भारत को लेकर यूरोप में छिड़ी बहस, जर्मन चांसलर ने किस पर साधा निशाना

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जर्मनी के चांसलर ओलाफ़ शॉल्त्स ने एक भाषण में कहा है कि भारत, दक्षिण अफ़्रीका और वियतनाम जैसे देश यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस की आलोचना करने से झिझकते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों को बराबरी से लागू नहीं किया जाता है.
ग्लोबल सॉल्यूसंश के 'द वर्ल्ड पॉलिसी फोरम' कार्यक्रम में बोलते हुए ओलाफ़ शॉल्त्स ने कहा, "जब मैं इन देशों के नेताओं से बात करता हूँ तो कई मुझे ये भरोसा देते हैं कि वे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों पर सवाल नहीं उठा रहे हैं. उनकी चिंता यह है कि ये सिद्धांत समान रूप से लागू नहीं होते."
शॉल्त्स ने कहा, "वो चाहते हैं कि बराबरी की शर्तों पर प्रतिनिधित्व हो और पश्चिम के दोहरे मापदंडों का अंत हो."
शॉल्त्स ने कहा, "मुझे ग़लत मत समझिए- मैं ये नहीं कह रहा हूं कि ये दावें हमेशा उचित होते हैं. लेकिन अगर हम एशिया, अफ़्रीका और लातिन अमेरिका के शक्तिशाली देशों को एक स्थिर वैश्विक व्यवस्था स्थापित करने में सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं तो हमें इनका समाधान करना होगा."
शॉल्त्स ने कहा, "अगर देशों को ये लगेगा कि हम सिर्फ़ उनके कच्चे माल में रूचि ले रहे हैं या संयुक्त राष्ट्र के किसी प्रस्ताव पर उनका समर्थन चाहते हैं, तब हमें उनके सहयोग नहीं मिलने पर हैरान नहीं होना चाहिए."
जर्मन चांसलर ने यह भी कहा कि वो नवंबर में नेताओं को जर्मनी आमंत्रित करेंगे और उन्हें जी20 में शामिल होने का न्यौता देंगे.
शॉल्त्स ने यह भी कहा कि यूरोप के साम्राज्यवादी देशों को अपने औपनिवेशिक अतीत को लेकर माफ़ी मांगनी चाहिए.
रूसी तेल पर भारत से सवाल और जयशंकर का जवाब

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भारत ने यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस की आलोचना नहीं की है. पश्चिमी देश इसे लेकर कई बार सवाल उठा चुके हैं.
यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय संघ के प्रतिबंध लगने के बावजूद रूस बड़ी मात्रा में भारत को कच्चा तेल बेच रहा है.
आलम यह है कि रूस का कच्चा तेल भारत से रिफाइन होकर यूरोप जा रहा है. यूरोप में रिफाइंड तेल बेचने के मामले में भारत ने पिछले महीने सऊदी अरब को पीछे छोड़ दिया था.
पिछले एक साल में भारत रूस के तेल का सबसे बड़ा ख़रीदार बनकर उभरा है.
सस्ते रूसी तेल की वजह से भारत की रिफ़ाइनरी मुनाफ़ा कमा रही हैं और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी कर रही हैं. भारतीय तेल उत्पाद यूरोप के बाज़ार में जमकर पहुंच रहे हैं.
यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रमुख जोसेप बोरेल ने कहा है कि रूस के कच्चे तेल से बनने वाले भारत के रिफ़ाइंड उत्पादों पर प्रतिबंध लगना चाहिए.

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मंगलवार को जोसेफ़ बोरेल को सलाह देते हुए भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि बोरेल को यूरोपीय संघ के नियमों को पढ़ना चाहिए.
ख़ासकर vf/c 833/201 को, जिसमें कहा गया है कि रूस का कच्चा तेल अन्य देशों में बड़े बदलावों से गुज़रता है और उसे रूस के माल की तरह नहीं देखा जाना चाहिए.
भारतीय विदेश मंत्री से मुलाक़ात से पहले जोसेप बोरेल ने कहा था कि रूस पर लगे प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर भारत पर कार्रवाई होनी चाहिए.
फ़ाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक जोसेप बोरेल ने कहा था, "अगर डीज़ल और पेट्रोल यूरोप पहुंच रहा है… भारत से आ रहा है और इसे रूस के तेल से उत्पादित किया जा रहा है, जो कि रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लंघन है तो सदस्य देशों को क़दम उठाने चाहिए."
एस जयशंकर और जोसेप बोरेल के बीच ब्रसल्स में ट्रेड टेक्नॉलजी वार्ता के दौरान मुलाक़ात हुई है लेकिन इस वार्ता के बाद की प्रेस वार्ता में बोरेल शामिल नहीं हुए.
शॉल्त्स ने पहले भी किया है भारत का समर्थन

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पिछले साल भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यूरोपीय देशों की मानसिकता पर टिप्पणी की थी.
जून 2022 में स्लोवाकिया में एक सम्मेलन में भारतीय विदेश मंत्री ने एक सवाल के जवाब में कहा था, "यूरोप को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याए हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्या नहीं हैं."
भारत में जर्मनी के राजदूत रहे वाल्टर जे. लिंडनेर ने पिछले साल छह दिसंबर को जयशंकर की इसी टिप्पणी का वीडियो ट्विटर पर पोस्ट करते हुए लिखा था, ''इनका तर्क बिल्कुल वाजिब है.''
इस सम्मेलन में भारतीय विदेश मंत्री से रूस से तेल ख़रीदने को लेकर सवाल पूछा गया था. जिन देशों को जयशंकर निशाने पर ले रहे थे, उन्हीं में एक देश का डिप्लोमैट कह रहा है कि भारतीय विदेश मंत्री बिल्कुल सही हैं.

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इस साल फ़रवरी में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में बोलते हुए ओलाफ़ शॉल्त्स ने कहा था, "यूरोप को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं. यह भारतीय विदेश मंत्री का कथन है और उनका तर्क जायज़ है. अगर अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सिर्फ़ ताक़तवर लोगों का ही क़ानून चलेगा तो ये सिर्फ़ यूरोप की समस्याएं नहीं रहेंगी."
इस सम्मेलन में ओलाफ़ ने ये भी कहा था कि अगर पश्चिमी देश ये चाहते हैं कि भारत और इंडोनेशिया जैसे देश उनका साथ दें तो उनके साथ सिर्फ़ हमारे साझा मूल्यों पर ज़ोर देने से काम नहीं चलेगा बल्कि पश्चिमी देशों को इन देशों की चिंताओं और हितों का भी ध्यान रखना होगा. ये साझा सहयोग की बुनियादी ज़रूरत है.
जर्मन चांसलर के बयान के बाद एस जयशंकर ने यूक्रेन युद्ध से भारत और चीन को जोड़ने पर सवाल उठाए थे.
कहा जा रहा है कि अमेरिका, ईयू, चीन और रूस वर्ल्ड ऑर्डर को अपनी ओर झुकाने की कोशिश करेंगे. ऐसे में तुर्की, सऊदी अरब, भारत, इंडोनेशिया और अफ़्रीका का रुख़ क्या होगा, यह बहुत मायने रखेगा.
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन अपने मुल्क में कई मुश्किलों का सामना कर रहे हैं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर बहुत ही चालाकी से अपनी चाल चल रहे हैं.'
नेटो के सदस्य होने के बावजूद तुर्की रूस के ख़िलाफ़ पश्चिमी प्रतिबंध में शामिल नहीं हुआ. यहाँ तक कि अर्दोआन ने फ़िनलैंड और स्वीडन के नेटो में शामिल होने के आवेदन को रोक दिया था.
तुर्की इस मौक़े का फ़ायदा उठाना चाहता है. तुर्की अपनी चाल चल सकता है क्योंकि यूक्रेन संकट से उसे फ़ायदा मिला है.
जयशंकर की दो टूक

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एस जयशंकर ने कहा था, "आज एक लिंकेज है, जिसे बनाया जा रहा है. ये संबंध स्थापित करने की कोशिश की जा रही है कि यूक्रेन में जो हो रहा है, वो भारत और चीन के बीच जो हुआ उससे जुड़ा है… मेरे कहने का मतलब ये है कि भारत और चीन के बीच जो हुआ वो यूक्रेन में कुछ भी होने से बहुत पहले हो चुका है. चीन को भारत के साथ कैसे व्यवहार करना है और कैसे नहीं करना है या हमारे साथ कितना मुश्किल से पेश आना है या नहीं है, इसे लेकर कहीं और से प्रभावित होने या कोई उदाहरण देखने की ज़रूरत नहीं है."
भारत पर यूरोप दबाव डालता रहा है कि वह यूक्रेन पर रूस के हमले का विरोध करे. पिछले साल अप्रैल में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रायसीना डायलॉग में इस मामले में तल्ख़ जवाब दिया था.
विदेश मंत्री एस जयशंकर नॉर्वे के विदेश मंत्री के सवाल का जवाब दे रहे थे. अपने जवाब में जयशंकर ने कहा था, ''याद कीजिए कि अफ़ग़ानिस्तान में क्या हुआ. यहाँ की पूरी सिविल सोसाइटी को दुनिया ने छोड़ दिया. जब एशिया में नियम आधारित व्यवस्था को चुनौती मिली तब हमें यूरोप से व्यापार बढ़ाने की सलाह मिली. कम से कम हम सलाह तो नहीं दे रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान के मामले में किस नियम आधारित व्यवस्था का पालन किया गया. कोई टकराव नहीं चाहता है और यूक्रेन-रूस संघर्ष में कोई विजेता नहीं होगा.''
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