तुर्की भूकंपः मौत को मात देने वाले अब क्यों परेशान

- Author, सेलिन गिरित
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस, तुर्की
तुर्की और सीरिया में हालिया विनाशकारी भूकंप में मरने वालों की संख्या 50,000 के पार हो गई है. लाखों लोग बेघर हो गए हैं.
इस आपदा में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित लोगों की दिमागी सेहत पर बहुत असर पड़ा है. भूकंप से बचे लोगों, राहत और बचाव में लगे लोगों और विशेषज्ञों से बीबीसी ने बात की.
खंडहर में तब्दील हो चुके अंधेरे में डूबे अंताक्या शहर में हम आधी रात को पहुंचे. हमारी कार ख़राब हो गई थी और ड्राइवर ने हमें सिटी सेंटर तक ले जाने से इनकार कर दिया.
दक्षिण पूर्वी तुर्की में भूकंप आए तीन दिन हो चुके थे. हमारी टीम भूकंप के केंद्र मारास से लौटी थी. उस समय तक हज़ारों लोगों की मौतों की पुष्टि हो चुकी थी और ये संख्या लगातार बढ़ रही थी.
जब हम अंताक्या की मुख्य सड़क से आगे बढ़े, मलबे के इर्द गिर्द एंबुलेंस के सायरन लगातार सुनाई दे रहे थे.
मदद ले जा रहे ट्रक, बुलडोज़र और वालंटियर मीलों तक जाम में फंसे थे. जमा देने वाली ठंड में ये पूरी तरह से अफरा तफरी का माहौल था.
तुर्की वालंटियर रेस्क्यू एसोसिएशन 'आकुत' के बुराक गालिप आकुर्त और उनकी टीम एक चार मंजिला ढही इमारत में राहत और बचाव का काम कर रहे थे. उन्हें शक हुआ कि मलबे के नीचे 10 लोग ज़िंदा दबे हुए हैं जिनमें पांच बच्चे हैं.

'लगा कि पागल हो जाऊंगी'
अंधेरे को चीरती हुई टार्च की रोशनी के बीच उन्होंने चिल्लाकर पूछा, "कोई मुझे सुन सकता है?"
उस समय पूरे तुर्की में ये जाना पहचाना और दिल में सिहरन ला देने वाला सवाल बन गया था.
सवाल के तुरंत बाद वे बिल्कुल ख़ामोश होकर जवाब में ज़रा सी भी आवाज़ या हिलने डुलने का संकेत पाने की कोशिश कर रहे थे. हो सकता है कि मलबे से उंगलियों की हलचल या कोई क्लिक की आवाज़ आ जाए.
ख़ामोशी के उन्हीं पलों में मैंने बुराक से पूछा, "जब मलबे के नीचे से कोई आवाज़ सुनाई देती है तो इसका आप पर क्या असर होता है?"
उन्होंने बताया कि राहत और बचाव की कोशिशों को जारी रखने के लिए अपने जज़्बात पर काबू रखना होता है लेकिन जब ये अभियान ख़त्म हो जाएगा, उनके ज़ेहन पर इसका बहुत असर होगा और जिन चीज़ों के वे गवाह रहे थे, उसके बारे में उन्हें मनोचिकित्सक की मदद की ज़रूरत पड़ेगी.
वो कहते हैं, "जो कुछ आप देख चुके हैं उससे उबरना इतना आसान नहीं है. ये सदमे वाला है और साथ ही बहुत नाटकीय भी."
उस रात जिस इमारत में वो बचाव का काम कर रहे थे, उसमें कोई भी ज़िंदा नहीं बचा.
अगले दिन मैं डिलेक एगर से मिली. पड़ोसी कस्बे इस्केंदरुन की एक क्षतिग्रस्त इमारत के मलबे में वो आठ घंटे तक दबी रहीं और उन्हें बचा लिया गया.
उन्होंने बताया, "भूकंप बहुत ताक़तवर था. मैं तुरंत अपने बिस्तर से उठ गई और अपने मां बाप के कमरे की ओर भागी. मैं बदहवास होकर चिल्ली रही थी. लेकिन मेरी मां, पिता, भाई सभी बिल्कुल ख़ामोश थे. मुझे लगा मैं पागल हो जाउंगी."

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मरते हुए मां ने बचाया
डिलेक के मां बाप और भाई ने मलबे के अंदर ही दम तोड़ दिया था. वो मलबे में बुरी तरह फंस गई थीं, उनके चारों ओर टूटे हुए शीशे थे और उनका सिर्फ सिर ही बाहर दिख रहा था. एक पारिवारिक मित्र ने उन्हें पहचाना और उसने अपने हाथों और चाकू के सहारे उन्हें निकाला.
दो दिन तक वो कुछ भी करने की हालत में नहीं थीं लेकिन अपनी नानी के घर में सोफ़े पर लेटे हुए बहुत धीमी आवाज़ में अपने दर्दनाक़ अनुभवों के बारे में उन्होंने मुझसे बात की. जिन हालात से वो गुजरी थीं, वे भावनाएं उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही थीं.
उनके पास मां को गले लगाए हुए फोटो थी. उन्होंने फोटो चूमा और उस पर हाथ फेरते हुए सुबक पड़ीं.
उन्होंने कहा, "मेरी मां ने मेरी बाहों में अंतिम सांस ली. मरते हुए भी उन्होंने मुझे बचाया, क्योंकि वो मेरे ऊपर थीं. मैं उनके लिए कुछ नहीं कर पाई."
"मेरा भाई दूसरे कमरे में फंसा हुआ था और मेरे पिता दर्द से कराह रहे थे. इसके तुरंत बाद पूरी इमारत ढह गई. आप जिन्हें प्यार करते हैं उन्हें अपनी आंखों के आगे मरता हुआ देख रहे हैं. मुझे कोई ग़ुस्सा या बदले की भावना का अहसास नहीं है. मैं बस खालीपन महसूस कर पा रही हूं."
डिलेक उन दसियों हज़ार लोगों में से एक हैं जो भूकंप से ज़िंदा बच गए लेकिन अब उनके सामने एक ऐसी ज़िंदगी है जिसका सदमा शायद ज़िंदगी भर रहेगा.
इसी हफ़्ते मुझे एक अन्य 'सर्वाइवर' का संदेश मिला. उन्होंने लिखा, "जो ज़िंदा बच गए हैं वे पूरी ज़िंदगी मलबे के अंदर दबे रहने की भावना से उबर नहीं पाएंगे."

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सदमे से उबरना चुनौती
मनोचिकित्सकों का कहना है कि इस तरह के सदमे वाली घटनाओं में बच गए लोगों में सदमे के कई चरण दिख सकते हैं.
शुरुआती सदमा, बेचैनी और डर जल्द ही 'स्टेट ऑफ़ डिनायल' (परिस्थितियों को स्वीकार न करने) में बदल जाएगा.
तुर्की साइकोलॉजिस्ट एसोसिएशन के कैगे डुरू का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर हुए सदमे से उबरना आसान नहीं है लेकिन इस बारे में बात करना और जो कुछ अनुभव हुए उसके बारे में अपनी भावनाओं और विचारों को ज़ाहिर करना, घाव भरने का पहला चरण है.
डुरू आगाह करते हैं कि दुख के इस समय अगर इन ज़रूरतमंदों को मनोचिकित्सकीय और सामाजिक संबल नहीं मिलेगा तो बहुत सारे लोगों मानसिक बीमारियों का शिकार हो सकते हैं जैसे कि पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी), डिप्रेशन या नशाखोरी.
"हम सभी को एक दूसरे से पूछने की ज़रूरत है, आप कैसे हैं? क्या आपको किसी मदद की ज़रूरत है?"
"हमें कहना होगा. हम आपके साथ हैं. हमें ये संदेश देना होगा कि हम ज़रूरतमंदों के साथ एकजुट होकर खड़े हैं और हम उनके अनुभवों को समझने की कोशिश कर रहे हैं, हम उनकी बात सुन रहे हैं, उन्हें सहारा दीजिए और अपनी संवेदनाएं प्रकट कीजिए."
उन्होंने आगाह किया कि सामान्य होने का मतलब ये नहीं है कि भूकंप के पहले जैसी ज़िंदगी वापस आ जाएगी, ये एक 'न्यू नॉर्मल' है और इसे संवारने की ज़रूरत है और इसमें समय लगेगा.
लेकिन पहले से ध्वस्त हो चुके हताय कस्बे में जब दोबारा भूकंप आए तो इस काम में मुश्किलें और बढ़ गईं.
हालांकि ये झटके शुरू के दो झटकों इतने ताक़तवर नहीं थे, लेकिन पहले से ही डरे लोग सड़कों पर आ गए. वो हताशा में रोने लगे और उन्हें लगा कि क्या इस दुःस्वप्न का कोई अंत नहीं होने जा रहा. कुछ गुस्से में थे और कह रहे थे कि ज़िंदगियों को बचाने के लिए बहुत कुछ किया जा सकता था.
मैं आपदाग्रस्त इलाक़े से लौट कर इस्तांबुल आ गई हूं लेकिन मैं अभी भी उन सदमों से घिरी हुई हूं. लाखों लोगों की तरह टीवी स्क्रीन और मोबाइल फ़ोन पर देख रही हूं.
चूंकि तुर्की का सबसे बड़ा शहर एक बड़े फ़ॉल्ट लाइन पर बसा है, यहां लोग सिवाय ये पूछने के कोई मदद नहीं कर सकते कि क्या भविष्य में भी उनके साथ ऐसा ही हादसा होगा? इसे रोकने के लिए वे क्या कर सकते हैं?
चारों तरफ़ पसरे दुख के बीच सामूहिक सदमे और इससे कैसे निपटें ये सवाल इस समय तुर्की के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है.

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