क्या बराक ओबामा की इराक़ नीति सही है?

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- Author, मार्क मैडल
- पदनाम, बीबीसी उत्तरी अमरीका संपादक
इराक़ पर चरमपंथियों के बढ़ते कब्ज़े के कारण अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की विदेश नीति संकट में नज़र आ रही है.
इराक़ में जो कुछ हो रहा है उससे आलोचकों को ओबामा की विदेश नीति को कमज़ोर साबित करने का एक और मौक़ा मिल गया है.
लेकिन इसे देखने का एक और नज़रिया है. और वो है कि ओबामा सही हैं.
'पर्याप्त प्रयास नहीं'
आलोचकों का कहना है - ओबामा ने युद्ध खत्म करने का दावा करने में जल्दबाज़ी की. ओबामा ने <link type="page"><caption> इराक़ी सरकार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/06/140612_iraq_baghdadi_profile_sr.shtml" platform="highweb"/></link> के अपने दम पर चरमपंथ से निपटने के क़ाबिल होने से पहले ही अमरीकी सेनाओं को वहाँ से वापस बुला लिया.
<link type="page"><caption> वह इराक़</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/06/140613_iraq_seize_new_towns_tk.shtml" platform="highweb"/></link> के साथ एक कामयाब सैन्य समझौता करने में विफल रहे. उन्होंने हालात से अपनी निगाहें फेर लीं. नागरिक समाज को प्रोत्साहित करने और एक अधिक संतुलित राजनीतिक उपाय के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए. वह आने वाले खतरे को भाँपने में विश्व की अगुवाई नहीं कर सके और एक सुसंगत प्रतिक्रिया नहीं दे पाए.
ओबामा की विदेश नीति का सिद्धांत कहता है कि <link type="page"><caption> अमरीका</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/06/140612_us_options_in_iraq.shtml" platform="highweb"/></link> तभी युद्ध के लिए जाएगा जब उसके या उसके सहयोगियों के महत्वपूर्ण हितों पर ख़तरा होगा.
हालांकि इराक़ एक सहयोगी है. मध्य पूर्व के बीच में एक ऐसा क्षेत्र जो संदिग्ध चरमपंथियों को पहनाह दे सकता है. बिल्कुल अफ़ग़ानिस्तान जैसा और ये अमरीका के लिए ख़तरा हो सकता है.
'एक पराजय'
इराक़ में युद्ध खत्म होने के दो साल बाद अमरीका वहां फिर से कुछ चौंकाने वाला कर सकता है. लेकिन ये विडंबना से अधिक एक तरह की नाकामी होगी.

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लेकिन अगर ओबामा की युक्तियों में कमी नज़र आती है, तो उनकी रणनीति क्या है?
यहां पर ज़रूरत है कि रक्षात्मक हुआ जाए लेकिन ये बात दुनियां का मज़बूत देश नहीं कह सकता.
अमरीका और पश्चिम के हस्तक्षेप से कुछ बहुत अच्छा नहीं होने वाला है. दरअसल सारी दिक्कत इसी से पैदा हुई हैं.
पहले विश्व युद्ध के बाद कच्चे तेल के लिए लालायित फ्रांस और ब्रिटेन ने ओटोमन साम्राज्य को आपस में बाँट लिया. इससे बाद फ्रांस के प्रभाव वाला सीरिया बना और ब्रिटेन के प्रभाव वाले इराक़ का निर्माण हुआ. बंटवारा करने वालों को लोगों के अहसासों, राष्ट्रीयता, क़बीले या धर्म में किसी तरह की दिलचस्पी नहीं थी.
जो देश आज ''बिखर रहे हैं'' उन्हें बाहरी ताकतों ने एकजुट कर रखा था.
इराक़ में जॉर्ज डब्लू बुश और टोनी ब्लेयर के हस्तक्षेप के कारण एक खतरनाक तानाशाह का तख्तापलट हुआ. लेकिन सद्दाम हुसैन एक धर्म निरपेक्ष तानाशाह थे जिसने अमरीका और उसके सहयोगियों के लिए असली ख़तरा बने धार्मिक चरमपंथियों पर लगाम कस रखी थी.
'युद्ध की ज़िम्मेदारी'
हो सकता है कि नीचे से उपजा दबाव हालात को बदल देता और वहां भी वही हश्र होता जैसा आज सीरिया में हो रहा है.
ये तूफ़ान तो यूँ भी आना था, लेकिन इराक़ के युद्ध की वजह से वह थोड़ा जल्दी आ गया और इसकी ज़िम्मेदारी पश्चिम पर डाली जा रही है. इसने इस्लामी जगत में और भी असंतोष पैदा किया है जिससे चरमपंथ को बल मिला है.
याद रखिए यह नज़रिया अधिक पसंद नहीं किया जाता. कई पत्रकार और बुद्धिजीवी हस्तक्षेप में यक़ीन रखते हैं और मानते हैं कि कुछ तो किया जाना चाहिए. चाहे वह जो कुछ भी हो.
इन लोगों का तालुक्क़ अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन से है. आप हस्तक्षेप का समर्थन ब्राज़ील या स्वीडन की तरफ़ से नहीं सुनते हैं.
यह साफ है कि ओबामा ने अमरीकी की इच्छा को विश्व पर नहीं थोपी है.
लेकिन यह बहुत साफ नहीं है कि एक मज़बूत और कड़क नीति इस मामले में बहुत कारगर होती.
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