पाकिस्तान: यूट्यूब पर पाबंदी और कितने दिन?

- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान में यूट्यूब पर पिछले एक साल से पाबंदी लगी हुई है.
सितंबर 2012 में फिल्म ‘इनोसेंस आफ मुस्लिम्स’ की क्लिप यूट्यूब पर आने के बाद सरकार ने इसे ईशनिंदक बताकर यूट्यूब पर ही रोक लगा दी थी.
पाकिस्तान सरकार के <link type="page"><caption> इस फैसले</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/news/story/2006/02/060202_cartoon_editor.shtml" platform="highweb"/></link> के खिलाफ लाहौर हाईकोर्ट में मुकदमा चल रहा है. 19 सितंबर को अगली पेशी है.
सवाल ये है कि यूट्यूब पर लगी पाबंदी का पाकिस्तान के आम लोगों पर क्या असर पड़ा है? क्या यह पाबंदी जारी रहेगी? बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने पाकिस्तान में मौजूद कुछ लोगों से इस मामले में उनकी राय ली .
अली आफ़ताब, गायक
मैं पाकिस्तान के बेहद लोकप्रिय बैंड, बेगैरत बैंड का लीड सिंगर हूं. हमारा बैंड इंटरनेट सेंसरशिप से जूझता रहा है.
पाबंदी का असर तो बहुत पड़ा है. यूट्यूब एक सशक्त माध्यम है. इससे पहुंच का दायरा कई गुना बढ़ जाता है.
जब आप बहुत सारी अलग-अलग साइट पर गाना शेयर करते हैं, तो उसके हिट तितर-बितर हो जाते हैं. जबकि यदि सिर्फ़ यूट्यूब पर आप शेयर करते हैं तो उसकी हिट एक जगह रहती है.
ज़्यादा हिट होने के दो फायदे होते हैं. पहली कि इससे ख़ास किस्म की सुरक्षा मिल जाती है.
दूसरे जिस तरह का हमारा काम है वो टीवी पर सीधा नहीं चल सकता. लेकिन अगर हिट्स ज़्यादा मिल जाते हैं, तो हमारे टीवी पर जाने के मौके बढ़ जाते हैं.
ये हम कलाकारों की भी जि़म्मेदारी है कि हम अपनी रचनात्मकता के लिए जगह बनाएं. हमें अपना काम शोकेस करने के नए तरीके ढूंढने होंगे.
इस पाबंदी के खिलाफ़ लाहौर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है. इसी सिलसिले में कोर्ट ने सूचना-तकनीक मंत्री को तीन बार बुलाया, मगर हर बार वे गैरहाज़िर रहीं.
ईमानदारी से देखा जाए तो जो लोग बैन को खत्म करना चाहते हैं, उनकी तादाद बहुत कम है.
ज़्यादातर लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि यूट्यूब पर पाबंदी लगी है या नहीं. ऐसे लोगों का विश्वास है कि ईशनिंदा का सीधा ताल्लुक यूट्यूब से है.
इसलिए अवाम को इस बात के लिए जागरूक करना पड़ेगा. तभी हम सरकार पर बहुत दबाव डाल सकते हैं.
फहीम ज़फर, सामाजिक कार्यकर्ता

मैं 'बाइट्स फॉर ऑल' गैर सरकारी संगठन के लिए काम करता हूं. हमारी संस्था इंटरनेट फ्रीडम के लिए काम करती है.
हमारी संस्था ने यूट्यूब पर पाबंदी के खिलाफ अदालत में याचिका दायर की है. 19 सितंबर को इसकी चौथी पेशी होनी है.
इस पाबंदी से आम लोगों की ज़िंदगी पर काफी असर पड़ा है. पाकिस्तानी सरकार जनता से कहती है कि हम असल में ईशनिंदा से जुड़े वीडियो को कंट्रोल करना चाहते हैं.
मगर यदि आप इस बात की गहराई में जाएं तो समझ में आएगा कि यह सब राजनीतिक मंशा से किया जा रहा है.
बेगैरत ब्रिगेड के अली आफ़ताब का जो नया गाना था वह सैन्य शासन के खिलाफ था तो उस पर पाबंदी लग गई.
पाकिस्तान में रोलिंग स्टोन की वेबसाइट इसलिए दो साल तक बैन रही कि उन्होंने एक ऐसा लेख प्रकाशित कर दिया था जिसमें सेना के काम-काज की आलोचना थी.
हाल में पाकिस्तान में सिटीजन जर्नलिज्म बहुत बढ़ा है. लोग स्मार्टफोन पर अपना वीडियो अपलोड करते हैं और उसे यूट्यूब पर ले आते हैं.
उसमें से फिर स्कैंडल निकलते हैं, पॉलिटिकल स्कैंडल होते हैं, कुछ सेना से जुड़े हुए स्कैंडल होते हैं. ये पसंद नहीं किए जाते.
फिर इन चीज़ों को बैन करने का बहाना ढूंढ़ा जाता है. फिर कहा जाता है कि ये ईशनिंदक है इसलिए पूरा चैनल बंद कर दो.
पाकिस्तान में इंटरनेट यूज़र्स की तादाद पूरी आबादी की 16 फ़ीसदी है. अगर भारत की आबादी से तुलना की जाए तो एक तरह से पाकिस्तान में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की तादाद ज़्यादा है.
मगर पाकिस्तान में इस पाबंदी के खिलाफ लोग बाहर ही नहीं निकल रहे हैं. तुर्की में जब यूट्यूब बैन किया गया था तो 50 हज़ार से ज़्यादा लोग विरोध में सड़कों पर निकल आए थे.
नौशीन अब्बास, पत्रकार

मैं इस्लामाबाद में बीबीसी उर्दू टेलीविजन पर 'क्लिक' कार्यक्रम पेश करती हूं. मैं पत्रकार हूं.
पाकिस्तान में इंटरनेट की आज़ादी पर रोक चिंताजनक है. क्योंकि दबाव केवल यूट्यूब पर ही नहीं दूसरे वेबसाइट पर भी है. अगर इन पर कुछ चीज़ें वैसी आती हैं जो सरकार को पसंद नहीं, तो उस पर रोक लगाने की बात होती है.
इस मामले में पाकिस्तान अकेला मुल्क नहीं है. भारत जैसे और देश हैं जहां ऐसी बातें होती हैं.
पाकिस्तान में अब चुनी हुई सरकार है. सवाल ये है कि क्या ये बैन अब हटेगा.
असल में ये मामला थोड़ा जटिल है. इसमें कानून भी आता है, और सरकार भी.
हमें इसके लिए एक कानून बनाना पड़ेगा और ये कदम सरकार को ही उठाना होगा. और जब तक सरकार ये नहीं करेगी तब तक यूट्यूब नहीं खुल सकेगा.
छात्र हों, संगीतकार हों, या कोई और... मूल रूप से इस पाबंदी का इंटरनेट यूज़र पर बहुत असर पड़ा है.
जो लोग इसे बंद रखना चाह रहे हैं उनकी तादाद ज़्यादा है, और वे लोग जो इस पाबंदी को हटाने के पक्ष में हैं, उनकी आवाज़ उतनी बुलंद नहीं है.
<bold>(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए <link type="page"><caption> क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link>. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे <link type="page"><caption> फ़ेसबुक पन्ने</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> पर भी आ सकते हैं और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












