पाक फ़ौज कर रही है अल्पसंख्यकों को बेघर

- Author, अंबर शमसी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, रावलपिंडी
पाकिस्तान में रावलपिंडी के गैरिसन सिटी में 80 सालों से भी ज़्यादा वक़्त से रह रहे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को बेदख़ल किया जा रहा है.
सेना की इंजीनियरिंग शाखा फ्रंटियर वर्क ऑर्गनाइज़ेशन यहां मौजूद 53 झुग्गियों और हिंदुओं के मंदिर को तोड़कर छावनी और एक शैक्षणिक केंद्र बनाना चाहती है.
हालांकि हिंदू समुदाय के लोग इस जगह को छोड़ने को तैयार नहीं. इस वजह से उन्हें धमकियों का सामना भी करना पड़ रहा है.
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संसद में अल्पसंख्यक सदस्य असफ़न्दियार भंडारा की मदद से समुदाय के लोगों ने सेना की कार्रवाई पर अस्थायी रोक लगवाने में कामयाबी हासिल की है.
हालांकि, सेना ने अल्पसंख्क समुदाय के लोगों के पुनर्वास की पेशकश की है.
बीबीसी ने इस बारे में पाकिस्तानी सेना की मीडिया शाखा से संपर्क करने की कोशिश की, पर सेना ने कोई जवाब नहीं दिया.
'मैंने सेना के लिए काम किया'

85 साल के अल्लाह दित्ता एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी हैं. उनके साथ उनकी मां शर्फ़ो बीबी रहती हैं, जो क़रीब 100 साल की हैं.
शर्फ़ो बीबी कहती हैं, "मैंने सेना के लिए बर्तन साफ़ किए, सफ़ाई की, उनके लिए काम किया, वे हमें क्यों यहां से बाहर निकालना चाहते हैं? "

ग्रेसी लाइन में 52 हिंदू परिवार रहते हैं. समुदाय के नेता कहते हैं कि 1947 के बाद वो पाकिस्तान छोड़ सकते थे पर उन्होंने वहीं रहने का फ़ैसला किया.
भारत के साथ 1965 और 1971 की लड़ाई में भाग भी लिया.
'ब्रितानी हुकूमत के ज़माने से..'

60 वर्षीय शकुंतला 40 साल पहले शादी के बाद एबटाबाद से यहां आई थीं. वह कहती हैं, ''मेरे ससुराल वाले ग्रेसी लाइन में ब्रितानी हुकूमत के ज़माने से रह रहे हैं. हम इतना पैसा नहीं कमाते कि भाड़े का ख़र्च उठा सकें. हम कहां जाएंगे?''

अशोक चांद तीन बच्चों के पिता हैं. उनका कहना है, "कुछ अफ़सर हमें मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं. दबाव डालने के लिए वो कभी पानी की सप्लाई बंद कर देते हैं तो कभी बिजली काटने की धमकी देते हैं. हम सेना के रास्ते में नहीं आना चाहते क्योंकि सेना हमारी रक्षा करती आ रही है."
'सौहार्द्र टूट जाएगा'

हिंदू से ईसाई बने ख़ुर्रम शहज़ाद कहते हैं, "पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का वादा किया था और पाकिस्तान के झंडे में सफ़ेद रंग हम अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करता है. हम मंदिर के नज़दीक रहना चाहते हैं. जो समुदाय के लिए विशेष मायने रखता है.''
40 वर्षीय फ़रज़ाना अशरफ़ मुस्लिम महिला हैं. उनका कहना है कि अगर बस्ती तोड़ी गई तो उनकी सामाजिक ज़िंदगी ख़त्म हो जाएगी.
"हम एक दूसरे के धार्मिक त्यौहारों ईद, दीवाली और क्रिसमस में शामिल होते हैं. हिंदू हमारे साथ हमारी दरगाहों पर जाते हैं और हम उनके मंदिरों में जाते हैं. अगर हम उन्हें कहीं और भी जगह देते हैं तो भी यह सौहार्द्र टूट जाएगा.''
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