लंदन डायरीः फटेहाल नहीं, चमकती-दमकती 'ग़रीबी'

- Author, राजेश प्रियदर्शी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लंदन
'विकसित देश' सबसे भ्रामक लेबलों में से एक है. अक्सर पॉलिश के नीचे खुरचकर देखने पर अलग ही सच्चाई सामने आती है.
<link type="page"><caption> ब्रिटेन में ग़रीबी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130809_poor_muslin_woman_sks.shtml" platform="highweb"/></link> की बात अक्सर होती रहती है, ख़ास तौर पर लंदन में रहने वाले ग़रीबों की.
अब से कुछ साल पहले तक ग़रीब सरकारी भत्ते के सहारे ज़िंदगी गुज़ार लेते थे लेकिन वेलफ़ेयर स्कीमों में भारी कटौती का असर ब्रिटेन में दिखने लगा है.
रेड क्रॉस ने ऐलान किया है कि वह सर्दियों में ब्रिटेन के ग़रीब लोगों में खाना बाँटेगा. दूसरे महायु्द्ध के बाद से ऐसा पहली बार होगा. एक संस्था जो लड़ाई और आपदाग्रस्त क्षेत्रों में मदद पहुँचाने का काम करती रही है उसने ब्रिटेन की ग़रीबों की तकलीफ़ को समझा है.
खैराती खाना
'पूस की रात' <link type="page"><caption> भारत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130709_english_women_in_india_dil.shtml" platform="highweb"/></link> में ग़रीबों के लिए कठिन होती है तो जनवरी-फ़रवरी लंदन में ग़रीबों पर काफ़ी भारी गुज़रती है.
ग़रीबों को तय करना पड़ता है कि वे बिजली जलाकर घर को गर्म रखें या फिर पेट की आग बुझाने के लिए खाना बनाएँ.
लंदन के ग़रीब लोग <link type="page"><caption> शॉपिंग मॉल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/institutional/2013/09/130915_britain_island_small_an.shtml" platform="highweb"/></link>, लाइब्रेरी या ऐसी ही दूसरी जगहों पर ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त बिताने की कोशिश करते हैं ताकि शरीर को ठंड से बचाया जा सके और बिजली का भारी-भरकम बिल न भरना पड़े.
रेड क्रॉस का कहना है कि खैराती खाने पर निर्भर लोगों की तादाद में पिछले तीन साल में 75 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
सवा करोड़ 'गरीब'

ब्रिटेन में पाँच लाख से ज़्यादा लोग ऐसे हैं जो फूड बैंक के सहारे अपना पेट भर रहे हैं. कल्याणकारी संस्थाएँ सुपरस्टोर्स और आम लोगों की मदद से खाने का सामान जमा करती हैं जिन्हें ज़रूरतमंद लोगों में बाँटा जाता है.
ज़ाहिर है, विलायत की ऐसी तस्वीर तो आपने ज़हन में नहीं होगी. ब्रिटेन दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन वहाँ रहने वाले बीस प्रतिशत लोग यानी सवा करोड़ से अधिक लोग आधिकारिक तौर पर ग़रीब की श्रेणी में आते हैं.
देखने-सुनने में इनमें से बहुत सारे लोग ग़रीब नहीं दिखते. ये भारत के ग़रीबों की तरह फटेहाल बिल्कुल नहीं हैं लेकिन यहाँ के ग़रीबों को भी ज़िंदा रहने के लिए लगातार जद्दोजहद करनी पड़ती है.
लंदन की चमक-दमक के बीच उन्हें अपनी ग़रीबी और ज़्यादा चुभती होगी जहाँ वो देखते सब कुछ हैं लेकिन ख़रीद कुछ नहीं सकते.
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