चीन में 'आईफोन' और 'आईपैड' जैसे शब्दों पर विवाद

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- Author, युवान वू
- पदनाम, बीबीसी चाईनीज
आजकल चीन में लोग फोन पर बातचीत करते हुए ओके, कूल और बाय-बाय जैसे अंग्रेज़ी शब्दों का बार-बार इस्तेमाल करते हुए सुने जा सकते हैं.
चीनी पत्र-पत्रिकाओं में भी जीडीपी, डब्ल्यूटीओ, वाई-फ़ाई, सीईओ, एमबीए, वीआईपी और वायु प्रदूषण से जुड़े 'पीएम2.5' आदि अंग्रेज़ी के संक्षिप्त शब्द खूब प्रचलन में हैं.
'ज़ीरो ट्रांसलेशन' के इस चलन पर आजकल चीन में तेज़ बहस छिड़ी हुई है.
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक समाचार पत्र 'पीपल्स डेली' ने इस नए प्रचलन पर सबसे पहले निशाना साधते हुए "जीरो ट्रांसलेशन इतना प्रचलित क्यों हो रहा है?" शीर्षक से एक लेख छापा.
इस लेख में कहा गया, "यदि हम नोकिया और मोटरोला का अनुवाद कर सकते हैं तो आईफ़ोन और आईपैड का क्यों नहीं?"
'चीनी संस्कृति के लिए ख़तरा'
कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक समाचार पत्र 'पीपल्स डेली' को आपत्ति है कि आईफोन और आईपॉड जैसे <link type="page"><caption> विदेशी शब्दों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130627_japanese_english_sk.shtml" platform="highweb"/></link> का इस्तेमाल न केवल अख़बार और ऑनलाइन में बल्कि गंभीर विज्ञान पत्रिकाओं में भी धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है.

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'पीपल्स डेली' अपने लेख के जरिए कहता है कि इस तरह का प्रचलन चीनी भाषा की लय और इसकी संपूर्णता के लिए ख़तरनाक हैं. अख़बार मानता है कि चीनी भाषा में विदेशी शब्दों की घुसपैठ से चीन की समृद्ध संस्कृति और लोगों की समझ कमज़ोर होती है.
लेख में पूछा गया है, "ऐसे शब्दों को कितने लोग समझ सकते हैं?"
चीन में इसके पहले रडार, टैंक, चॉकलेट और कोकाकोला जैसे शब्दों का अनुवाद करते हुए इन्हें चीनी अक्षरों में यूं ढाला गया कि वे यहां की भाषा में घुल-मिल गए.
मगर अख़बार आगे लिखता है कि आज समस्या ये है कि चीन के लोग इन चुनिंदा प्रचलित अंग्रेज़ी शब्दों को जस के तस अपनी भाषा में इस्तेमाल कर रहे हैं, आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
बहुत से चीनी लोग अंग्रेज़ी बोलते हैं. बातचीत या लेखन में कई लोग चीनी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल करते हैं.
इंटरनेट ने अंग्रेज़ी को, ख़ासकर तकनीक और आविष्कार के क्षेत्र में लोकप्रिय बनाने में सबसे बड़ी भूमिका अदा की है. लोकप्रिय अमरीकी और ब्रितानी फिल्मों और टीवी ड्रामा के कारण भी लोग अंग्रेज़ी से ज़्यादा जुड़ रहे हैं.
'पीपल्स डेली' अंग्रेज़ी भाषा की लोकप्रियता के पीछे पश्चिम तौर-तरीकों और तकनीक के लिए दीवानगी, अच्छे अनुवादकों की कमी और आलस को मानता है.
राष्ट्रीय बहस

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वैसे चीनी भाषा की शुद्धता को लेकर उठा ये विवाद अपने आप में अकेला नहीं है, पहले भी ये राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन चुका है.
चीन में अमरीकी बास्केटबॉल बहुत पसंद किया जाता रहा है. इसके लिए सालों तक यहां टीवी पर 'एनबीए' शब्द का इस्तेमाल होता रहा. फिर साल 2010 में चीनी व्याख्या करते हुए इस पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया गया. इस पर खूब विवाद हुआ.
फिर साल 2012 में एनबीए को अन्य 200 से ज़्यादा विदेशी शब्दों की तरह ही 'चीन की मॉर्डन डिक्शनरी' में शामिल कर लिया गया.
उस समय करीब 100 बुद्धिजीवियों ने राष्ट्रीय प्रकाशन अधिकारियों को एक खुला ख़त लिखते हुए डिक्शनरी के संपादकों पर आरोप लगाया था कि वे चीन के नियम-कानून का उल्लंघन कर रहे हैं. उनका तर्क था कि अंग्रेज़ी के संक्षिप्त शब्द चीनी डिक्शनरी में शामिल करने से चीन की भाषा को भविष्य में काफ़ी नुकसान पहुंचेगा.
लंबी लड़ाई का आग़ाज़

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इन बुद्धिजीवियों की इस सोच पर सभी सहमत नहीं थे. उनका कहना था कि भाषा का अंतिम लक्ष्य है संवाद, और किसी भी भाषा को विदेशी भाषाओं के लिए अपने दरवाजे बंद नहीं करने चाहिए. उनका तर्क था कि एक डिक्शनरी संदर्भ के लिए और पाठकों की मदद के लिए होती है.
और अब साल 2014 में भाषाई प्रयोग राजनीतिक विषय बन गया है. पीपल्स डेली का कहना है, "अपनी भाषा और संस्कृति में भरोसे की कमी ये दिखाती है कि हम पश्चिम का अंधानुकरण कर रहे हैं."
अब ये सोचा जा रहा है कि सभी विदेशी भाषाओं का उचित चीनी भाषा में अनुवाद हो. विशेषज्ञों के अनुवाद पर सरकारी मुहर लगाने के पहले इस पर सार्वजनिक सहमति और परीक्षण किया जाए और लोग अपने पसंदीदा अनुवाद चुनें.
इसके विरोध में चीन के सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई है. ऐसा लगता है कि एक लंबी लड़ाई का आग़ाज़ हो चुका है.
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