किताब नहीं लिख सकते.
मुझे लगता है मोदी जी को ऐसे मौसम में ओबामा जी के लिए तोहफ़े के तौर पर गीता और गांधी जैसी किताबें नहीं लानी चाहिए थीं.
'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का' टाइप के गानों की रिकॉर्डिंग लेकर आते तो शायद ओबामा साहब को कुछ सुकून मिलता.
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