दुबई: मज़दूर जो राहत फ़तह के गाने गाते हैं

टेलीवीज़न चैनलों पर दिखने वाली प्रतिभा खोज प्रतियोगिताएं अब महज़ वहीं तक ही सीमित नहीं रहकर खाड़ी के मुल्कों के मज़दूर कैंपों तक जा पहुंची है जहां होने वाले ‘कैंप का चैंप’ टैलेंट कंपटीशन बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं.
पिछले दिनों दुबई में हुई एक ‘कैंप का चैंप’ प्रतियोगिता में लगभग 3,000 मज़दूरों ने हिस्सा लिया.
इन टैलेंट हंट कंपटीशन की थीम अधिकतर बॉलीवुड के गीतों के इर्द-गिर्द बुने जाते हैं और इनमें शामिल होने वालों से गानों के अलावा सवाल-जवाब के राउंड का भी इंतज़ाम किया जाता है.
लेबनान के फिल्म निर्माता महमूद कबोर ने इन टैलेंट कंपटीशन पर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाई है.
कैंप का जीवन
महमूद कबोर संयुक्त अरब अमीरात में पले-बढ़े हैं.
खाड़ी के दूसरे मुल्कों की तरह संयुक्त अरब अमीरात में दक्षिण एशिया के लाखों प्रवासी मज़दूर काम करते हैं. इनमें से ज्यादातर का ताल्लुक़ भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश से है.
ये मज़दूर परिवार को मुल्क में छोड़कर आते हैं और यहां अपने जैसे दूसरे लोगों के साथ कैंपों में रहते हैं. इन कैंपों में दूसरे किसी तरह के मनोरंजन का साधन नहीं होता.
ये कंपटीशन उन्हें मनोरंजन का मौक़ा देने के साथ-साथ उनके भीतर कामयाबी का एहसास भी पैदा करवाते हैं.
महमूद कबोर कहते हैं कि उन्हें एक बार शारजाह की एक प्रिंटिग प्रेस में काम करने का मौक़ा मिला.
वो कहते हैं, “ये प्रेस शारजाह के औद्योगिक क्षेत्र में मौजूद थी, जहां हर दिन लंच के समय मेरा सामना कामगारों के साथ कैफ़ेटेरिया या दूसरे छोटे रेस्तरां में होता था. मुझे उन्हें इतने क़रीब से देखने का मौक़ा दोबारा नहीं मिला.”
‘हमेशा आप से दूर’
महमूद कहते हैं, “वो खाड़ी के मुल्कों में हर जगह मौजूद हैं, सड़कें बनाते हुए, गढ्ढे खोदते हुए, बहुमंज़िला इमारतों के निर्माण में लगे लेकिन वो हमेशा आपको ख़ुद से कहीं दूर खड़े नज़र आते हैं. क्योंकि जैसे ही उनका काम ख़त्म होता है उन्हें बसों में भरकर शहर के बाहर बसे कैंपों में पहुंचा दिया जाता है.”
इसी दौरान एक अख़बार में छोटी सी ख़बर छपी कि वहां के अलग-अलग कैंपों में इस तरह की प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है.
गानों के अलावा कंपटीशन में कई बार अंताक्षरी को भी शामिल किया जाता है. शामिल होने वाले को गाने की एक पंक्ति सुनकर दूसरी लाइन गानी होती है.

इमेज स्रोत, AFP
महमूद कबोर का कहना है कि इन टैलेंट हंट ने उन्हें ये मौक़ा दिया कि वो इनके ज़रिए खाड़ी में काम करने वाले प्रवासी मज़दूरों के जीवन की कहानी कह पाएं.
वो कहते हैं कि सभी कैंप एक तरह के नहीं होते. कुछ की स्थिति अच्छी नहीं है और उनमें बहुत सुधार किया जा सकता है तो कुछ तो रहने के लिए काफ़ी बेहतर हैं.
अध्ययन का विषय
महमूद कबोर के मुताबिक़ ये कैंप सामूहिक जीवन के लिए एक तरह की स्टडी के समान हैं.
वो कहते हैं, “कई बार तो एक-एक कैंप में तीन-तीन हज़ार लोग होते हैं, एक ही रसोई में इनका खाना पकता है, पूरे कैंप में सिर्फ मर्द और मर्द ही नज़र आते हैं, एक ही कमरे में आठ-आठ लोग तक रह सकते हैं.”
वो बताते हैं, “ये एक बहुत अच्छा विषय था ये जानने के लिए कि बावजूद एक इस तरह की ज़िंदगी के जो काफ़ी मुश्किल है, क्या वजह है कि लोग यहां काम करने के लिए आते हैं?”
वो कहते हैं कि कई कहानियां बड़ी दिलचस्प थीं.
अदनान ने पाकिस्तान से आकर दुबई में सात साल तक काम किया. दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज ख़लीफ़ा के निर्माण में भी वो शामिल थे लेकिन उसके पूरा होने के बाद अदनान को वहां जाने का कभी मौक़ा ही नहीं मिला.
महमूद कबोर कहते हैं कि जब वो उन्हें फिल्म के सिलसिले में लेकर बुर्ज ख़लीफ़ा में गए तो वो अचंभित थे कि वो इमारत जो उन्होंने बनाई थी वो ऐसी दिखती है!
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