अमरीका ने स्वीकारा ख़ुफ़िया क्षेत्र एरिया-51 का अस्तित्व

अमरीका की ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने एरिया-51 के नाम से विख़्यात ख़ुफ़िया परीक्षण क्षेत्र के अस्तित्व को अधिकारिक रूप से स्वीकार किया है.
हाल ही में यू-2 ख़ुफ़िया विमान कार्यक्रम से संबंधी दस्तावेज़ों को सार्वजनिक कर दिया गया है.
सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ों में इस क्षेत्र के एलियंस और अज्ञात उड़न वस्तुओं (यूएफ़ओ) से संबंधों पर भी रोशनी डाली गई है.
ग्रूम झील के नज़दीक स्थित रेगिस्तान को परीक्षणों के लिए इसलिए चुना गया था क्योंकि यह एक परमाणु परीक्षण केंद्र के भी नज़दीक था.
ब्रितानी रक्षा पत्रकार और यू-2 कार्यक्रम का इतिहास लिखने वाले क्रिस रोबोक ने बीबीसी को बताया कि यह कार्यक्रम बेहद ख़ुफ़िया था. अमरीका को इसके बारे में हर जानकारी को बाक़ी दुनिया से छुपाना था.
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रूस पर निगरानी
ग़ौरतलब है कि शीत युद्ध के दौरान रूस पर नज़र रखने के लिए विकसित किए गए निगरानी विमान यू-2 का अमरीका अब भी इस्तेमाल करता है.
सीआईए के यू-2 कार्यक्रम के 1992 में लिखे गए आंतरिक दस्तावेज़ों के अधिकतर हिस्सों को संपादित करने के बाद 1998 में ही सार्वजनिक कर दिया गया था. लेकिन महत्वपूर्ण जानकारियाँ रोक ली गईं थी.
जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव द्वारा जानकारी माँगने के बाद अब रोकी गई महत्वपूर्ण जानकारियों को भी सार्वजनिक कर दिया गया है.
साल 1955 में सीएआई और वायुसेना के एक हवाई सर्वेक्षण के बाद एरिया-51 को इस कार्यक्रम के लिए चुना गया था.
दस्तावेज़ों के मुताबिक़ तत्कालीन राष्ट्रपति ड्वाइट आइसेनहॉवर ने स्वयं इस ज़मीन के अधिकरण पर हस्ताक्षर किए थे.
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जुलाई 1955 में विमान बनाने वाली कंपनी लॉकहीड, सीआईए और वायुसेना के कर्मचारी इस क्षेत्र में काम करने के लिए पहुँच गए थे.
जारी किए गए दस्तावेज़ों में न सिर्फ़ यू-2 विमान कार्यक्रम का पूरा ब्यौरा है बल्कि इनमें एरिया 51 में रही लोगों की दिलचस्पी और यूएफ़ओ के साथ इसके नाम के जुड़ने जैसे विषयों पर भी रोशनी डाली गई है.
पचास के दशक में इस इलाक़े में यू-2 विमान सामान्य विमानों की उडा़न की ऊँचाई से बहुत ऊपर उड़ता था जिसके कारण यहाँ यूएफ़ओ देखे जाने की रिपोर्टें भी आती रहती थी.
दस्तावेज़ों के लेखक ग्रैगरी पैडलो और डोनाल्ड वेल्ज़ेनवाख़ लिखते हैं, "उस वक़्त किसी को यक़ीन नहीं था कि 60 हज़ार फिट से ऊपर कोई चीज़ उड़ान भर सकती है. इसलिए आसमान में इस ऊँचाई पर किसी चीज़ के दिखने की उम्मीद भी नहीं की जाती थी."
उच्च स्तरीय चर्चा
इन दस्तावेज़ों को सार्वजनिक करने की याचिका 2005 में दायर की गई थी लेकिन यूनिवर्सिटी को यह कुछ समय पहले ही हासिल हो सके.
नेशनल सिक्योरिटी आर्काइव के वरिष्ठ वैज्ञानिक जैफ़ रिचेलशन कहते हैं कि गोपनीयता कि लंबी अवधि इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि एरिया-51 के अस्तित्व के बारे में दुनिया भर के लोग पहले से ही जानते थे.
रिचेलशन कहते हैं कि एरिया-51 के अस्तित्व को स्वीकारने का फ़ैसला सीआईए ने हाल ही में सोच समझकर लिया है.
उन्होंने कहा, ''जहाँ तक मुझे लगता है पहली बार एरिया-51 के अस्तित्व को स्वीकारने के बारे में उच्चस्तर पर चर्चा हुई है.''
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