यूक्रेन की जंग के बीच पुतिन और शी जिनपिंग मॉस्को की मुलाक़ात से क्या चाहते हैं

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद पहली बार मॉस्को पहुंच रहे हैं जहां उनकी मुलाक़ात रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से होगी.

इससे पहले व्लादिमीर पुतिन साल 2022 की शुरुआत में चीन पहुंचे थे जिसके बाद दोनों देशों के नेताओं की ओर से गहरी दोस्ती वाला चर्चित बयान सामने आया था.

लेकिन शी जिनपिंग का मॉस्को दौरा रूस और चीन के लिए क्या लेकर आएगा, इससे यूक्रेन युद्ध किस तरह प्रभावित होगा और दोनों देशों के आपसी संबंधों पर इसका क्या असर होगा?

ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब बीबीसी के रूस संपादक स्टीव रोज़नबर्ग और चीन में संवाददाता स्टीफ़न मैकडॉनल ने दिए हैं.

पुतिन एक दोस्त से मदद की उम्मीद लगा रहे हैं - स्टीव रॉज़ेनबर्ग

कल्पना करिए कि आप व्लादिमीर पुतिन हैं. आपने एक ऐसा युद्ध शुरू किया है जो आपकी योजना के मुताबिक़ नहीं चल रहा है. आप प्रतिबंधों के दलदल में पूरी तरह धंस चुके हैं.

अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने आपके ख़िलाफ़ युद्ध अपराधों के मामले में गिरफ़्तारी का वारंट जारी किया है.

ऐसे समय पर आपको एक मित्र की ज़रूरत होगी. और ठीक ऐसे ही समय में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सामने आते हैं.

एक दौर की बात है जब शी जिनपिंग ने पुतिन को अपना सबसे अच्छा दोस्त बताया था. दोनों नेताओं में कई समानताएं भी हैं.

दोनों ही अधिनायकवादी नेता हैं जो ऐसे बहुध्रुवीय विश्व के विचार में यक़ीन रखते हैं जो अमेरिकी दबदबे वाला ना हो.

शी जिनपिंग के दौरे में दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय साझेदारी बेहतर बनाने और उसमें गहराई लाने के लिए एक समझौता होने की संभावना है.

चीनी राष्ट्रपति का रूस दौरा एक ऐसे वक़्त पर हो रहा है जब उस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी दबाव है.

ऐसे समय पर जिनपिंग का मॉस्को पहुंचना रूस और उसके नेता पुतिन के प्रति समर्थन का स्पष्ट संकेत जैसा है. और रूस के लिए चीन का साथ उसकी दोस्ती और पर पड़ रहे दबाव को झेलने के लिए काफ़ी अहम है.

नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाले पत्रकार दिमित्री मुरातोव मानते हैं, "पुतिन अपना गुट ख़ुद बना रहे हैं. वह अब पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करते हैं और अब वह शायद ऐसा कभी नहीं करेंगे.

ऐसे में पुतिन सहयोगियों की तलाश कर रहे हैं, और रूस चीन और भारत समेत लातिन अमेरिका और अफ़्रीका के कुछ देशों के साथ मिलकर एक साझा क़िला बनाने की कोशिश कर रहे हैं. पुतिन एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो पश्चिम विरोधी हो."

इस पश्चिम विरोधी दुनिया में रूस की चीन पर निर्भरता बहुत ज़्यादा है.

कार्नेगी एनडोमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस संस्थान से जुड़े वरिष्ठ शोधार्थी एलेक्ज़ेंडर गबुएव मानते हैं, "युद्ध अब रूस की आंतरिक राजनीति, विदेश नीति और आर्थिक नीति को शक्ल देने वाला सिद्धांत बन गया है. यूक्रेन को तबाह करना एक जुनून में बदल गया है.

इसके लिए आपको हथियार, पैसा और आर्थिक जीवन रेखा चाहिए. चीन कम से कम रूस को हथियारों के कलपुर्ज़े और टेक्नोलॉजी देता है जिसे सेना की ओर से इस्तेमाल किया जा सकता है. चीन इसके साथ ही रूस को पैसा भी देता है."

पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का सामना करने और रूसी अर्थव्यवस्था को ऊंचाई पर पहुंचाने के लिए रूस चीन के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को बढ़ा रहा है, विशेष रूप से ऊर्जा के क्षेत्र में,

पुतिन और शी जिनपिंग के बीच तेल, गैस और एनर्जी पाइपलाइन को लेकर भी बातचीत हो सकती है.

लेकिन एक बार फिर सोचकर देखें कि आप पुतिन हैं... एक साल पहले आपने और शी जिनपिंग ने कहा था कि आपकी दोस्ती की कोई सीमाएं नहीं हैं.

अगर सच में ऐसा है तो क्या आप चीन से ये उम्मीद कर सकते हैं कि वह रूस को मारक हथियार उपलब्ध कराकर सैन्य विजय हासिल करने में मदद करे?

अमेरिका का दावा है कि चीन इस पर विचार कर रहा है. चीन ने इस दावे का खंडन किया है.

चीन-रूस दोस्ती की सीमाएं

रूस में कहा जाता है कि किसी चीज़ को हासिल करने का ख़्वाब देखने में कोई नुक़सान नहीं होता है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वो चीज़ आपको मिलने ही जा रही है.

पिछले एक साल में अगर कुछ स्पष्ट हुआ है तो वो ये है कि इस गहरी दोस्ती की भी कुछ सीमाएं हैं.

चीन अब तक रूस को प्रत्यक्ष रूप से सैन्य मदद उपलब्ध कराने से बचता नज़र आया है क्योंकि उसे आशंका है कि इससे पश्चिमी मुल्कों में चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लग सकते हैं.

ऐसे में जहां तक चीन का सवाल है तो उसके लिए अपने हित रूस से पहले आते हैं.

यही बात रूस के सरकारी टीवी चैनल पर भी कही गई.

सैन्य मामलों के जानकार मिखाइल खोदरनोक ने कहा, "चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की रूस यात्रा से पहले कई विशेषज्ञ अति उत्साहित दिख रहे हैं. लेकिन चीन का सिर्फ़ एक सहयोगी हो सकता है - ख़ुद चीन. चीन की रुचि सिर्फ़ उन मुद्दों में हो सकती है जिससे उसके हित सधते हों. चीनी विदेश नीति में परोपकार के लिए जगह नहीं है."

शी जिनपिंग के पुतिन को दिए संकेतों की केवल तीन दिशाएं हैं - स्टीफ़न मैकडॉनल

आधिकारिक रूप से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के रूस दौरे का मक़सद दो पड़ोसियों के बीच द्विपक्षीय रिश्तों को बेहतर बनाना है.

दोनों देशों की सरकारों ने बताया भी है कि चीन और रूस एक दूसरे के क़रीब आ रहे हैं. ऐसे में अब जब चीनी राष्ट्रपति रूस पहुंच रहे हैं तो कुछ समझौतों पर हस्ताक्षर होंगे, लंच-डिनर होंगे और तस्वीरें खींची जाएंगी.

लेकिन इस तरह के दौरे तो सभी देशों के बीच होते हैं तो ये दौरा इतना ज़्यादा चर्चा में क्यों है?

इसकी पहली वजह ये है कि दुनिया की दो महाशक्तियों में से एक का सर्वोच्च नेता अपने सहयोगी देश जा रहा है जो साल 2023 में यूरोप के एक देश के साथ जंग लड़ रहा है.

कई विश्लेषकों ने इस बारे में विचार किया है कि रूस के सामने अगर युद्ध क्षेत्र में अपमानजनक हार का सामना करने का प्रश्न खड़ा हो जाए तो चीन क्या करेगा.

चीनी सरकार कहती है कि वह इस मामले को लेकर तटस्थ है. तो क्या वह एक क़दम पीछे खींचकर रूस को हारने देगी या रूसी सेना को मज़बूती देने के लिए हथियार देना शुरू करेगी.

शी जिनपिंग के मॉस्को पहुंचने के बाद वह और पुतिन कई चीज़ों पर बात कर सकते हैं, लेकिन ध्यान यूक्रेन संकट पर रहेगा.

तीन संकेत

वह पुतिन को तीन तरह से संकेत दे सकते हैं -

1. सम्मान बनाए रखते हुए क़दम पीछे खींच लिया जाना चाहिए

2. संघर्ष को जारी रखना चाहिए, साथ ही लड़ाई और तेज़ करना चाहिए

3. चीनी नेता इनमें से दोनों ही रास्तों को ना अपनाने का संकेत भी दे सकते हैं

चीन ने हाल ही में ईरान और सऊदी अरब के बीच राजनयिक रिश्ते बहाल करवाए हैं. इससे ये स्पष्ट हो गया है कि चीन अंतरराष्ट्रीय मामलों में दखल देना चाहता है.

इस लिहाज़ से जिनपिंग की ओर से पुतिन को तीसरा संकेत दिए जाने की संभावना नहीं है.

वहीं, ईरान-सऊदी अरब के बीच दोस्ती के बाद, चीन रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध रुकवाकर वैश्विक शांतिदूत का दर्जा हासिल करने में कामयाब होता है तो ये शी जिनपिंग के लिए बड़ी बात होगी.

इस विकल्प के साथ समस्या ये है कि इससे चीन को कितना लाभ होगा.

इसमें से सबसे ख़राब विकल्प तीसरा है. इसे इस तरह देखा जा रहा है कि रूस का यूक्रेन के साथ युद्ध चीन की भू-राजनीतिक रणनीति के साथ मेल खाता है.

रूस इस समय पश्चिमी देशों के साथ संघर्षरत रहते हुए नेटो देशों के हथियार और गोला-बारूद जैसे संसाधन ख़त्म कर रहा है.

और ये युद्ध जितना लंबा चलेगा, पश्चिमी देशों की जनता की संघर्ष बर्दाश्त करने की क्षमता की उतनी ही परीक्षा लेगा.

चीन का गणित ये हो सकता है कि अगर ये युद्ध चलता रहता है तो कम लोग एक नए युद्ध (ताइवान) में शामिल होना चाहेंगे.

चीनी सरकार की ओर से तटस्थता का दावा सरकारी कवरेज से भी मेल नहीं खाता.

चीन में शाम को दिखाए जाने वाले बुलेटिनों में रूसी पक्ष दिखाया जाता है और इस संघर्ष के लिए पश्चिमी देशों पर आरोप मढ़ने के लिए काफ़ी वक़्त दिया जाता है.

इन बुलेटिनों में युद्ध और आक्रमण जैसे शब्दों का उल्लेख नहीं होता.

सार्वजनिक रूप से चीन का मत ये है कि सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान होना चाहिए और इसके साथ ही सभी देशों की सुरक्षा से जुड़ी जायज़ चिंताओं का भी सम्मान होना चाहिए.

इसके बाद भी शी जिनपिंग यूक्रेन की राजधानी कीएफ़ नहीं रूस की राजधानी मॉस्को जा रहे हैं.

ऐसे में जब शी जिनपिंग मॉस्को से लौटेंगे तो पुतिन के सामने या तो कम होते चीनी समर्थन की चिंता होगी या दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली लोगों में से एक शख़्स का समर्थन मिलने से बढ़ा आत्मविश्वास होगा.

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