वो जिसने हिटलर को मारने की कोशिश की..

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- Author, एलेक्स लास्ट
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नाज़ी तानाशाह एडोल्फ़ हिटलर को हज़ारों लाखों लोगों की मौत का ज़िम्मेदार माना जाता है. लेकिन ऐसा नहीं है कि उस दौर में हिटलर की जान को कोई ख़तरा नहीं था. उन पर भी जानलेवा हमले हुए, हालाँकि ये हमले नाक़ाम रहे.
जर्मन सेना के पूर्व अधिकारी कर्नल क्लॉज़ वॉन स्टॉफ़नबर्ग हिटलर की हत्या की साजिश में शामिल थे. उन्होंने इसके लिए बक़ायदा तैयारी की.
हिटलर ने पूर्वी प्रश्या के जंगलों में वुल्फ़्स लायर नाम से कमांड पोस्ट बनाया था और इसकी सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी थी. इसी कमांड पोस्ट में हिटलर को मारने की कोशिश की गई जो ऐन वक्त पर विफ़ल हो गई.
कैसे रची गई और क्यों असफल रही हिटलर की हत्या की साज़िश पढ़ें विस्तार से
20 जुलाई 1944 को 36 वर्षीय क्लॉज़ वॉन स्टॉफ़नबर्ग वुल्फ़्स लायर पहुंचे. उनका मिशन था हिटलर की हत्या.

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हिटलर सैन्य अफ़सरों के साथ रोज़ बैठक करते थे और स्टफ़नबर्ग भी इसमें शिरकत करते थे.
1967 में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में जर्मनी के पूर्व सैन्य अधिकारी वॉल्टर वार्लिमॉन्ट ने उस घटना को याद करते हुए कहा था, "हम वहां खड़े थे और हिटलर के अंदर आने के साथ ही कॉन्फ्रेंस शुरू हो गई."
उन्होंने कहा, "अचानक दरवाज़ा एक बार फिर खुला. मैं पीछे मुड़ा तो मैंने देखा कि कर्नल अंदर आए....वो कुछ ख़ास थे क्योंकि उनकी दांई आंख काले पैच से ढकी थी और एक बांह कटी हुई थी. मुझे वो किसी सैनिक की तस्वीर जैसे लग रहे थे."
हिटलर भी मुड़े और उन्होंने बिना किसी दया भाव के कर्नल को देखा. फिर जरनल कीटेल ने हिटलर से कर्नल का परिचय कराया.
अब 80 साल के हो चुके स्टफ़नबर्ग के पुत्र बर्थोल्ड कहते हैं, "स्टफ़नबर्ग कुलीन, कैथलिक सैन्य अधिकारी थे. हर कोई कहता था कि मेरे पिता दिखने में बहुत सुंदर थे- लंबा कद, काले बाल, नीली आंखे. वह बहुत हंसमुख थे, खूब हंसा करते थे और हम मानते हैं कि वह बेहद शानदार थे."
साजिश
1943 में ट्यूनीशिया में तैनाती के दौरान स्टफ़नबर्ग बुरी तरह घायल हो गए थे, उन्हें अपनी एक आंख, दायां हाथ और बाएं हाथ की दो अंगुलियां गंवानी पड़ी थी.
स्टफनबर्ग जब चोटों से उबरे तो एक संगठन से उनसे संपर्क किया, इसका नेतृत्व जनरल हेनिंग ट्रेस्कोव कर रहे थे. इस संगठन का लक्ष्य हिटलर की हत्या और नाज़ी शासन को उखाड़ फेंकना था.
1944 में स्टफनबर्ग जर्मन रिप्लेसमेंट आर्मी के चीफ़ ऑफ़ स्टाफ बन गए. अब वह आसानी से हिटलर से मिल सकते थे और हत्या की साज़िश को अंजाम दे सकते थे.

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साज़िश के तहत स्टफ़नबर्ग को सुरक्षाचक्र को तोड़ते हुए ब्रीफ़केस में बम ले जाना था और डेली ब्रीफिंग के दौरान इसे जितना हो सके हिटलर के नज़दीक रखना था. इसके बाद किसी बहाने से कमरे से बाहर चले जाना था. विस्फ़ोट के बाद स्टफ़नबर्ग को बर्लिन लौट जाना था जहां रिप्लेसमेंट आर्मी को सत्ता अपने हाथ में ले लेनी थी.
20 जुलाई, गुरुवार का दिन था. स्टफनबर्ग वुल्फ़ लायर पहुंचे- ब्रीफिंग साढ़े 12 बजे होनी थी. बम लगाते हुए कुछ बाधा आई और वह अपने साथ सिर्फ एक ही विस्फ़ोटक ले जा सके.
वार्लिमॉन्ट ने 1967 में कहा था, "मुझे याद है स्टफ़नबर्ग अपने साथ काला ब्रीफ़केस लाए थे. लेकिन फिर मैंने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया. इसीलिए मैंने उन्हें मेज़ के नीचे ब्रीफ़केस रखते और इसके तुरंत बाद कमरा छोड़ते हुए नहीं देखा."
मिशन नाक़ाम

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लेकिन विस्फ़ोट से ठीक पहले, स्टफ़नबर्ग के ब्रीफ़केस को वहां से हटाकर मेज़ के पीछे रख दिया गया था. बम फ़टा ज़रूर, लेकिन यह बहुत असरकारक नहीं था. धमाके में हालांकि चार लोग मारे गए, लेकिन हिटलर बचने में कामयाब रहे.
स्टफ़नबर्ग और अन्य साज़िशकर्ताओं को बाद में बर्लिन के वार ऑफिस से गिरफ़्तार कर लिया गया और गोली से उड़ा दिया गया.
बर्थोल्ड की मां, दादी, दादा को गिरफ़्तार कर लिया गया, जबकि बर्थोल्ड और उनके भाई-बहनों को चिल्ड्रन होम भेज दिया गया.
इसके बाद बर्थोल्ड पश्चिमी जर्मनी कू सेना में जरनल बने. वो आज भी अपने पैतृक गांव में रहते हैं.
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