क्या सीरिया में दखल का क़ानूनी आधार है?

    • Author, क्लाइव कोलमैन
    • पदनाम, क़ानून संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

अंतरराष्ट्रीय क़ानून पर दुनिया के सभी देशों की सहमति है और वे इसे अच्छी तरह जानते और समझते हैं.

लेकिन दुख की बात यह है कि व्यवहार में सैन्य हस्तक्षेप के बारे में अंतरराष्ट्रीय क़ानून को लेकर कोई निश्चित नियम नहीं है. दुनिया में ऐसी कोई अदालत नहीं है जो किसी देश में सैन्य हस्तक्षेप के लिए हरी झंडी दे.

हालांकि मानवीय आधार पर किसी देश में सैन्य हस्तक्षेप करने के लिए एक क़ानूनी ढांचा बन रहा है.

1990 के दशक में कोसोवो और <link type="page"><caption> रवांडा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/rolling_news/2012/07/120715_rwanda_congo_rn.shtml" platform="highweb"/></link> में मानवीय संकट उभरने के बाद 'रिस्पॉन्सिबिलिटी टू प्रोटेक्ट' यानी 'आर2पी' अस्तित्व में आया था.

इसे सभी देशों ने स्वीकार नहीं किया है. इसके मूल सिद्धांत इस प्रकार हैं-

  • राष्ट्रों को अपने नागरिकों को नरसंहार, युद्ध अपराध और मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों से बचाना होगा. साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ऐसे अपराधों को रोकने के लिए देशों की मदद करनी होगी.
  • जहां कहीं भी ऐसे अपराधों के ठोस सबूत हैं और सरकार इसे रोकने में सक्षम नहीं है, वहां अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संकट को सुलझाने के लिए शांतिपू्र्ण प्रयास करने चाहिए.
  • अगर संकट को सुलझाने के शांतिपूर्ण तरीके नाकाम रहते हैं तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय सैन्य बल का प्रयोग कर सकता है.
  • सैन्य हस्तक्षेप की अधिकतम वैधता के लिए इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मंज़ूरी मिलनी चाहिए. अंतरराष्ट्रीय क़ानून में सैन्य बल का इस्तेमाल करने के लिए इसका सबसे ज्यादा महत्व है.

लेकिन के मामले में सर्वसम्मति के अभाव में यह क़ानून पंगु हो सकता है क्योंकि सुरक्षा परिषद के कुछ सदस्य इसके ख़िलाफ़ हैं.

आर2पी

सीरिया
इमेज कैप्शन, 1990 में कोसोवो में सैन्य हस्तक्षेप को मानवीय आधार पर जायज़ ठहराया गया था.

ऐसी स्थिति में आर2पी अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सैन्य हस्तक्षेप का क़ानूनी अधिकार प्रदान करता है. इस क़ानून में कई ऐसे प्रावधान हैं जो सैन्य हस्तक्षेप को जायज़ ठहराते हैं. मसलन-

  • नागरिकों पर ज्यादती के ठोस सबूत होने चाहिए.
  • सैन्य हस्तक्षेप आख़िरी रास्ता होना चाहिए. यानि इससे पहले समस्या को सुलझाने के सभी संभव शांतिपूर्ण प्रयास किए जाने चाहिए और उनके विफल होने के बाद ही सैन्य बल का प्रयोग होना चाहिए.
  • किसी भी सैन्य हस्तक्षेप का मकसद जनता पर हो रही ज़्यादतियों को रोकना और आम नागरिकों की सुरक्षा होना चाहिए.

दूसरे शब्दों में कहें तो सैन्य बल का इस्तेमाल सीमित और विशिष्ट होना चाहिए. अगर इन सभी शर्तों का पालन किया जाए तो सैन्य बल का सीमित इस्तेमाल आर2पी के तहत जायज़ होगा.

देशों को यह साबित करना होगा कि सैन्य हस्तक्षेप के लिए सभी क़ानूनी शर्तों का पालन किया गया है.

सीरिया के मामले में ये देश दलील दे सकते हैं कि वहां नागरिकों पर ज़्यादती हो रही है और इस समस्या को सुलझाने के सभी शांतिपूर्ण प्रयास नाकाम हो चुके हैं.

साथ ही उन्हें यह भी साबित करना होगा कि सैन्य हस्तक्षेप से नागरिकों पर ज़्यादती बंद हो जाएगी और आम नागरिकों की जान बचेगी.

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