क्या वियतनाम युद्ध की अवधि को कम किया जा सकता था?

क्या वियतनाम में हुए युद्ध की दिशा बदली जा सकता थी? मालकॉम ग्लैडवेल की मानें तो अगर कॉनरैड केलेन की बात सुन ली जाती तो शायद ऐसा हो सकता था.

मालकॉम ग्लैडवेल एक पत्रकार और लेखक हैं जिन्होंने इस विषय पर अपना विचार दिया है.

कॉनरैड केलेन दरअसल रक्षा मामलों के एक जानकार थे जिनके बारे में लोग कम ही जानते थे.

मालकॉम ग्लैडवेल कहते हैं कि किसी भी बात को ध्यानपूर्वक सुनना एक प्रतिभा होती है. किसी की बात को सुनने की क्षमता रखना और उसे बिना किसी पूर्वाग्रह के ग्रहण करना एक ऐसी स्वाभाविक क्षमता है जैसे कि बेहतरीन याददाश्त होना.

लेकिन एक बात जो सब पर लागू होती है वो ये कि हम जो कुछ सुनते है वो किसी की बातों से प्रभावित होती है.

इसके कई उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन में केवल कॉनरैड केलेन की कहानी पर ध्यान केंद्रीत करना चाहूंगा जो कि एक महान श्रोता थे.

दिशा

वियतनाम यु्द्ध के दौरान उन्होंने कुछ ऐसा सुना जिससे इतिहास की दिशा ही बदल सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. और आज कोई नहीं जानता कि केलेन कौन थे, जो कि शर्म की बात है क्योंकि उनकी प्रतिमा वाशिंगटन डीसी में बने वियतनाम स्मारक के बीचों बींच होनी चाहिए.

केलेन का जन्म 1913 में जर्मनी में हुआ था और उनका पूरा नाम काटजेनैलनबॉगन था. वे यूरोप की एक महान यहुद्दी परिवार से आते थे. वे बर्लिन के टायरगार्टन के नज़दीक रहते थे. इनके पिता एक उद्योगपति थे और उनकी सौतेली मां एक चित्रकार थीं.

फ़रारी कार का शौक़ रखने वाले केलेन की क़दक़ाठी लंबी थी. वे हैंडसम और करिशमाई थे. उनके रिश्तेदारों की बात की जाए तो महान अर्थशास्त्री अलबर्ट ओ हिर्शमैन और अलबर्ट आइंस्टाइन उनके भाई थे.

जब वे युवा थे तभी उन्होंने बर्लिन से पेरिस का रुख़ किया और वो जीन कॉकटीयू के दो्स्त बन गए. जब वे अमरीका पहुंचें तो उनकी मुलाक़ात लेखक थॉमस मैन से हुई. वे उनके निजी सचिव बन गए. लेकिन दूसरे विश्व युद्घ के दौरान वे अमरीकी सेना में शामिल हो गए.

जब युद्ध ख़त्म हुआ तो सेना ने उन्हें दोबारा बर्लिन भेज दिया जहां उनका काम जर्मन सैनिकों का साक्षात्कार करना था. उनका काम था कि वे इन सैनिको से बात करके इस बात का पता लगाएं कि वे हिटलर के लिए तब भी क्यों लड़ते रहे जब ये स्पष्ट हो चुका था कि हिटलर की हार तय है.

इसके बाद उन्होंने रेडियो फ्री यूरोप के लिए काम करना शुरु किया. लेकिन 1960 की शुरुवात में उन्होंने कैलीफ़ोर्निया के एक थींक टैंक यानि नीतियों पर विचार करने वाली संस्था 'रैंड कॉर्पोरेशन' के लिए काम करना शुरु किया. इस संस्था की शुरुवात युद्ध के बाद पेंटागन ने की थी जिसका मक़सद रक्षा के क्षेत्र में उच्च स्तरीय आकलन करना था.

परियोजना

मेलकॉम
इमेज कैप्शन, मेलकॉम एक पत्रकार और लेखक हैं

जिस परियोजना पर वे काम कर रहे थे उसका नाम - दी वियतनाम मोटीवेशन एंड मोरेल प्रोजेक्ट था और इस परियोजना पर काम करते वक्त उन्हें बड़े स्तर पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

इस परियोजना की शुरुवात लिओन गौरे ने की थी और वो भी एक अप्रवासी थे.

अमरीका की वायुसेना उत्तरी वियतनाम पर बम बरसा रही थी क्योंकि वे चाहते थे कि उत्तरी वियतनामी कम्यूनिस्ट दक्षिण वियतनाम में जारी अलगाववाद का समर्थन करना बंद करें जिसका नेतृत्व वियत कांग्रेस कर रही थी.

दरअसल बम बरसाने के पीछे अमरीका का विचार उत्तरी वियतनाम के इरादे को पस्त करना था लेकिन पेंटागन उत्तर वियतनाम के बारे में कुछ नहीं जानता था. वे उसकी संस्कृति, इतिहास और भाषा के बारे में कुछ नहीं जानते थे. उनकी नज़रों में वे दुनिया में एक छोटा सा एक चिन्ह था.

जानकारियां

लेकिन जब आप किसी देश के बारे में कुछ नहीं जानते है तो उसके इरादे को कैसे ख़त्म कर सकते हैं? ऐसे में गौरे का काम उत्तरी वियतनाम की सोच के बारे में पता लगाना था.

वे साएगॉन आए और शहर के एक पुराने भाग में बंगला लिया. इस काम के लिए उन्होंने वियतनामी लोगों को भर्ती किया और उन्हें ग्राणीण इलाक़ो में भेज दिया.

इन लोगों का मक़सद पकड़े गए वियत कांग्रेसी गुरिल्ला के बारे में पता कर उनसे साक्षात्कार करना था. कुछ सालों के बाद ये लोग 61000 पन्नों वाले दस्तावेज़ बनाने में कामयाब हुए.

इन रिकॉर्डों को अग्रेंजी में अनुवाद किया गया था. इसमें इन जानकारियों का आकलन कर सार प्रस्तुत किया गया था.

गौरे इन जानकारियों को हासिल करने के बाद अमरीका के उच्च सैन्य अधिकारियों को इन सूचनाओं के बारे में जानकारी देते थे. और जब भी वे वियतनाम मोटिवेशन और मोरेल प्रोजेक्ट के बारे में प्रस्तुति देते वे यही जानकारियां दोहराते थे.ये जानकारियां थी

  • वियत कांग्रेस पूरी तरह से हतोत्साहित हो चुकी है.
  • वे कभी भी उम्मीद छोड़ सकते हैं.
  • अगर उन पर थोड़ा और दबाव डाला जाता है, उनपर थोड़े और बम बरसाए जाते हैं वे हताश हो जाएंगे और चिल्लाते हुए हनोई चले जाएंगे.

हालांकि इस बात का आकलन निकालना मुश्किल हैं कि गौरे को उस ज़माने में कितनी गंभीरता से लिया जाता था. लेकिन वो ही एक ऐसे व्यक्ति थे जिनके बारे में कहा जाता था कि वो दुश्मन के दीमाग को समझते थे. जब भी अमरीका से कोई प्रतिनिधिमंडल साएगॉन आता वे उनके बंगले पर ज़रुर जाता, जहां गौरे उनके लिए पार्टियां करते और अनजान, रहस्यपूर्ण शत्रुओं के बारे में अंदर की जानकारी देते थे.

प्रतिभा

इस युद्ध के दौरान लाखों लोग मारे गए थे
इमेज कैप्शन, इस युद्ध के दौरान लाखों लोग मारे गए थे

ये सभी लोग गौरे की बात का विश्वास करते थे लेकिन उनमें से एक कॉनरैड केलेन ही थे जो उनकी बात का विश्वास नहीं करते थे. केलेन सभी साक्षात्कार पढ़ते और उनके विपरीत निष्कर्ष पर पहुंचते थे.

सालों बाद उनका कहना था कि उन्होंने एक वरिष्ठ वियत कांग्रेंस कैप्टन का स्मरणीय साक्षात्कार पढ़ने के बाद दोबारा सोचना शुरु किया है. उनसे इस साक्षात्कार की शुरुवात में पूछा गया था कि क्या वियत कांग्रेंस युद्ध जीत जाएगी तो उनका कहना था नहीं.

इस साक्षात्कार के पन्ने पलटे कर आगे पढ़ा जाए तो उनसे सवाल पूछा गया था कि क्या अमरीका युद्ध जीत जाएगा तो इस पर भी उनका जवाब था नहीं.

उनका दूसरा जवाब उनके पहले जवाब का पूरी तरह से मतलब बदल देता है. दरअसल उन्होंने इस युद्घ को जीतने या हारने के बारे में सोचा ही नहीं जो कि एक अलग बात है.

सवाल ये है कि केलेन ने ये क्यों देखा और गौरे ने क्यों नहीं देखा? क्योंकि गौरे के पास ये प्रतिभा नहीं थी.

गौरे एक ऐसे व्यक्ति थे जो कुछ भी सुनते या पढ़ते थे उसे अपने पूर्वाग्रहों के बाद उसे आगे बढाते थे. दुनिया के इतिहास में अमरीका एक शक्तिशाली देश है. उत्तरी वियतनाम एक ऐसा देश था जिसमें उद्योग क्रांति की अभी शुरुवात ही हुई थी.

यु्द्ध के अपने पहले अभियान में ही अमरीका ने इस छोटे से उत्तरी वियतनाम पर इतने बम बरसाए जितने आरएएफ़ ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पूरे जर्मनी पर बरसाए थे.

गौरे ने इनकी संख्या को देखा और इस बात को स्वीकार नहीं कर पाए कि कोई इतनी मार झेलने के बाद कैसे खड़ा रह पाया. तो उन्होंने साक्षात्कार की दूसरी पंक्ति पढ़ी और फिर सुनना बंद कर दिया.

कैलने ने दुसरे विश्व युद्ध के दौरान सेना की खुफिया इकाई में काम किया था.
इमेज कैप्शन, कैलने ने दुसरे विश्व युद्ध के दौरान सेना की खुफिया इकाई में काम किया था.

लेकिन केलेन अलग थे क्योंकि उनमें प्रतिभा थी. वे 20 साल के थे जब हिटलर ने जर्मनी का पदभार संभाला था. हिटलर के आते ही उन्होंने तुरंत अपना सामान पैक किया और तब तक नहीं लौटे जब तक युद्ध ख़त्म नहीं हुआ. जब उनसे पूछा गया कि वे क्यों वहां से चले आए तो उनका हमेशा यही जवाब होता था, ''मुझे आभास हो गया था.''

उन वर्षों में ही हिटलर ने बता दिया था कि उनका यहुद्दियों को लेकर क्या दृष्टिकोण है लेकिन ज्यादातर लोगों ने इस बात को नहीं सुना लेकिन केलेन ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने उनकी बात पर ध्यान दिया.

किसी बात को सुनना कठिन होता है क्योंकि जितना आप सुनते हैं उतनी ही दुनिया आपके लिए कठिन होती जाती है.

तो केलेन गौरे के विचारों से असहमत हुए और उन्हें ग़लत बताया कि वियत कांग्रेस हार नहीं मानने वाली है और हतोत्साहित नहीं हुई है. केलेन वो नहीं थे जिन्होंने कहा था कि अमरीका युद्ध जीत जाएगा - न आज, कल और न ही परसों.

लेकिन इसका असर कुछ नहीं हुआ. गौरे अपने बंगले में वैसे ही काम करते रहे और केलेन ने एक लंबी, विस्तृत रिपोर्ट लिखी जिसे पहले नज़रअंदाज़ किया गया और फिल भूला दिया गया. युद्ध चलता रहा और स्थितियां और बिगड़ती चली गई.

1968 में उनके एक सहयोगी हेनरी किसिंजर से मिलने गए और उनसे केलेन से मुलाक़ात करने को कहा. लेकिन किसिंजर ने ये मुलाक़ात कभी नहीं की. अगर वे ये मुलाक़ात कर लेते तो शायद युद्ध की दिशा बदल सकती थी.

(बीबीसी हिन्दी के <link type="page"><caption> एंड्रॉइड ऐप</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फेसबुक </caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link>या <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> पर भी फॉलो कर सकते हैं)