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इराक़ युद्ध के 20 सालः 2003 के हमले ने मुल्क को कैसे अराजकता में धकेल दिया
- Author, जेरेमी बोवेन
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
मार्च 2003 में हुआ हमला इराक़ और उसके लोगों के लिए तबाही लेकर आया था. इसके सबूत लोगों की बर्बाद हुई ज़िंदगी और सीरियाई सीमा के नज़दीक सिंजार के बाहरी हिस्से में स्थित रेगिस्तानी इलाके में लोगों की सामूहिक क़ब्रों में देखे जा सकते हैं.
इस हमले से बुरी तरह प्रभावित यज़ीदी समुदाय के बचे हुए लोग उस क़ब्रिस्तान में मौजूद थे, जहां पहले कभी संगमरमर की खदान थी. साइट के चारों ओर कंटीले तारों से बाड़ लगाई गई थी, जहां पर दर्जनों लोगों की तस्वीरें थीं जिन्हें इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने मार डाला था.
ये लोग खदान के निकट के गांव ज़िले-ली के थे. 3 अगस्त, 2014 को यहां से 1800 लोगों को पकड़ कर ले जाया गया और उनकी हत्या कर दी गई.
यज़ीदी क़ुरान और बाइबिल दोनों का सम्मान करते हैं. यज़ीदी धर्म ईसाई और इस्लाम दोनों से प्रभावित है. इस्लामिक स्टेट ने उन्हें काफ़िर माना और बड़े पैमाने पर नरसंहार के उद्देश्य से उन पर हमला किया था. यह हमला अमेरिका और ब्रिटेन के इराक़ से नियंत्रण छोड़ने के बाद हुआ था. हालांकि इस हमले का सीधा कनेक्शन इराक़ पर 2003 पर हुए हमले से ही था.
साइट की खुदाई देखने वालों में कोच्चो के शेख़ नाइफ़ जस्सो भी थे. यहां यज़ीदी समुदाय को ज़िले-ली से भी बदतर हमले का सामना करना पड़ा था. नाइफ़ ने बताया कि कोच्चो में 1,250 की आबादी में से 517 लोगों को इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने मार डाला, जिन्हें आईएस या दाएश के नाम से भी जाना जाता है.
ज़िले-ली में पुरुषों को बंदूक की नोक पर उनके परिवारों से अलग कर दिया गया और खदान में गोली मारी गई. सोफ़ियन सालेह उस समय 16 वर्ष के थे. खुदाई के समय भीड़ में शामिल थे. वह ज़िले-ली के केवल दो व्यक्तियों में से एक हैं जो नरसंहार से बच गए थे.
जब वह अपने पिता, भाई और 20 से 30 अन्य लोगों के साथ मौत के इंतज़ार में थे, तभी उन्होंने देखा कि एक और समूह को गोली मार दी गई थी. उनके शरीर खदान में एक चट्टान से नीचे गिर गए.
फिर उनकी बारी थी. उन्होंने बताया, "गोली मारने से पहले उन्होंने हमारे हाथ पीछे से बांध दिए. वे हमें ले गए और ज़मीन पर पटक दिया."
सोफ़ियन के पिता और भाई मारे गए, लेकिन वे बच गए क्योंकि शव उनके ऊपर गिरे और शवों ने उन्हें गोलियों से बचा लिया. इस्लामिक स्टेट अपने पसंदीदा हथकंडे का इस्तेमाल कर रहा था. पहले उन्होंने पुरुषों को मार डाला, फिर महिलाओं को ग़ुलाम बना लिया. बच्चों को उनकी माओं से दूर कर दिया गया ताकि उन्हें आईएस में लड़ाकों के रूप में शामिल किया जा सके.
सिंजार के क़ब्रिस्तान के पास बैठी एक मां रो पड़ी. उन्हें याद आया कि किस तरह से उनके बच्चे को छीन कर एक जिहादी परिवार को दे दिया गया था. क़ब्र स्थल के चारों ओर तार की बाड़ के बगल में 20 साल की सुआद दाऊद चट्टो एक पोस्टर के पास खड़ी थीं. उस पोस्टर पर उनके परिवार के नौ पुरुषों के चेहरे थे जो मारे गए थे और दो लापता महिला रिश्तेदारों के चेहरे भी थे.
सुआद ने कहा कि इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने 2014 में उन्हें और कई अन्य महिलाओं और लड़कियों को पकड़ लिया था. तब सुआद 16 साल की थीं और उन्हें सीरिया में रखा गया था. वह वहां 2019 तक रहीं और ख़िलाफ़त के पतन के बाद ही उन्हें वहां से निकाला जा सका.
सुआद ने बताया, "वे बर्बर लोगों की तरह थे, उन्होंने हमें लंबे समय तक हथकड़ी में रखा. खाने के वक्त भी हमारे हाथ बंधे होते थे."
अल-क़ायदा पर हमले से शुरुआत
"उन्होंने हमारे साथ कई बार शादियां रचाईं. वे ग़ुलामों से शादियां करते थे. उन्होंने किसी भी को नहीं छोड़ा था. हम लोगों के साथ कई बार बलात्कार किया गया. वे हमारे आंखों के सामने लोगों को मार रहे थे. वे यज़ीदी पुरुषों की हत्याएं कर रहे थे. उन्होंने मेरे आठ चाचाओं की हत्या कर दी. उन्होंने कई परिवारों को नष्ट कर दिया."
आख़िर में सिंजार के क़ब्रिस्तान की खुदाई की साइट पर इंसानी हड्डियों से भरे कुछ बैग पाए गए. अभी दर्जनों अन्य स्थानों की खुदाई बाक़ी है. 2014 की गर्मियों में जब इस्लामिक स्टेट ने इराक़ पर हमला किया तब तक अमेरिकी और ब्रिटिश यहां से निकल चुके थे.
जिहादी विचारधारा इराक़ पर हमले से बहुत पहले अस्तित्व में थी. इसी विचारधारा ने अमेरिका पर हुए 9/11 के हमलों को प्रेरित किया था. लेकिन ओसामा बिन लादेन और जिहादी चरमपंथियों की विचारधारा को नष्ट करने के बदले 2003 में इराक़ में चरमपंथी हिंसा और क्रूर अराजकता की शुरुआत हुई थी.
अमेरिका और सुन्नी समुदाय के बीच आपसी गठजोड़ से भले अल क़ायदा को थोड़े समय के लिए कमज़ोर किया, लेकिन वे कहीं अधिक ख़तरनाक संगठन इस्लामिक स्टेट के तौर पर उभर कर सामने आए.
इस साल अब तक इराक़ में स्थिरता दिख रही है, ऐसी स्थिरता जो लंबे समय से यहां नहीं दिखी. बगदाद, मोसुल और अन्य शहर अब कहीं ज़्यादा सुरक्षित हैं. लेकिन इन शहरों के लोग इराक़ पर 20 साल पहले हुए हमले के परिणामों को हर दिन महसूस करते हैं.
इसके परिणामों ने लाखों लोगों के जीवन को बदल कर रख दिया, उन पर असर डाला. यह एक गंभीर विडंबना ही है कि इस आक्रमण को लेकर अब अमेरिकी राजनीति या फिर सार्वजनिक तौर पर कोई बात नहीं होती.
इराक़ पर हमले का नेतृत्व अमेरिका ने किया था और ब्रिटेन अमेरिका का निकट सहयोगी था. इस लिहाज़ से दखें तो इराक़ पर हमले के बाद वहां जो कुछ हुआ उसके लिए अमेरिका और ब्रिटेन काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार हैं.
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सद्दाम हुसैन का आतंक
इराक़ के अत्याचारी शासक सद्दाम हुसैन को उखाड़ फेंकना उचित था. उन्होंने विद्रोही कुर्दों के ख़िलाफ़ रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करते हुए हज़ारों इराक़ियों को क़ैद में रखा और मार डाला था. लेकिन यह जिस तरह से किया गया, उससे समस्या उत्पन्न हो गई.
पहले तो अमेरिका और ब्रिटेन ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून की अनदेखी की और उसके बाद इराक़ हिंसा की चपेट में आ गया क्योंकि इराक़ में सत्ता परिवर्तन की योजना को बुश प्रशासन अंजाम तक पहुंचाने में विफल रहा.
बीते 20 साल में इराक़ सद्दाम हुसैन की तानाशाही से बाहर ज़रूर निकला, लेकिन इराक़ की जनता को ऐसी यातनाएं झेलनी पड़ीं, जिससे उबरने में उन्हें 50 साल लग सकते हैं.
2001 में अल-क़ायदा के अमेरिका पर हमले से लेकर इराक़ पर हमले के बीच के 18 महीनों में जो माहौल था और जिसके बारे में एक इतिहासकार ने ठीक ही कहा है, 'भय, ताक़त और घमंड', के माहौल को ठीक-ठीक बता पाना उन लोगों के लिए संभव नहीं है जिन्होंने उसे नज़दीक से देखा था.''
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारत के नष्ट होने के कुछ दिनों बाद मैं न्यूयॉर्क में था. मैनहटन के आसमान में एफ़-15 लड़ाकू विमान गश्त लगा रहे थे. यह एक तरह से यह अमेरिकी सेना की अपनी ताक़त का प्रदर्शन था. यह बता रहा था कि पृथ्वी की सबसे बड़ी सैन्य ताक़त किस तरह से अपना जवाब देगी.
जल्दी ही अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश ने अल-क़ायदा और उनके समर्थकों के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी. ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर समर्थन की पेशकश करने के लिए चार्टर विमान से अटलांटिक महासागर पार करके अमेरिका पहुंचे. ब्लेयर को अंदाज़ा था कि दुनिया भर में ब्रिटेन के प्रभाव को बनाए रखने के लिए व्हाइट हाउस के क़रीब रहना होगा.
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इराक़ पर हमले की वजह
अमेरिकी-ब्रिटिश सेना ने अफ़गानिस्तान में अल-क़ायदा के नेटवर्क के ख़िलाफ़ तेजी से कार्रवाई की. जब अल-क़ायदा के नेता ओसामा बिन लादेन को देने के लिए तालिबान शासन तैयार नहीं हुआ तो साल बीतने से पहले ही उन्हें सत्ता से हटा दिया गया. लेकिन अमेरिका के लिए काबुल काफ़ी नहीं था.
राष्ट्रपति बुश और उनके सलाहकार, अमेरिका के लिए एक वैश्विक ख़तरा देख रहे थे. उनकी सोच थी कि अमेरिका का विरोध करने वाले देश अल क़ायदा और उनके साथियों के साथ मिलकर एक घातक गठजोड़ बना सकते हैं.
उनकी नज़र में सबसे बड़ा लक्ष्य इराक़ और उसके तानाशाह सद्दाम हुसैन थे. 1990 में कुवैत में अपनी सेना भेजने के बाद से ही इराक़ अमेरिका के लिए एक कांटा बना हुआ था. बिना किसी सबूत के, अमेरिकियों ने सद्दाम और अल-क़ायदा के बीच लिंक स्थापित करने की कोशिश की, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था.
वास्तविकता यह थी कि सद्दाम हुसैन एक धर्मनिरपेक्ष तानाशाह थे और वे ख़ुद ही धार्मिक कट्टरपंथियों को एक ख़तरे के रूप में देखते थे.
तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति के पिता एवं अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज एचडब्लू बुश ने सद्दाम हुसैन को 1991 में सत्ता से नहीं हटाने का फ़ैसला लिया था, जब अमेरिकी नेतृत्व वाले अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के सैनिकों ने इराक़ी सैनिकों को कुवैत से बाहर कर दिया था.
1991 में राष्ट्रपति सीनियर बुश और उनके सलाहकारों ने महसूस किया था कि बगदाद में बने रहने से मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. उन्हें इराक़ एक ऐसे दलदल की तरह लग रहा था जहां उन्हें लंबे समय तक संघर्ष करना होगा और संयुक्त राष्ट्र ने इराक़ की सरकार को गिराने के लिए कोई रजामंदी भी नहीं दी थी.
जो सीनियर बुश नहीं कर सके थे
जब युद्धविराम की घोषणा हुई तब मैं बगदाद में था. इराक़ के जिन अधिकारियों को मैं जानता था उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि सद्दाम की तानाशाही बच गई है. बारह साल बाद, 2003 आते-आते, क्रोध और सत्ता के अहंकार ने राष्ट्रपति जूनियर बुश को उन वास्तविकताओं के प्रति अंधा कर दिया, जिसके सामने उनके पिता सीनियर बुश विवश हो गए थे.
जब अमेरिका और ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद को इराक़ पर हमले और सरकार परिवर्तन लाने के प्रस्ताव को पारित करने के लिए तैयार नहीं कर सके, तो दोनों राष्ट्रों ने दावा कर दिया कि पहले के प्रस्तावों से ही उन्हें वह अधिकार मिला हुआ है जिसकी उन्हें आवश्यकता है.
उनके तर्क से सहमत नहीं होने वालों में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव कोफ़ी अन्नान भी शामिल थे. इराक़ पर हमले के 18 महीने बाद बीबीसी के एक इंटरव्यू में, उन्होंने कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर के "अनुरूप नहीं" था.
दूसरे शब्दों में, गैरक़ानूनी था. फ़्रांस और अन्य नेटो सहयोगियों ने आक्रमण में शामिल होने से इनकार कर दिया. टोनी ब्लेयर ने ब्रिटेन में भारी विरोध को नज़रअंदाज़ कर दिया. युद्ध में जाने के उनके निर्णय ने उनके शेष राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया.
किसी भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के लिए युद्ध के फ़ैसले से बड़ा निर्णय नहीं होता है. जॉर्ज बुश और टोनी ब्लेयर ने अपनी पसंद के मुताबिक़ युद्ध की शुरुआत की जिसमें सैकड़ों हज़ारों लोग मारे गए. हमले का औचित्य जल्द ही झूठा नज़र आने लगा.
टोनी ब्लेयर ने सद्दाम हुसैन के पास बड़े पैमाने पर विनाश करने वाले जिन हथियारों के होने का दावा किया था, वे कहीं अस्तित्व में नहीं आए थे. यह खुफ़िया तंत्र की नहीं बल्कि नेतृत्व की विफलता थी.
इराक़ पर जिस तरह के अत्यधिक हवाई हमले किए गए, वो अमेरिकियों के लिए भी सदमे और खौफ़ जैसे थे. जॉर्ज डब्ल्यू बुश के आसपास के नव-रुढ़िवादियों ने ख़ुद को इस भ्रम में रखा कि बंदूक की नोक से लोकतंत्र और क्षेत्रीय स्थिरता को कायम रखा जा सकता है.
इन लोगों का मानना था कि ताक़तवर अमेरिकी सेना ना केवल अपने देश की रक्षा करेगी बल्कि यह मध्यपूर्व देशों में भी स्थिरता लाएगी. इतना ही नहीं इससे सीरिया, ईरान और अन्य देशों में लोकतंत्र किसी अच्छे वायरस की तरह जल्दी फैलेगा.
कुछ ही सप्ताह के अंदर सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटा दिया गया. लेकिन इराक़ी जनता इसके लिए कृतज्ञ होने के मूड में नहीं थी. नेता के रूप में सद्दाम हुसैन के अंतिम दशक में, इराक़ी लोगों को संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियों के चलते अभाव में रहना पड़ा था. ये पाबंदियां सख़्त से सख़्त हों, इसके लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने भी सख़्त पाबंदियां लगाई थीं.
ऐसे में अमेरिकी, ब्रिटिश और उनके सहयोगी सड़कों पर शांति नहीं ला पाए. भयावह सपने वाले वर्षों की शुरुआत भारी लूटपाट, प्रतिशोध के हमलों और अपराध से हुई. क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ विद्रोह एक सांप्रदायिक गृहयुद्ध में बदल गया.
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इराक़ में गृहयुद्ध जैसी स्थिति
इराक़ी एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हो गए क्योंकि अमेरिकियों ने सरकार की एक प्रणाली लागू की जो देश के तीन मुख्य समूहों- शिया मुसलमानों, कुर्दों और सुन्नी मुसलमानों के बीच जातीय और सांप्रदायिक रेखाओं के साथ सत्ता को विभाजित करने वाली थी. सशस्त्र लड़ाके एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ने लगे और लोगों की हत्याएं होने लगीं.
ऐसे अराजकता भरे माहौल का फ़ायदा जिहादी समूहों ने उठाया और विदेशियों पर हमला कर दिया. इससे पहले कि अमेरिकी उन्हें मारने में कामयाब होते, जॉर्डन के एक क्रूर सुन्नी चरमपंथी, अबू मुसाब अल-जरकावी ने नियंत्रण के ख़िलाफ़ विद्रोह को सांप्रदायिक गृहयुद्ध में बदलने के लिए हमले किए. शिया सैनिकों के दस्तों ने इन हमलों का जवाब दिया.
कोई नहीं जानता कि 2003 के हमले में कितने इराक़ियों की मौत हुई थी. अनुमान सभी सैकड़ों हज़ारों में हैं. मध्य पूर्व के चारों ओर हिंसक संप्रदायवाद की लहर गरजती रहती है.
इराक़ पर हमले की भू-राजनीतिक विरासत अभी भी घटनाओं को निर्धारित कर रही है.
वैसे अनजाने में, अमेरिकियों ने सद्दाम हुसैन को उखाड़कर, इराक़ के सत्ता संतुलन को ईरान के पक्ष में कर दिया. इराक़ को इस्लामिक गणराज्य के ख़िलाफ़ सुन्नियों का गढ़ माना जाता था. सद्दाम को हटाने से इराक़ के शिया राजनेताओं को ताक़त मिली, जो ईरान सरकार के भी क़रीबी थे.
ईरान द्वारा सशस्त्र और प्रशिक्षित सैनिक इराक़ में सबसे शक्तिशाली ताक़तवर समूहों में हैं और सरकार में उनके प्रतिनिधि शामिल हैं. अमेरिका और ब्रिटेन को 2011 में अरब विद्रोह के समय एक और तबाही की आशंका हुई थी, लेकिन सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल-असद ने अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा कर उन्हें प्रतिक्रियाओं से दूर रखा.
इराक़ में अव्यवस्था का आलम है क्योंकि जनसंख्या भी तेजी से बढ़ रही है. इसके चलते लोग चोरी-छिपे यूरोप पहुंच रहे हैं. ब्रिटिश गृह मंत्रालय के मुताबिक़ छोटी नावों से इंग्लिश चैनल को पार करने वाले लोगों में इराक़ी चौथे सबसे बड़े समूह हैं.
यूके रिफ़्यूजी काउंसिल का कहना है कि जिन लोगों के मामलों पर कार्रवाई की गई है, उनमें से अधिकांश को शरणार्थियों के रूप में शरण दी गई है. अमेरिकी और ब्रिटिश नेता इन दिनों इराक़ पर हुए हमले पर ध्यान नहीं देते हैं, लेकिन अन्य लोग नहीं भूले हैं.
रूस के यूक्रेन पर आक्रमण करने के बाद, अंतरराष्ट्रीय क़ानून को बनाए रखने की अपीलों की अनदेखी करने के साथ ही विश्व के दक्षिणी हिस्से के अधिकांश राष्ट्र इसके प्रति तटस्थ रहे, इसकी एक वजह यही थी कि लोग अब तक नहीं भूले हैं कि किस तरह से अमेरिका-ब्रिटेन ने इराक़ पर इन क़ानूनों की अनदेखी करके हमला किया था.
यह इस बात का संकेत है कि पिछले 20 साल इतने बुरे रहे हैं कि सद्दाम हुसैन की याद, केवल सुन्नी समुदाय नहीं बल्कि दूसरे लोगों के बीच भी अच्छी तरह से स्थापित है. लोग शिकायत करते हैं कि कम से कम यह तो पता था कि आप पुराने तानाशाह के साथ कहां थे. सद्दाम जिसे अपना दुश्मन मान लेते, उसके लिए वे हर अवसर ख़त्म कर देते थे, जिसमें उनका अपना दामाद भी शामिल था.
इराक़ के लोगों की उम्मीदें
मोसुल के पास एक शिविर में डीजल के लिए कतार में खड़े मोहम्मद नाम के एक 48 वर्षीय सुन्नी ने बग़दाद में शिया-नेतृत्व वाली सरकार के ख़िलाफ़ और हमले के बाद वर्षों से चली आ रही सांप्रदायिक हत्याओं के ख़िलाफ़ रोष जताते हुए कहा, "हम चाहते हैं कि सद्दाम का शासन एक दिन के लिए भी वापस आ सके. सद्दाम एक तानाशाह था, और तब एक व्यक्ति का शासन था, ये सही बात है. लेकिन वह लोगों को इस आधार पर नहीं मार रहा था कि वे शिया, सुन्नी, कुर्द, या यज़ीदी थे."
वैसे इराक़ में उम्मीद के संकेत भी दिखते हैं. कस्बों और गांवों के हिस्से अभी भी खंडहर हैं, लेकिन लोग सुरक्षित महसूस करते हैं, भले ही इराक़ियों को अभी भी ख़तरों का सामना करना पड़ता है जिसे पश्चिम में राष्ट्रीय संकट माना जाएगा.
अच्छी तरह से प्रशिक्षित आतंकवाद विरोधी यूनिट में इस्लामिक स्टेट के जिहादी शामिल हैं, जो अभी भी बमबारी और घात लगाने का प्रबंधन करते हैं.
फिर भी दुकानदारों को साल के अपने सबसे व्यस्त समय, यानी रमज़ान में बंपर कमाई की उम्मीद है. लंबे समय तक इराक़ के लिए आक्रमण की सबसे बड़ी विरासत अमेरिकियों द्वारा लागू वह राजनीतिक व्यवस्था हो सकती है जो सत्ता को जातीय और संप्रदाय के आधार पर विभाजित करती है. इराक़ी राजनेताओं ने भी इसे अपनाया है और इसने भ्रष्टाचार के लिए शानदार अवसर प्रदान किए हैं.
इराक़ में 2003 से चोरी हुई राशि का अनुमान 150 अरब डॉलर से लेकर 320 अरब डॉलर तक है. सभी संप्रदायों के अधिकांश इराकियों में जिन्हें चोरी के उपहार से लाभ नहीं हुआ है, उन्हें लगातार बिजली कटौती, ख़राब पानी और अपर्याप्त चिकित्सा सुविधाआों का सामना करना पड़ता है.
यह स्थिति उन अस्पतालों में है जिन्हें कभी यूरोप के अस्पतालों के समान अच्छा माना जाता था. अधिकांश गलियों में, सड़कों पर आपको बच्चे स्कूल जाने के बजाए काम करते या भीख मांगते दिखते हैं.
एक समय था जब इराक़ में मध्य पूर्व में सबसे अच्छी शिक्षा प्रणाली हुआ करती थी. इराक़ के प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल-सुदानी ने एक नई शुरुआत का वादा किया है. उनकी सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार से निपटने के अपने वादे को निभाना है.
भ्रष्टाचार रूपी कैंसर देश को भीतर से खोखला कर रहा है. यहां तक कि उन्होंने ज़ब्त किए गए नोटों के ढेर से एक प्रसारण भी किया है जो इराक़ के ख़ज़ाने में लौटाए जा रहे थे. लेकिन जो लोग सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं वे हैं निर्दोष पीड़ित. केवल मृतक ही नहीं, बल्कि लाखों इराक़ी हैं जिनका जीवन हमले और उसके बाद के परिणामों के चलते पटरी से उतर गया है.
सिंजार के पास सामूहिक क़ब्र पर, यज़ीदी कार्यकर्ताओं ने अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा की अपील की है. जीवित बचे लोगों ने कहा कि 2014 में नरसंहार को अंजाम देने वाले इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों का लहजा इराक़ी था, कुछ तो पास के शहर तेल अफ़ार से थे.
25 वर्षीय यज़ीदी कार्यकर्ता फ़रहाद बरकत उस हमले में बच गए थे क्योंकि वह सिंजार पर्वत पर भागने में सफल रहे थे. उन्होंने कहा कि वे अभी भी अपने पड़ोसियों से डरते हैं.
उन्होंने कहा, हत्यारे उनके "आसपास के कबीलों या जनजातियों, अरब कबीलों से थे. तो यह कैसे संभव हुआ? जिन्होंने हमें मार डाला, यज़ीदी महिलाओं का बलात्कार किया, वे इराक़ी ही थे."
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