लाशें बरसों पहले से मिलती रही हैं: महिंदा राजपक्षे

मानवाधिकार हनन के आरोपों के बीच राष्ट्रमंडल राष्ट्राध्यक्षों की बैठक की अध्यक्षता को तैयार श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने कहा है कि इस मामले में उनके देश के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है.
राजपक्षे ने आलोचकों को जवाब देते हुए कहा है कि श्रीलंका में मौतें सिर्फ़ साल 2009 में नहीं हुईं जब सरकार ने तमिल विद्रोहियों को कुचला था बल्कि उससे 30 साल पहले से होती चली आ रही थीं.
उनका कहना है कि हर दिन 10-15 लाशें मिलती थीं जिनमें बच्चे और गर्भवती महिलाएं भी शामिल थीं, लेकिन तब किसी ने इसे मुद्दा नहीं बनाया.
राजपक्षे का कहना है कि ये सब बंद किया जा चुका है और अब कोई बमबारी नहीं हो रही है.
ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा था कि वह अपनी श्रीलंका यात्रा के दौरान मानवाधिकार मामले जैसे श्रीलंका की सेना के युद्ध अपराधों में शामिल होने पर कड़े सवाल उठाएंगे.

राजपक्षे ने इस पर प्रतिक्रिया देने से इंकार करते हुए कहा कि वो कैमरन से मुलाक़ात ज़रूर करेंगे और और उम्मीद है कि दोनों एक-दूसरे से कुछ सवाल करेंगे.
राजपक्षे ने कहा कि उनकी सरकार दोषियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए तैयार है, लेकिन इससे देश विभाजित नहीं होगा.
चोगम की तैयारी
श्रीलंका की राजधानी कोलंबों की गलियाँ इस बैठक के लिए पूरी तरह सजी हुई हैं.
लेकिन युद्ध अपराधों, मीडिया की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की स्वायत्तता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जैसे मुद्दों को लेकर विवाद बना हुआ है.
श्रीलंका में कुछ समय पहले हुई हिंसा की स्मृतियाँ अब धूमिल पड़ती जा रही हैं. बहुत से श्रीलंकाइयों को इस बात पर गर्व है कि राष्ट्रमंडल के नेता श्रीलंका आ रहे हैं.
कुछ लोग इसे राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम यानी एलटीटीई पर 26 साल बाद निर्णायक जीत हासिल करने का उपहार मान रहे हैं लेकिन चमक-दमक की ऊपरी परत के नीचे एक अशांति मौजूद है.

सम्मेलन में शामिल होने वालों की संख्या कम होती जा रही है. कनाडा के प्रधानमंत्री स्टीफेन हार्पर ने भी मानव अधिकारों के मसले पर इस सम्मेलन का बहिष्कार किया है.
भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा है कि वो श्रीलंका नहीं जाएँगे.
सेना की कार्रवाई
उत्तरी प्रांत में हाल ही हुए चुनावों के दौरान बीबीसी ने जाफना के बाहर एक राहत कैंप में रहने वाले 37 वर्षीय सुजीथरन से बात की थी.
सुजीथरन साल 1990 से ही कैंप में हैं. तमिल टाइगर्स और श्रीलंका सरकार के बीच चल रहे संघर्ष के कारण वो और उनका परिवार अपना घर छोड़ कर कैंप में चला गया था.
उनकी ज़मीन पर सेना का कब्ज़ा है. इस इलाके के तमाम खेतों की तरह सुजीथरन का खेत भी अति सुरक्षा क्षेत्र के अंदर था.
सुजीथरन का कहना है, "हम दोयम दर्जे के नागरिक की तरह जीते हैं. यहाँ कोई सुविधा नहीं है, बाथरूम नहीं है. यहाँ जीवन बहुत कठिन है. हमारे बच्चों को अपने घर पर जाकर रहना चाहिए."
सुजीथरन ने राजपक्षे को इस उम्मीद के साथ वोट दिया था कि उन्हें अपनी ज़मीन वापस मिल जाएगी.
लेकिन हाल के दिनों में उत्तर प्रांत में विरोधी तमिलों की जीत के बाद सेना ने इस इलाके में तोड़फोड़ का सिलसिला चला दिया है. जिन घरों को लोग छोड़कर भाग गए थे उन्हें सेना "सुरक्षा कारणों से" गिरा रही है.
जब पत्रकारों ने इस तोड़फोड़ की तस्वीर या वीडियो लेना चाहा तो सैनिकों ने उनके मेमोरी कार्ड जब्त करके उनके डाटा नष्ट कर दिया और उन्हें वहाँ से भगा दिया और तोड़फोड़ जारी रखी.
तमिल नागरिकों वाले इलाकों पर बमबारी करने के आरोपों, समर्पण करने वाले एलटीटीई के सदस्यों की हत्याओं और युद्ध अपराधों से जुड़े मामले भी अभी अनुत्तरित है.
एलटीटीई के ख़िलाफ़ भी गंभीर युद्ध अपराधों के आरोप थे लेकिन उनमें से ज़्यादातर मारे जा चुके हैं और चूंकि श्रीलंका सरकार अपनी कार्रवाई को न्यायोचित ठहरा रही है इसलिए उसके वर्तमान नेता चर्चाओं के केंद्र में हैं.
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