भारतीय पत्रकार को डिजिटल सक्रियता पुरस्कार

सुभ्रांशु चौधरी
    • Author, अमरेश द्विवेदी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लंदन

भारतीय पत्रकार शुभ्रांशु चौधरी को ब्रिटेन में डिजिटल जर्नलिज़्म अवॉर्ड से नवाज़ा गया है. ये पुरस्कार उन्हें उनके ज़मीनी स्तर पर चलाए जा रहे ‘सीजीनेट स्वर’ नामक संचार अभियान के लिए दिया गया है.

उन्हें ये पुरस्कार लंदन स्थित संस्था इंडेक्स ऑन सेंसरशिप ने दिया है जो अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए अभियान चलाती है और हर साल बहादुर पत्रकारों, कलाकारों और डिजिटल को सम्मानित करती है.

<documentLink href="/hindi/multimedia/2014/03/140321_shubhranshu_chaudhary_audio_akd.shtml" document-type="audio"> शुभ्रांशु चौधरी से बातचीत</documentLink>

ऑनलाइन वोटिंग के आधार पर तय किए गए डिजिटल एक्टिविज़्म पुरस्कार की दौड़ में अमरीकी जासूस एडवर्ड स्नोडेन, चीनी सोशल नेटवर्क फ्री वीबो और टेल्स नामक ऑपरेटिंग सिस्टम भी नामित थे.

मोबाइल और कंप्यूटर के ज़रिए स्थानीय स्तर पर आदिवासी बहुल इलाकों में चलाए जानेवाले इस संचार प्लैटफॉर्म के ज़रिए शुभ्रांशु और उनकी टीम ने अभाव और ग़रीबी का सामना कर रहे आदिवासियों की आवाज़ बनने की कोशिश की है.

छत्तीसगढ़ में सीजीनेट स्वर की शुरुआत 2004 में हुई थी.

संचार का लोकतंत्रीकरण

सी जी नेट स्वरा
इमेज कैप्शन, 'सीजीनेट स्वर' से जुड़ी प्रशिक्षक महिलाओं को रिपोर्ट भेजने की ट्रेनिंग देती हुई.

पुरस्कार लेने के बाद बीबीसी से बात करते हुए शुभ्रांशु चौधरी ने कहा,“सीजीनेट स्वर एक कोशिश है मीडिया को लोकतांत्रिक करने की. यानी जिसकी कहानी है वो खुद उसे बताए, उसे किसी पत्रकार की ज़रूरत न रह जाए.”

उन्होंने बताया कि सीजीनेट स्वर मोबाइल और कंप्यूटर से जुड़ा एक स्थानीय स्तर का संचार नेटवर्क है जिसमें कोई व्यक्ति अपनी रिपोर्ट खुद रिकॉर्ड करवाता है.

इसके बाद संस्था से जुड़े कुछ मॉडरेटर तथ्यों की जांच कर उसका प्रकाशन करते हैं जिसके बाद नेटवर्क से जुड़े लोग एक नंबर डायल कर उसे कभी भी सुन सकते हैं.

शुभ्रांशु का कहना है कि इस अभियान को बड़े स्तर पर चलाने के लिए इसका रेडियो से जुड़ना ज़रूरी है.

लेकिन भारत सरकार रेडियो पर समाचारों के प्रसारण की अनुमति नहीं देती, इसलिए संचार के जनतंत्रीकरण का ये अभियान उतना व्यापक नहीं बन पा रहा.

उन्होंने कहा, "आज मीडिया को कुछ लोग नियंत्रित करते हैं और ऐसे में आम लोगों को या आदिवासियों को अपनी आवाज़ रखने का वैसा मौका नहीं मिल पा रहा जैसा इस तरह के प्रयास को व्यापक बनाने से उन्हें मिल सकता है."

लंदन में मिले अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार के बाद शुभ्रांशु ने उम्मीद जताई कि आनेवाले समय में संचार का और ज़्यादा लोकतंत्रीकरण होगा और आदिवासियों की छोटी-छोटी समस्याएं सुलझेंगी, बड़ी नहीं बन पाएंगी.

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