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ऑकस परमाणु पनडुब्बी समझौता: क्या अमेरिका और चीन ख़तरनाक संघर्ष के करीब पहुँच रहे हैं?
- Author, फ्रैंक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी रक्षा संवाददाता
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के बीच इस सप्ताह हुए परमाणु पनडुब्बी समझौते को लेकर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है और इसे ख़तरनाक कदम कहा है.
सोमवार को सेन डिएगो में इन तीनों देशों ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि उनके बीच ऑकस परमाणु पनडुब्बी समझौता हुआ है जिसके तहत नई और बेहद उन्नत तकनीक से लैस पनडुब्बियों का नया बेड़ा बनाया जाएगा.
ये एक तरह का रक्षा और सुरक्षा सहयोग है जिसका उद्देश्य एशिया प्रशांत इलाक़े में चीन की बढ़ती सामरिक ताक़त से निपटना है.
तीन पश्चिमी देशों के इस समझौते को लेकर चीन ने कहा है कि "ये ख़तरनाक रास्ते पर आगे बढ़ने जैसा है".
चीन का कहना है कि "ये अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताओं को दरकिनार करना है" और ऐसा कर "ये देश नए हथियारों और परमाणु हथियारों की दौड़ को बढ़ा रहे हैं."
इससे पहले चीन ने उस वक़्त भी पश्चिमी देशों को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी थी जब अमेरिकी संसद की स्पीकर नैंसी पेलोसी ने ताइवान का दौरा किया था.
चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, वहीं ताइवान खुद के अलग देश मानता है.
चीन दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश है, जिसके पास दुनिया की सबसे बड़ी जल सेना और थल सेना भी है. उसका कहना है कि ऐसा लगता है कि इस समझौते की मदद से अमेरिका और उसके सहयोगी देश उसका दायरा "सीमित" करना चाहते हैं.
तीख़ी बयानबाज़ी
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हाल में चीन के सैन्य बजट में बढ़ोतरी की घोषणा की थी और कहा था कि आने वाले वक्त में राष्ट्रीय सुरक्षा उनके लिए सबसे अहम चिंता का विषय होगा.
शी जिनपिंग के इस बयान के मद्देनज़र ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने भी हाल में ही बयान दिया था कि आने वाला वक़्त मुश्किलों भरा हो सकता है. उन्होंने इसी सप्ताह कहा था कि आने वाला दशक ख़तरनाक हो सकता है और हमें बढ़ती सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए तैयारी करनी चाहिए.
लेकिन स्थिति इस स्तर तक पहुंची कैसे? और क्या एशिया प्रशांत के इलाक़े में चीन, अमेरिका और उसके सहयोगी एक बड़े संघर्ष की तरफ़ क़दम बढ़ा रहे हैं.
चीन को लेकर पश्चिमी मुल्कों का आकलन ग़लत रहा है. सालों तक इन देशों के विदेश मंत्रालयों का अनुमान ये रहा कि आर्थिक उदारीकरण के बाद चीन का समाज खुलेगा और वहां अधिक राजनीतिक स्वतंत्रता भी होगी.
ये माना गया कि जैसे-जैसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन में अपने ज्वाइंट प्रोजेक्ट लगाएंगी वहां के हज़ारों लाखों लोगों को रोज़गार का अवसर मिलेगा, उनके जीवन जीने का स्तर बेहतर होगा और इसका एक नतीजा ये होगा कि देश की जनता पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की पकड़ ढीली पड़ने लगेगी. इससे वहां की मौजूदा व्यवस्था में गणतांत्रिक सुधार आएंगे और वो "नियमों पर आधारित एक वैश्विक वर्ल्ड ऑर्डर" का हिस्सा बन सकेगा.
लेकिन स्पष्ट है कि ऐसा हुआ कुछ भी नहीं हुआ.
लेकिन हां, चीन आर्थिक तौर पर और मज़बूत होता गया और वक़्त के साथ वो ग्लोबल सप्लाई चेन का बेहद अहम हिस्सा बन गया. कई देशों के लिए वो सबसे महत्वपूर्ण व्यापार सहयोगी बन गया.
लेकिन आर्थिक स्तर पर हुई इस प्रगति के साथ वहां न तो गणतंत्र आया और न ही वहां उदारीकरण दिखा, बल्कि चीन ऐसी राह पर निकल पड़ा जिसने जापान, दक्षिण कोरिया और फ़िलिपींस जैसे उसके पड़ोसियों के साथ-साथ अमेरिका को भी सचेत कर दिया.
बीते सालों में चीन और पश्चिमी मुल्कों के बीच तनाव के कई मुद्दे सामने आए
ताइवान: चीन बार-बार कहता है कि चीन इस स्वायत्त प्रदेश को अपनी मुख्यभूमि में शामिल करेगा, और ज़रूरत पड़ी को इसके लिए ताक़त के इस्तेमाल से चूकेगा नहीं. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि आधिकारिक तौर पर अमेरिका की नीति सैन्य कार्रवाई की स्वीकृति नहीं देती, लेकिन अमेरिका ताइवान की सुरक्षा के लिए ज़रूर आगे आएगा.
दक्षिण चीन सागर: हाल के सालों में चीन ने दक्षिण चीन सागर में अपने कई कृत्रिम द्वीप बनाए हैं और वहां कुछ जगहों पर अपने सैन्य अड्डों का विस्तार किया है. वो इस इलाक़े को "ऐतिहासिक तौर पर" अपना हिस्सा मानता है. हालांकि अमेरिका कहता है कि ये अंततराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन है.
तकनीक: चीन पर आरोप लगता रहा है कि उसने अपने पास बड़ी मात्रा में लोगों का निजी डेटा चुराकर स्टोर किया है. उस पर व्यापार में फ़ायदे के लिए इन्टेलेक्चुअल प्रॉपर्टी चुराने का भी आरोप लगाया गया है.
हॉन्ग कॉन्ग: चीन ने हॉन्ग-कॉन्ग में गणतंत्र के समर्थन में हुए विरोध प्रदर्शनों का सफलतापूर्वक दमन किया और यहां कई कार्यकर्ताओं को जेल में बेद कर दिया गया.
वीगर अल्पसंख्यक मुसलमान: सैटलाइट डेटा और प्रत्यक्षदर्शियों से मिली जानकारी के आधार पर कई पश्चिमी मुल्क चीन पर आरोप लगाते हैं शिनजियांग प्रांत में विशेष कैम्प बनाए गए हैं जिनमें अल्पसंख्यक वीगर समुदाय के लोगों को जबरन रखा गया है. उन्हें यातनाएं दी जा रही हैं और उनसे ज़बरदस्ती काम करवाया जा रहा है.
सैन्य ताक़त की बात करें तो आज चीन ऐसी शक्ति बन चुका है जिससे मुक़ाबला आसान नहीं है.
हाल के सालों में उसकी पीपल्स लिबरेशन आर्मी का आकार ना सिर्फ़ पहले से कहीं अधिक बड़ा हुआ बल्कि तकनीक के क्षेत्र में उसने कई मुकाम हासिल किए हैं.
उदाहरण के तौर पर चीन की डोंग फेंग हाइपरसॉनिक मिसाइल माक 5 स्पीड (आवाज़ की गति से पांच गुना तेज़) अपने दुश्मन पर हमला कर सकता है. ये मिसाइल बड़ी मात्रा में विस्फोटक और परमाणु हथियार ले जाने मे सक्षम है.
चीनी सेना की बढ़ती ताक़त जापान के योकोसुका में मौजूद अमेरिकी जल सेना की टुकड़ी के लिए गंभीर चिंता का विषय है. उनके सामने एक बड़ा सवाल ये है कि वो घातक मिसाइलों वाले चीन के तट के कितना क़रीब जा सकते हैं.
परमाणु बैलिस्टिक मिसाइलों की बात करें तो इस क्षेत्र में भी चीन ने एक नया कार्यक्रम शुरू किया है और इस तरह के हथियारों की संख्या तीन गुनी करने की कोशिश में है. इसके लिए वह पश्चिमी इलाक़े में हथियारों के नए भंडार भी बना रहा है.
हालांकि इसका मतलब ये कतई नहीं है कि चीन युद्ध चाहता है. ऐसा नहीं है.
ताइवान के मामले में चीन चाहता है कि वो बिना कोई गोली चलाए उस पर दबाव बनाए और ताइवान ख़ुद उसका हिस्सा बनने की हामी भर दे.
हॉन्ग कॉन्ग, वीगर मुसलमानों और इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी के मामले में चीन को ये पता है कि इस मामले में उसकी आलोचना वक़्त के साथ कम हो जाएगी क्योंकि चीन के साथ दुनिया के कई मुल्कों का व्यापार है जो उनके लिए बेहद अहम है.
मौजूदा व़क़्त में चीन और पश्चिमी देशों के बीच तनाव अपने चरम पर है और हो सकता है आने वाले समय में उनके बीच टकराव के नए मुद्दे भी बनें.
लेकिन दोनों ही पक्षों को इस बात का अंदाज़ा है कि एशिया प्रशांत में युद्ध किसी के हित में नहीं होगा. ऐसे में भले ही दोनों एक दूसरे के ख़िलाफ़ तीखी बयानबाज़ी करें और ऑकस जैसे समझौते पर सहमत हों, लेकिन चीन, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की दिलचस्पी युद्ध में नहीं है.
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