'फिर कभी ड्रोन की आवाज़ न सुनाई दे'

- Author, ब्रजेश उपाध्याय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन
इस हफ़्ते अमरीका ने दो नए चेहरे देखे. एक वो चेहरा जो अपने दफ़्तर में बैठ कर हज़ारों मील दूर छिपे चरमपंथियों पर निशाना लगाता है और दूसरा वो चेहरा जो अनजाने में उसका शिकार बनता है.
एक था मानसिक रूप से टूट चुके ब्रैंडन ब्रायंट का चेहरा जो ड्रोन ऑपरेटर के तौर पर काम करते थे, दूसरा ज़िंदगी और उम्मीद से भरपूर नबीला का चेहरा.
नौ साल की नबीला. मासूम, ख़ूबसूरत, नीली आंखें, सर पर रखे दुपट्टे के छोर को उंगलियों में लपेटती, कभी मुस्कराती, कभी बोर होकर उबासी लेती, कभी टेबल पर रखे कागज़ पर लकीरें खींचतीं नबीला. उत्तरी वज़ीरिस्तान से आई इस बच्ची ने एक साल पहले ड्रोन हमलों में अपनी दादी को खो दिया, ख़ुद भी घायल हुई लेकिन ज़िंदा बच गई.
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जब अमरीकी कांग्रेस के कुल पांच मेंबर और दुनियाभर की मीडिया के सामने नबीला अपनी कहानी पश्तो भाषा में सुना रही थी तो अंग्रेज़ी में उसका अनुवाद कर रही महिला का गला भर आया, आंखें नम हो गईं. वहां बैठी कुछ और महिलाओं की भी आंखें नम थीं. एक ने कहा, "मैं भगवान से मनाती हूं कि तुम्हें फिर कभी ड्रोन की आवाज़ न सुनाई दे."
वहां बैठा मैं एकटक नबीला को देख रहा था. अचानक से उनकी नज़र मुझ पर गई और जिस तरह से छोटे बच्चे कभी-कभी किसी अनजाने चेहरे को देखकर मुस्करा देते हैं, वैसे ही मुस्करा दीं.
चरमपंथी या बेगुनाह

कांग्रेस में काम करने वाली एक महिला ने उसके सामने आईसक्रीम के दो कप लाकर रखे. पहले वो झिझकी, फिर एक चम्मच से चखा और फिर से वही मुस्कान. मैं तबतक उसके बिल्कुल पास खड़ा था, पूछा... "अच्छी हैं आईसक्रीम? उसने कुछ नहीं कहा. सर झुकाकर खाती रही."
ये पहली बार था जब वो अपने गांव से निकली थी और सीधा वाशिंगटन पहुंची. मैने उसके भाई ज़ुबैर से पूछा, "नबीला को यहां कैसा लगा? जवाब था, 'ये बेहद खुश है. कहती है सड़कें कितनी चौड़ी हैं, लोग कितने प्यार से मिलते हैं."
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यही सड़कें उन दफ़्तरों तक भी जाती हैं जहां बैठकर कुछ लोग नबीला की दुनिया मे छिपे चरमपंथियों पर निशाना लगाते हैं.
ब्रैंडन ब्रायंट ड्रोन ऑपरेटर का काम करते थे. ख़तरनाक चरमपंथी हों या बेगुनाह लोग, अपने कंप्यूटर पर दिख रही जीती-जागती तस्वीरों को मांस के लोथड़ों में बदलता देखना उन्हें अंदर से कहीं तोड़ चुका है. वो मानसिक तनाव से ग्रस्त हैं.
उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "मैं जब अफ़गानिस्तान में एक मकान पर निशाना लगा रहा था तो कोई भागता हुआ नज़र आया. मुझे लगा कि कोई छोटा बच्चा है. एक और विशेषज्ञ की सलाह ली तो उसने कहा कि बच्चा नहीं कुत्ता है. हमला हुआ... मलबे की रिपोर्ट में न तो बच्चे का ज़िक्र था, न कुत्ते का."
तालिबान और अल क़ायदा

ब्रायंट ने नौकरी छोड़ दी है. उनके साथियों ने उनका मज़ाक भी उड़ाया. दूर से ही सही, किसी की जान लेना आसान काम नहीं होता. बल्कि कांग्रेस के एक सदस्य के शब्दों में "कौन जिएगा, कौन मरेगा, इसका फ़ैसला हम कर रहे होते हैं... जबकि ये फ़ैसला भगवान का होना चाहिए."
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इन दोनों चेहरों ने अमरीका की उलझन बढ़ा दी है. अबतक यहां एक ही सोच हावी रही है कि ये वो इलाका है जहां से तालिबान और अल क़ायदा दुनिया पर हमला करने की तैयारी करते हैं और ड्रोन से बेहतर कोई हथियार नहीं है इन्हें काबू में लाने के लिए. नबीला और ब्रैंडन ब्रायंट के चेहरों ने उस सोच पर सवाल उठाए हैं.
अब यहां ये बहस भी हो रही है कि जो ख़तरनाक चरमपंथी कहे जाते हैं उन्हें बिना किसी सुनवाई के मौत की सज़ा देना क्या सही है? दूसरी तरफ़ ये सवाल ये भी उठते हैं कि अगर चरमपंथी बेगुनाहों को मारने में नहीं हिचकते तो उन्हें सभ्य समाज की सहूलियतें क्यों मिलें?
नबीला एक दो दिनों में वापस अपने गांव पहुंच जाएगी. ब्रैंडन ब्रायंट अभी कुछ दिन डॉक्टरों के चक्कर लगाएंगे. इसी हफ़्ते फिर से एक ड्रोन हमला हुआ है. पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियां कह रही है कि कुछ बड़े चरमपंथी मारे गए हैं. पाकिस्तान ने अपनी सीमा के अंदर हुए हमले के लिए अमरीका की एक बार फिर से आलोचना की है.
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