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सूडान की हिंसा में सोने के भंडार कैसे बने अभिशाप
- Author, बीबीसी मुंडो
- पदनाम, .
पूर्वी अफ़्रीका के सबसे बड़े देश सूडान में पिछले हफ़्ते मची उथल पुथल के दौरान अबतक क़रीब 180 लोग मारे गए और 1,100 लोग घायल हुए हैं.
कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अनुसार, सूडान के अर्धसैनिक बल 'रैपिड सपोर्ट फ़ोर्स' यानी आरएसएफ़ और वहां की सेना के बीच लड़ाई के चलते ये मौतें हुई हैं. दोनों पक्षों के बीच अधिकांश हमले राजधानी खार्तूम में हुए हैं.
जबसे अप्रैल 2019 में ओमर अल बशीर की सरकार गिरी है तबसे सूडान में स्थिरता नहीं आ पाई है और ताज़ा संघर्ष के पीछे कई घटनाओं, तनावों और राजनीतिक संघर्षों की एक लंबी शृंखला है.
हिंसा के ताज़ा दौर के पीछे दो मुख्य सैन्य नेताओं के बीच संवाद की कमी है जिन पर देश में नागरिक सरकार की बहाली की ज़िम्मेदारी हैः आरएसएफ़ प्रमुख मोहम्मद हमदान दगालो जिन्हें हेमेदती के नाम से भी जाना जाता है और सेना प्रमुख जनरल अब्देल फतेह अल बुरहान.
लेकिन इस संघर्ष के कई कारणों में सबसे बड़ा कारण 'सोना' है. पूरे अफ़्रीकी महाद्वीप में सबसे बड़ा सोने का भंडार सूडान में है.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ 2022 में ही सूडान ने 41.8 टन सोने के निर्यात से क़रीब 2.5 अरब डॉलर की कमाई की थी.
देश के सबसे मुनाफ़े वाली सोने की खदानों पर हेमेदती और आरएसएफ़ मिलीशिया का कब्ज़ा है, जो अपनी गतिविधियों को चलाने के लिए इस क़ीमती धातु को केवल ख़ार्तूम सरकार को ही नहीं बल्कि पड़ोसी मुल्कों को भी बेचते हैं.
सूडान संकट के बारे में बारीक़ जानकारी रखने वाले एक्सपर्ट शेविट वोल्डमाइकल ने बीबीसी को बताया, "आर्थिक संकट से जूझ रहे देश के लिए सोने की खदानें ही आय का मुख्य स्रोत हैं. और इस संघर्ष के समय ये रणनीतिक रूप से अहम हो गई हैं."
उनके मुताबिक़, "लंबे समय से ये आरएसएफ़ का प्रमुख वित्तीय स्रोत रहा है और सेना इसे संदेह से देखती है."
अंधाधुन सोने के खनन ने खदानों के आस पास के इलाक़ों पर बहुत बुरा असर डाला है. खदानों के ढहने से मरने वालों की भारी संख्या और शोधन में इस्तेमाल होने वाले मर्करी और आर्सेनिक ने इस तबाही को और गंभीर बना दिया है.
लेकिन सवाल ये है कि किस तरह सोना सूडान की ताज़ा हिंसा में एक प्रमुख रणनीतिक कारक बन गया है?
सूडान और सोना 'अभिशाप'
साल 1956 में सूडान का इलाक़ा ब्रिटिश शासन से आज़ाद हुआ, इसके बाद एकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई जो उतार चढ़ाव से भरपूर रही.
इस दौरान देश को अपने तेल भंडार के बारे में पता चला और यह मुख्य वित्तीय स्रोत बन गया.
1980 के दशक के मध्य, देश के दक्षिणी हिस्से में आज़ादी के लिए संघर्ष शुरू हो गया और तीखे संघर्षों के बाद 2011 में रिपब्लिक ऑफ़ साउथ सूडान बनने के साथ इस संघर्ष पर विराम लगा.
दक्षिणी सूडान बनने के साथ ही कच्चे तेल के निर्यात से होने वाली दो तिहाई आमदनी सूडान के हाथ से चली गई.
संसाधनों की कमी के कारण देश में मौजूद विभिन्न कबीलाई समूहों, हथियारबंद गुटों और मिलीशिया के बीच तनाव बढ़ गया.
साल 2012 में देश के उत्तरी हिस्से में स्थिल 'जेबेल अमीर' इलाके में सोने के विशाल भंडार का पता चला जो देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिये पर्याप्त था.
टफ़्ट्स यूनिवर्सिटी सूडान से जुड़े एक्सपर्ट एलेक्स डी वाल ने बीबीसी को बताया, "इसे ईश्वर की देन समझा गया और माना गया कि साउथ सूडान की वजह से देश ने जो खोया, उसकी भरपाई हो सकती है."
वो कहते हैं, "लेकिन सोने की खोज जल्द ही अभिशाप साबित हुई क्योंकि इस पर कब्ज़े को लेकर विभिन्न पक्षों में लड़ाई शुरू हो गई और इसकी वजह से सोने की अनियंत्रित लूट शुरू हो गई."
स्थानीय रिकॉर्ड्स और खुद डी वाल के मुताबिक़, उथली खदानों में अपनी क़िस्मत आजमाने के लिए हज़ारों लोगों की भीड़ उस इलाक़े में उमड़ पड़ी.
कुछ लोगों को सोना हाथ लगा और वे रातों रात अमीर हो गए जबकि कुछ भुरभुरी खदान धंसने से मारे गए या सोना को शोधन करते समय मर्करी और आर्सेनिक के ज़हर से मारे गए.
साल 2021 में वेस्ट कोर्डोफ़ान प्रांत में सोने की एक खदान धंसने से 31 लोग मारे गए थे. बीते मार्च में ही एक अन्य खदान के धंसने की वजह से 14 लोग मारे गए.
सूडान यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने 2020 में खदानों के पास मौजूद पानी के स्रोतों का अध्ययन किया था.
इसके अनुसार, यहां पानी में मर्करी का स्तर 2004 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) और आर्सेनिक का स्तर 14.23 पीपीएम पाया गया.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पानी में मर्करी का मान्य स्तर 1 पीपीएम और आर्सेनिक का 10 पीपीएम है.
खार्तूम यूनिवर्सिटी में पर्यावरणीय क़ानून पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर अल जीली हामूदा सालेह के अनुसार, "बड़े पैमाने पर मर्करी और आर्सेनिक का इस्तेमाल देश में निश्चित ही पर्यावरणीय तबाही लाएगा."
उनके मुताबिक़, "देश में सोने के खनन वाली 40,000 जगहें हैं. देश के 13 प्रांतों में सोने का शोधन करने वाली 60 कंपनियां हैं, इनमें 15 कंपनियां सिर्फ दक्षिणी कोर्दोफ़ान में हैं. ये पर्यावरणीय मानदंडों को नहीं मानती हैं इसलिए अभी कुछ भी बदलने नहीं जा रहा."
अल बशीर के समर्थक एक जाने माने कबायली नेचा मूसा हलील ने एक विशेष जनजाति का सामूहिक नरसंहार करने के बाद इस इलाक़े को अपने कब्ज़े में ले लिया था. इस जनसंहार में इस इलाक़े में रहने वाले 800 लोग मारे गए.
हलील ने सोने का खनन करना और बेचना शुरू कर दिया और उनके ग्राहक सिर्फ खार्तूम की सरकार ही नहीं बल्कि अन्य ख़रीदार भी थे.
हालांकि मानवता के ख़िलाफ़ अपराध के अभियुक्त हलील का 2017 में पतन हो गया. इसके बाद आरएसएफ़ के नेता हेमेदती ने यहां कब्ज़ा कर लिया.
उस समय देश के कुल निर्यात में सोने की हिस्सेदारी 40% होती थी.
डी वाल के अनुसार, "इस सोने ने ही हेमेदती को देश का मुख्य ताक़तवर नेता बना दिया. इसके साथ ही उनका प्रभाव बढ़ा और चाड और लीबिया से जुड़े सरहदी इलाक़ों पर उनका कब्ज़ा हो गया."
लोकतंत्र का रास्ता
सच्चाई ये है कि 2019 में सेना के तख़्तापलट के कारण ओमर अल बशीर की सरकार गिरने के बाद यह देश दो प्रमुख लोगों के हाथ में चला गया जिनके पास हथियारबंद समूह थे- हेमेदती और अल बुरहान.
डी वाल कहते हैं, "अन्य कारकों को अगर छोड़ दें तो आरएसएफ़ के पास 70,000 हथियारबंद लोग और 10,000 पिकअप ट्रक हैं और वो सूडान का स्वयंभू हथियारबंद समूह बन गया. इतनी बड़ी ताक़त के साथ वो राजधानी ख़ार्तूम को नियंत्रित करने का दावा करने लगा."
साल 2021 में दोनों नेताओं ने बातचीत शुरू करने पर सहमति जताई जिसमें सूडान में एक नागरिक सरकार के गठन का रास्ता साफ़ होता.
वोल्डमाइकल के अनुसार, "बीते दिसम्बर में जब ये सहमति बनी तो ये स्पष्ट था कि सोने का सारा उत्पादन चुनी हुई सरकार को हस्तानांतरित कर दिया जाएगा. लेकिन हेमेदती की बढ़ती ताक़त को देखते हुए अल बुरहान के क़रीबी लोगों ने आरएसएफ़ की गतिविधियों को नियंत्रित करने की सेना को सलाह दी."
हालांकि वो कहते हैं कि उत्तरी सूडान में सोने की खदानों के नियंत्रण में अपनी हिस्सेदारी के लिए कई और ताक़ते भी सक्रिय हैं.
वोल्डमाइकल कहते हैं, "यही कारण था कि अल बुरहान नियंत्रित सेना ने आरएसएफ़ को नियंत्रित करने के लिए व्यापक राजनीतिक संक्रमण के तहत ही एक सुरक्षा सुधार वार्ता करने कोशिश की और जिसकी शर्तें हेमेदती को स्वीकार्य नहीं थीं."
कई कारणों में ये एक प्रमुख कारण है जिसकी वजह से बीते सप्ताहांत हिंसा भड़क उठी. लेकिन देश को अस्थिर करने में अन्य ताक़तें भी शामिल हैं.
वो कहते हैं, "लीबिया में लड़ाई मंद पड़ने के बाद ऐसी आशंका थी कि वहां लड़ रहे दारफ़ुर लड़ाके वापस लौटेंगे और सोने की खदानों समेत अन्य संसाधनों पर कब्ज़े के लिए लड़ाई और भड़केगी."
विश्लेषकों का कहना है कि देश में शांति का बहुत कुछ दारोमदार अंतरराष्ट्रीय दबाव पर निर्भर करता है.
वोल्डमाइकल कहते हैं, "ये निश्चित नहीं है कि दोनों पक्षों में से कोई भी मुकम्मल जीत हासिल कर पाएगा. इसलिए दोनों पक्षों में हताहतों की संख्या बढ़ेगी और इसकी वजह से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ेगा. मुझे लगता है कि उन्हें वार्ता की मेज पर आना ही पड़ेगा."
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