मंदी ने लड़कियों की स्थिति बदतर की

शोध संस्था प्लान इंटरनेशनल एंड ओवरसीज़ डेवेलपमेंट इंस्टीट्यूट ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया महिलाओं की देखभाल करने के मामले में बुरी तरह से असफल हो रही है.
बच्चों के अधिकार के लिए काम करने वाली संस्था के मुताबिक दुनिया भर में छाई मंदी का सबसे ज़्यादा असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ रहा है.
शोध के मुताबिक अर्थव्यवस्था की ख़राब स्थिति के कारण ना सिर्फ़ नवजात बच्चियों की मौत हो रही है बल्कि वे भुखमरी और शोषण का भी शिकार हो रही हैं.
इस रिपोर्ट के साथ ही हाल के सालों में इस दिशा में पाई गई सफलताओं के कम होने की आशंका तेज़ हो जाती है.
प्लान इंटरनेशनल के मुख्य अधिकारी नाइजेल चैपमैन के अनुसार, ''पिछले पांच सालों में हुई उन्नति काफी कमज़ोर है और ताज़ा जानकारी काफी चौंकाने वाली है. मुझे नहीं लगता कि इस पर ध्यान दिया जा रहा है.''
नवजातों की मौत
चैपमैन के अनुसार, ''दुनियाभर में लड़कियों के साथ सबसे ज़्यादा भेदभाव होता है और ऐसा उनके साथ काफी कम उम्र से शुरू हो जाता है.''
मंदी के दौरान मरने वाली बच्चियों की संख्या मरने वाले बच्चों से पांच गुना ज्य़ादा हो गई थी.
वर्ल्ड बैंक द्वारा दुनिया के 59 देशों में किए गए अनुसंधान में पाया गया है कि अगर अर्थव्यवस्था में एक प्रतिशत की गिरावट आती है तो प्रत्येक एक हज़ार बच्चों की मौत में लड़कियों का प्रतिशत 7.4 और लड़कों का सिर्फ 1.5 प्रतिशत होता है.
चैपमैन के अनुसार ये स्थिति बढ़ती ग़रीबी का एक ज्वलंत उदाहरण है.
ज्य़ादा काम - कम खाना
हालांकि इस अनुसंधान रिपोर्ट को तैयार करने वाले विश्व बैंक के सदस्यों के अनुसार लड़के और लड़कियों पर पड़ रहे असर का आकलन करने के लिए उनके पास पर्याप्त आंकड़े मौजूद नहीं है.
लेकिन मौजूद आंकड़ों से ये साफ़ है कि आर्थिक असंतुलन के दौरान सबसे ज़्यादा ख़तरा महिलाओं को उठाना पड़ता है.
मंदी के दौरान छाई ग़रीबी का सबसे पहला असर लड़कियों की शिक्षा पर होता है और उन्हें स्कूल से निकाल लिया जाता है.
यहां तक कि प्राथमिक स्कूलों में भी पढ़ाई अधूरी छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या जहां 29 प्रतिशत है वहीं लड़कों की 22 प्रतिशत.
कई मामलों में लड़कियों को इसलिए स्कूल से निकाल लिया गया ताकि वे घर पर अपनी माँओं की मदद कर सकें, जिन्हें काफी देर तक कम पैसे में काम करना पड़ता है.
चैपमैन के अनुसार ये लड़कियाँ घर के कामकाज में इस कदर फँस जाती है कि उन्हें फिर से पढ़ाई की तरफ लौटाना नामुमकिन हो जाता है.
कई मामलों में ग़रीबी के कारण लड़कियों की कम उम्र में शादी कर दी जाती है ताकि उनके खाने का खर्चा बचाया जा सके, और कई बच्चियाँ बाल-मज़दूर या यौन कर्मी बनने के लिए मजबूर हो जाती हैं.
घर पर खाने के बंटवारा कुछ इस तरह से होता है कि घर के पुरुषों और लड़कों के हिस्सों में ज़्यादा खाना आता है और लड़कियां अपनी माँओं की तरह भूखी रहती हैं.
चैपमैन कहते हैं, ''इसका सीधा असर इन लड़कियों के स्वास्थ्य पर पड़ता है और वे दिनोंदिन कमज़ोर होती जाती हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, ''मंदी के दौरान महिलाओं की हालत पहले से भी बदतर हुई है. उनके साथ होने वाले भेदभाव और उनकी ज़रूरतों को नकारने की प्रवृत्ति काफी बढ़ी है. पहले की तुलना में गर्भावस्था के दौरान मिलने वाली देखभाल में भी कमी आई है जिस कारण गर्भस्थ महिलाओं की मौत का ख़तरा भी बढ़ गया है.
नई नौकरी

इन हालातों में महिलाओं को मिलने वाली मूलभूत सुविधाओं में भी कमी आई है.
ओवरसीज़ डेवेलपमेंट इंस्टीट्यूट में रिसर्च फेलो निकोला जोंस के अनुसार, ''लड़कियों के मूल मानवीय अधिकारों का लगातार हनन हो रहा है.''
चैपमैन इस सबकी वजह आर्थिक मंदी, सरकारों की लंबी सुधार योजनाएं और नई आर्थिक नीतियों के साथ-साथ लिंगभेद को मानते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार अगर हम स्थिति को सुधारना चाहते हैं तो हमें लड़कियों और महिलाओं को केंद्र में रखकर अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की शुरुआत करनी होगी.
इन कार्यक्रमों के ज़रिए हमें महिलाओं को बेहतर खाना, सुरक्षा, शिक्षा और नौकरी मुहैया करानी होगी.
चैपमैन के अनुसार, ''इसके अलावा हमें 'लड़कियों और औरतों' और 'लड़कों और पुरुषों' के बीच के फर्क को मिटाना होगा.












