'पुलिस वाले छोटी-छोटी बात पर पीटते हैं'

- Author, डेविड इड्स
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
पुलिस की ज़्यादतियां, हिरासत में होने वाली मौतें, पुलिस की असंवेदनशीलता और पुलिस सुधारों की व्यापक ज़रूरत जैसे मुद्दे अक्सर भारतीय मीडिया जगत की सुर्ख़ियां बनते हैं.
लेकिन पुलिस के प्रति कुछ ऐसा ही असंतोष इन दिनों यूक्रेन में देखा जा रहा है.
यूक्रेन की सरकार के ख़िलाफ़ यूं तो सड़क पर मौजूद पुलिस वालों का बेहद सामान्य व्यवहार देख कर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि इनके और आम लोगों के बीच में किसी तरह के विरोध की स्थिति हो सकती है लेकिन असल तस्वीर इससे कुछ अलग है.
लोगों में रोष है और वे अब सड़कों पर उतरकर आवाज़ उठा रहे हैं.
पुलिस प्रताड़ना

पूर्व उपप्रधानमंत्री और अब विपक्षी नेता ग्रेगोरी निमरिया कहते हैं, "पुलिस अगर क्रूर है तो इसका सीधा संबंध न सिर्फ़ आपकी विरासत से बल्कि आपके वर्तमान राजनैतिक संस्कृति से भी है. मुझे ख़ुद ऐसे अनुभवों से गुज़रना पड़ा है जहां मुझे और मेरे परिवार को जानबूझ कर निशाना बनाया गया. आप ख़ुद सोचिए कि पिछड़े हुए ग्रामीण इलाक़ो का क्या हाल होगा जहां लोगों के पास ख़ुद को बचाने के साधन भी नहीं हैं."
यूक्रेन के ग्रामीण इलाक़ों में जहां विकास ऊंची इमारतों और फ़ैक्टरियों के रूप में पहुंच भी रहा है वहां के हालात पर नज़र डालें तो ये बात साफ़ हो जाती है कि इमारतें रोज़गार भले ही लाएं लेकिन वो व्यवस्था तो तैयार नहीं कर सकतीं जिससे लोगों का हक़ सुरक्षित रहे.
आन्द्रेई चान्को ऐसे ही एक कामगार हैं जिन्होने फ़ैक्टरी में काम तो किया लेकिन महीनों से नहीं मिले पैसे मांगने पर मिली भयंकर पुलिस प्रताड़ना.
गवाही मान्य नहीं

अपनी आपबीती उन्होंने कुछ इस तरह से सुनाई, "पुलिस ने मुझे गले से पकड़ा और ज़मीन पर पटक दिया... मुझे बहुत ज़्यादा मारा. वो अपनी पूरी ताक़त से मेरे सिर पर बैठ गया और मुझे घसीट कर टॉयलेट की तरफ़ ले जाने लगा ताकि मेरा सिर वहां डाल सके. उसके बाद मेरे घर वाले आए और उन्होने मुझे बचाया. यहां छोटी छोटी बात पर पुलिस वाले आ जाते हैं और ऐसे ही पीटते हैं. मैं तंग आ चुका हैं. अब मैं यहां रहना ही नहीं चाहता."
बात सिर्फ़ लोगों को प्रताड़ित करने तक सीमित नहीं है. हैरान करने वाली बात ये है कि यूक्रेन में कन्विक्शन रेट यानी अपराध साबित होने के मामलों की संख्या 99.8 फ़ीसदी है.
हालांकि यहां पर सुधारों की मुहिम रंग लाई है क्योंकि अब कोर्ट में ऐसा कोई भी सुबूत या गवाही मान्य नहीं है जो पुलिस हिरासत के दौरान हासिल की गई हो.
स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ता दिमित्री ग्रोएज़मेन कहते हैं, "अब अगर पुलिस हिरासत के दौरान अपराध स्वीकार करवा भी लेगी तो उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि कोर्ट में उसे वैध नही माना जाएगा. ये एक बहुत ही अच्छा क़दम है लेकिन असल समस्या जो बाक़ी है वो है पुलिस की ख़राब ट्रेनिंग, शिक्षा और बुरा चरित्र."
बिना सुबूत गिरफ़्तारी

पुलिस के बुरे चरित्र की इस परिभाषा को विस्तार से समझाते हुए एक पूर्व पुलिस अधिकारी योरिबेलोसॉव कहते हैं कि ताक़त का ग़लत इस्तेमाल जैसे पुलिस वालों के ख़ून में है.
वह कहते हैं, "सबसे बड़ी समस्या ये है कि पुलिस को ये लगता ही नहीं है कि ताक़त का ग़लत इस्तेमाल वाक़ई कोई समस्या है. सुबूत ना होने पर भी वो लोगों को गिरफ़्तार करते हैं और फिर उन्हें मजबूर करते हैं उसे स्वीकारने के लिए."
किसी समस्या को सुलझाने के लिए वाक़ई पहला क़दम उसे महसूस करना है.
पुलिस औऱ प्रशासन जिनकी परिकल्पना एक समाज में नागरिकों की सुरक्षा और व्यवस्था के लिए की गई थी अगर वही अव्यवस्था फैलाने की वजह बन जाएं तो इसका इलाज जन आंदोलनों में ही ढूंढा जाता है.
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