कौन थे हकीमुल्ला

हकीमुल्ला महसूद

पाकिस्तानी सेना के ख़िलाफ़ साल 2007 में की गई कई बड़ी कार्रवाइयों के बाद पाकिस्तानी तालिबान कमांडर हकीमुल्ला महसूद चर्चा में आए थे.

उस वक़्त वे पाकिस्तानी तालिबान के कई कमांडरों में से एक थे. हाल के वर्षों में यह संगठन पाकिस्तानी सरकार के ख़िलाफ़ जारी अपनी लड़ाई में हज़ारों लोगों की जान ले चुका है.

अगस्त 2009 में तालिबान कमांडर बैतुल्ला महसूद की एक अमरीकी ड्रोन हमले में मौत के बाद वे पाकिस्तानी तालिबान के प्रमुख बने थे.

अमरीका ने हकीमुल्ला के सिर पर पचास लाख अमरीकी डॉलर का इनाम रखा हुआ था. पाकिस्तानी सरकार ने भी उन पर इनाम घोषित कर रखा था.

कई मौक़ों पर बैतुल्ला की तरह ही हकीमुल्ला के भी ड्रोन हमलों में मारे जाने की ख़बरें आ चुकी हैं. हालाँकि वो ग़लत साबित हुईं.

<link type="page"><caption> ड्रोन हमले में हकीमुल्ला की मौत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/11/131101_top_taliban_commander_killed_drona_attack_dil.shtml" platform="highweb"/></link>

लेकिन उनके कई करीबी कमांडर और साथी इतने खुशनसीब साबित नहीं हुए. मई 2013 में ही उनके दूसरे नंबर के नेता वलीउर रहमान की ड्रोन हमले में मौत हो गई थी.

बैतुल्ला महसू
इमेज कैप्शन, बैतुल्ला महसूद मीडिया के सामने कम ही आते थे.

हकीमुल्ला मीडिया से परहेज़ नहीं करते थे, लेकिन उन्हें अक्टूबर में बीबीसी के अहमद वली के साथ अफ़ग़ान सीमा पर हुई मुलाक़ात से पहले करीब एक साल तक वीडियो पर नहीं देखा गया था.

'सबको मरना है'

ड्रोन हमलों के ख़तरों के बावजूद उनकी सेहत और हौसला बरक़रार था. बीबीसी संवाददाता से उन्होंने कहा था, 'डरो मत, हम सबको एक दिन मरना है.'

हमारे संवाददाता के मुताबिक हकीमुल्ला काफ़ी ताकतवर थे और तालिबान में उनके प्रति डर और सम्मान था. वे क़बिलाई नेताओं के साथ रोज़ाना बैठकें करते और कहाँ हमले किए जाने हैं इस संबंध में दिशा निर्देश देते थे.

वे इस समय तीस-पैंतीस साल के थे और उनका वजन थोड़ा बढ़ गया था. उनका लड़कपन ज़रूर चला गया था लेकिन चेहरे का ख़ौफ़ बरक़रार था.

हालाँकि उनका शुरुआती जीवन आसान नहीं रहा. वे हंगू ज़िले के एक छोटे से मदरसे में पढ़े. बैतुल्ला महसूद भी उसी मदरसे में पढ़ते थे, लेकिन उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी.

<link type="page"><caption> तालीबान से वार्ता शुरूः नवाज़ शरीफ़</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/11/131101_pak_nawaz_sharif_taliban_rt.shtml" platform="highweb"/></link>

दुस्साहसी

उनका पैदाइशी नाम ज़ुल्फ़ीकार था जिसे बाद में बदलकर उन्होंने हकीमुल्ला कर लिया था. मदरसे की पढ़ाई के बाद वे अपने अन्य कबिलाई साथियों की तरह ही जेहाद (पवित्र युद्ध) में शामिल हो गए. शुरुआत में वे वरिष्ठ कबिलाई नेताओं की सुरक्षा में तैनात रहते थे.

बैतुल्ला महसूद ने पाकिस्तानी तालिबान के अधिकतर संगठनों को एकजुट किया और इसी से हकीमुल्ला को आगे बढ़ने के कई मौके मिले.

हकीमुल्ला महसूद
इमेज कैप्शन, हकीमुल्ला एक दिलेर और दुस्साहसी कमांडर के रूप में जाने जाते थे.

वे पेशावर और ख़ैबर के कबायली इलाक़ों में नाटो सेनाओं के ख़िलाफ़ तालिबानी अभियान के मास्टरमाइंड थे. बाद में उन्हें ख़ैबर, कुर्रम और औरकज़ई के इलाक़ों का कमांडर बना दिया गया.

2007 में 28 साल की उम्र में उन्होंने एक दुस्साहस भरी कार्रवाई करते हुए तीन सौ पाकिस्तानी सैनिकों का अपहरण कर लिया. तालिबान की अन्य माँगों को मनवाने के साथ-साथ वे कई शीर्ष कमांडरों को रिहा कराने में भी कामयाब रहे थे.

वे जनवरी 2010 में जॉर्डन के एक नागरिक के साथ वीडियो में दिखने के बाद और कुख़्यात हो गए. जॉर्डन के इस लड़ाके के बारे में कहा गया था कि उसने बैतुल्ला महसूद की हत्या का बदला लेने के लिए खुद को उड़ा कर सात सीआईए एजेंटों की हत्या कर दी थी.

हकीमुल्ला से साल 2007 और 2008 में मुलाकात करने वाले बीबीसी संवादादात उन्हें एक दिलेर, दुस्साहसी और मधुर मुस्कान के बावजूद चेहरे से डर झलकाने वाले एक युवा के रूप में याद करते हैं.

<link type="page"><caption> देखी है ड्रोन की ये रहस्यमय दुनिया?</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/10/131031_us_drone_dp.shtml" platform="highweb"/></link>

शानदार ड्राइवर

युद्ध क्षेत्र में अपने कौशल के लिए वो तालिबान में प्रसिद्ध थे. कलाशनिकोव राइफ़ल और टोयोटा कार चलाने में वो लाजवाब थे.

नेक मोहम्मद
इमेज कैप्शन, पाकिस्तानी तालिबान के संस्थापक नेक मोहम्मद 2004 में एक संदिग्ध अमरीकी ड्रोन हमले में मारे गए थे.

2007 में एक रोंगटे खड़े कर देने वाली यात्रा के दौरान एक तालिबानी कमांडर ने बीबीसी से कहा था कि वे 'नेक मोहम्मद के बाद से सर्वश्रेष्ठ हैं.' वे बीबीसी टीम को कार यात्रा पर ले गए थे. असंभव-सी गति पर बेहद तेज़ मोड़ों पर भी गाड़ी पूरी तरह उनके काबू में थी.

अपने ड्राइविंग कौशल्य के इस प्रदर्शन को उन्होंने सैंकड़ों फिट की गहराई से चंद इंच पहले ही तेज़ रफ़्तार पर ब्रेक लगाकर रोका था.

बीबीसी की टीम स्तब्ध और शांत थी और वे हँस रहे थे. उन्होंने कार पीछे ली और फिर यात्रा आगे जारी रखी.

<link type="page"><caption> 'ड्रोन हमलों पर पाकिस्तान की सहमति'</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/10/131024_pak_knew_drone_fma.shtml" platform="highweb"/></link>

नेक मोहम्मद से तुलना

नेक मोहम्मद ने ही पाकिस्तान में तालिबान आंदोलन की शुरुआत की थी. उनकी भी 2004 में एक संदिग्ध अमरीकी ड्रोन हमले में मौत हो गई थी. हालाँकि अपनी मौत से पहले उन्होंने पाकिस्तानी तालिबान को एक शक्तिशाली संगठन बना दिया था.

हकीमुल्ला महसूद से उनकी तुलना सटीक बैठती है. दोनों ही आक्रामक प्रवृत्ति के 'सुंदर युवा' थे.

बीबीसी के पूर्व संवादादाता सैय्यद शोएब हसन कहते हैं, 'जब हकीमुल्ला से पूछा गया कि वे पाकिस्तान में कहाँ-कहाँ गए हैं तो उन्होंने बताया था कि जब वे बच्चे थे तो एक बार कराची गए थे.'

उन्होंने बताया था, 'लेकिन मैं अक्सर पंजाब आता-जाता रहता हूँ और कई बार इस्लामाबाद गया हूँ लेकिन हाल-फिलहाल में नहीं गया हूँ.'

हकीमुल्ला महसूद

मुश्किल दौर

अमरीकी ड्रोन हमलों के डर ने पाकिस्तानी तालिबान के कमांडरों के संपर्क और संचलन को हालिया सालों में मुश्किल बना दिया था. बीबीसी उर्दू के इस्लामाबाद एडिटर हारून रशीद के मुताबिक अब हकीमुल्ला बीबीसी उर्दू को उतने फ़ोन कॉल नहीं करते थे जितने की पहले करते थे.

अगस्त 2009 में ऐसे ही एक फ़ोन कॉल में कई हफ़्तों से जारी अफ़वाहों पर विराम लगाते हुए हकीमुल्ला ने बैतुल्ला की मौत की पुष्टि की थी.

हालाँकि फिर भी कबिलाई इलाक़े के अपने अड्डे से वे पाकिस्तानी के उत्तरी-पश्चिमी इलाक़ों में सक्रिय तीस से ज़्यादा संगठनों की कमान संभाले हुए थे.

अपने पूर्ववर्ती कमांडरों बैतुल्ला महसूद और नेक मोहम्मद की तरह ही वे भी कहते थे कि जब तक न सिर्फ क़बायली इलाक़ों बल्कि समूचे पाकिस्तान में शरिया क़ानून लागू नहीं हो जाएगा वे लड़ाई जारी रखेंगे.

वे कहते थे कि यदि पाकिस्तानी सरकार अब उनसे वार्ता करना चाहती है तो उनके पास टीम भेजे. यदि संघर्षविराम होता है तो वह अमरीकी ड्रोन हमले रुकने की शर्त पर ही होगा.

हालाँकि अमरीकी ड्रोन हमले रुकने की संभावना बेहद कम ही थी. इससे पहले हुए समझौते के बाद तालिबान और भी मजबूत होकर उभरा था.

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