वांगु कंजा, 37 साल, कीनिया
वांगु कंजा के साथ 2002 में उस वक्त यह हादसा हुआ, जब वह अपने काम से घर लौट रही थी. रास्ते में कई दरिंदों ने मिलकर उसके साथ बलात्कार किया. वह किसी का चेहरा नहीं देख पाई क्योंकि उसका सिर जबरन नीचे झुका दिया गया था. अपने साथ हुए इस हादसे को भूलकर उसने बलात्कार और यौन शोषण की शिकार औरतों की मदद का संकल्प लिया... और नैरोबी में वांगु कंजा नामक संस्था की स्थापना की.
वांगु कंजा की कहानी पढ़िए उनकी ही ज़ुबानी:
"तब मैं अकेली ही रहा करती थी. मैंने खुद को पूरे दो दिनों तक कमरे में बंद रखा. मगर कमरे का किराया और दूसरे बकायों का भुगतान करने के लिए मुझे मजबूरन बाहर आना पड़ा. कई दिनों तक मैं उस दर्दनाक घटना के प्रभाव से बाहर नहीं निकल पाई. धीरे-धीरे मैंने काम पर भी जाना शुरू कर दिया. मगर उस दहशत से उबर पाना मुश्किल हो रहा था.
मैं एक दु:स्वप्न में जी रही थी. हर वक्त घबरायी और उदास रहती. 2002 से 2005 तक मैं अवसाद में डूबी रही. खुद से दूर भागने के लिए शराब भी पीनी शुरू कर दी.
यह मेरे जीवन का वह मोड़ था, जहां मैं बिलकुल तनहा रह गई थी. मगर मुझे यह मंजूर नहीं था. मैंने मनोविज्ञान का कोर्स शुरू कर दिया. यह मेरे लिए महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. प्रैक्टिकल के दौरान मैंने बलात्कार और यौन उत्पीड़न की शिकार औरतों के साथ काम करना तय किया. ऐसे हादसों की शिकार औरतों को क्या सलाह-मशविरा दिया जाए, यह सीखने के क्रम में मेरी मानसिक स्थिति भी दुरुस्त होने लगी.
मेरे परिवार को मेरे बलात्कार के बारे में तब पता चला, जब उन्हें इसके बारे में अखबारों और लेखों में पढ़ने को मिला. जीवन के उस मोड़ पर घर वालों के साथ मेरे संबंध बहुत अच्छे नहीं थे और इस भयानक घटना से यह स्थिति और भी कठिन बन गई. शुरू-शुरू में तो वे लोग इस घटना को स्वीकार ही नहीं कर पाये.
मेरे आस-पास के लोगों को जब इस बारे में पता चला, वे मेरे साथ जरूरत से ज्यादा अच्छा व्यवहार करने लगे - जिसका अंतत: मुझ पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता. मुझे इन कठिन परिस्थितियों का सामना खुद ही करना था... अपने बलबूते.
इन मुश्किल हालातों में किसी दोस्त या परिवार ने मेरी मदद नहीं की. शुरुआत में केवल एक शख्स मेरी मदद को आगे आया, और वो मेरी आंटी थी. वे मुझे मेडिकल चेकअप के लिए ले गईं और कुछ खास सुविधाएं मुहैया करवाने में मेरी मदद की. मेरे लिए सूचना एकत्रित की और सलाह मांगी.
मैंने पुलिस को इस मामले की सूचना दी. वे लोग मुझे इस मामले को आगे ले जाने के लिए हतोत्साहित करने लगे. उन लोगों ने इस मामले की ढंग से रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की.
वे लगातार मुझ पर लगातार दबाव बनाते रहे कि मैं बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज न करूं और सारे आरोप वापस ले लूं. बार बार जोर देते रहे कि मुझे रिपोर्ट दर्ज नहीं करनी चाहिए या आरोप नहीं लगाने चाहिए.
यही वजह है कि मुझे इस मामले में आगे की कार्रवाई जारी रखने और अपराधी को सजा दिलाने की कोई भी वजह नहीं दिखी. यह सब करने के बजाय, मैने अपना सारा ध्यान खुद को इस अवसाद से बाहर निकालने और बलात्कार और यौन शोषण की शिकार हो चुकी औरतों के लिए कुछ कर गुजरने में लगा दिया.
ऐसे मामलों में साथ की जरूरत होती है और इसीलिए मैंने 2005 में अपनी संस्था की नींव डाली."












