तुर्की: मलबे में फंसे लोगों की तलाश किस तरह की जा रही है

- Author, तमारा कोवासेविक
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
तुर्की और सीरिया में सोमवार को आए जबरदस्त भूकंप में 20 हजार लोगों की मौत हुई है जबकि हज़ारों घायल हैं. इस हाल में दुनियाभर से स्पेशलिस्ट रेस्क्यू टीमें वहां पहुंच रही हैं, ताकि जल्द से जल्द ज़्यादा लोगों को मलबे से निकाला जा सके.
हालांकि भूकंप से बेहद प्रभावित इलाक़ों में कुछ लोग ये भी कहते हुए सुने जा रहे हैं कि यहां राहत और बचाव कार्य धीरे चल रहा है. कुछ लोगों को अपने करीबियों की तलाश में अपने हाथों से ही मलबा हटाना पड़ रहा है.

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रेस्क्यू ऑपरेशन में कैसे होती है लोगों की तलाश?
भूकंप वाली जगह पर पहुंचने के बाद रेस्क्यू टीमें सबसे पहले इमारतों में होने वाले नुक़सान का अनुमान लगाती है. सबसे पहले इसका अंदाज़ा लगाया जाता है कि कितनी इमारतें गिरी हैं, कितना मलब जमा है और इसमें कितने लोगों के दबे होने की आशंका है.
इसकी शुरुआत खाली जगहों की तलाश के साथ की जाती है. खाली जगह यानी कंक्रीट के बीम या पिलर्स, या फिर सीढियों के नीचे की खाली जगह. यहां लोगों के छिपने की संभावना ज़्यादा होती है.
इस दौरान जब रेस्क्यू टीम के लोग सर्वाइवर्स तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, तब सपोर्ट वर्कर्स इमारतों, मलबों में हलचल पर नज़र रखते हैं और बड़े गौर से यहां से आनेवाली आवाज़ों पर कान लगाए रहते हैं.
जो इमारत पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है, वहां लोगों की तलाश सबसे बाद में की जाती है, क्योंकि यहां किसी के जिंदा दबे होने की संभावना ना के बराबर होती है.
रेस्क्यू टीम का पूरा काम एक एजेंसी के ज़रिए को-ऑर्डिनेट किया जाता है. इसमें आमतौर पर संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ प्रभावित देश शामिल होते हैं. रेस्क्यू टीम को मिलकर या इससे बड़ी यूनिट के रूप में काम करने की स्पेशल ट्रेनिंग दी गई होती है. कई जगहों पर इनकी मदद के लिए स्थानीय लोग भी आगे आते हैं.

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रेस्क्यू के लिए ज़रूरी औजार
मलबे को हटाने के लिए रेस्क्यू टीम भारी मशीनों का इस्तेमाल करती है. इसमें खुदाई के लिए भारी मशीनों (डिगर्स) से लेकर हाइड्रॉलिक जैक्स शामिल होते हैं.
खुदाई वाली मशीनों से बिल्डिंग के बाहर गिरे कंक्रीट स्लैब को हटाया जाता है, ताकि रेस्क्यू टीम अंदर दबे हुए लोगों की स्थिति का क़रीब से अंदाजा लगा सके.
इसके अलावा रेस्क्यू टीम को किसी लचीले पोल के ज़रिए वीडियो कैमरा भी मलबे के बीच खाली जगहों में पहुंचाना होता है, इससे इससे दबे हुए लोगों को ढूंढना थोड़ा आसान हो जाता है.

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इसके अलावा स्पेशल साउंड इक्वीपमेंट्स भी रेस्क्यू टीम के साथ होते हैं, जो कुछ मीटर के दायरे में हल्की से हल्की आवाज़ों को पकड़ने में सक्षम होते हैं. इससे उन लोगों की आवाज़ सुनने की कोशिश की जाती है जो मलबे में फंसे हैं.
इस दौरान काफी खामोशी बरती जाती है. रेस्क्यू टीम तलाशी के क्षेत्र में मलबे पर तीन बार दस्तक देती है, इसके बाद ध्यान से उस आवाज़ के बदले आने वाली हलचल को सुनती है.
इस दौरान कार्बन डाइऑक्साइड डिटेक्टर्स का भी इस्तेमाल होता है जिससे बेहोश हुए लोगों का पता लगाया जाता है. इस तरीक़े का इस्तेमाल ज़्यादा संकरी जगहों में किया जाता है. अगर किसी जगह पर कार्बन डाइऑक्साइड का घनत्व ज़्यादा है तो इसका मतलब ये कि यहां फंसे लोग अभी जिंदा है और सांस ले रहे हैं.
रेस्क्यू टीम 'थर्मल इमेजिंग' के लिए भी एक इक्वीपमेंट इस्तेमात में लाती है. इसका इस्तेमाल रेस्क्यू टीम की जगह से अलग किया जाता है, क्योंकि जिस जगह पर जीवित लोग फंसे होते हैं उस जगह पर उनके शरीर की गर्मी से तापमान समान्य से ज़्यादा होता है.
रेस्क्यू में डॉग स्क्वॉड का इस्तेमाल
कुत्तों में सूंघने की जबरदस्त शक्ति होती है. इसका इस्तेमाल रेस्क्यू टीम उन जगहों पर लोगों की तलाश के लिए करती हैं, जहां किसी के जिंदा होने का अनुमान भारी मलबे की वजह से लगाना मुश्किल होता है.
इसके अलावा कुत्ते बहुत तेज़ी से एक बड़ा इलाक़ा कवर कर लेते हैं, जिससे तलाशी और बचाव कार्य में तेज़ी आ सकती है.

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हाथों से मलबा हटाने की ज़रूरत कब?
एक बार जब इमारतों के भारी-भरकम हिस्से और स्लैब हटा लिए जाते हैं, रेस्क्यू टीम अपने हाथों के साथ छोटे-छोटे औजारों से मलबा हटाना शुरू करती है.
इनमें हथौड़ा, कुदाल, फावड़ा के साथ चेन वाली आरी, डिस्क कटर्स और सरिया काटने वाले औजार शामिल होते हैं. इनके ज़रिए लोहे के छड़ और कंक्रीट को काटकर हटाया जाता है.
रेस्क्यू टीम अपनी सुरक्षा के लिए भी हैमलेट और ग्लव्स जैसी चीजों का इस्तेमाल करती है, ताकि खुदाई और मलबा हटाने के दौरान उन्हें सिर और हाथों में चोट न आए.
हालांकि तुर्की के कुछ इलाक़ों में, जहां भारी मशीनों की कमी के कारण बचाव कार्य धीरे चल रहा है, वहां स्थानीय लोग अपने हाथों से ही मलबा हटाने में मदद कर रहे हैं.
दक्षिणी तुर्की में एक रेस्टोरेंट चलाने वाली बेदिया ग्यूकम ने बीबीसी को बताया, "हमें हाथों से मलबा हटाने के लिए मज़बूत ग्लव्स चाहिए, क्योंकि जैसे ही मलबे के अंदर किसी के जिंदा होने की आवाज़ सुनाई देती है रेस्क्यू टीम को भारी मशीनों का काम रोकना पड़ता है. तब हमें अपने हाथों से ही मलबा हटाना पड़ता है और ये लगभग इंसानी क्षमता से बाहर का काम है."
बेदिया कहती है, "अगर आपको मदद के लिए ज़्यादा लोगों की ज़रूरत है तो उसके लिए आपको अच्छए और मज़बूत ग्लव्स की भी ज़रूरत है."

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किसी साइट पर बचाव अभियान कब ख़त्म माना जाता है
इस बात का फ़ैसला संयुक्त राष्ट्र संघ की को-ऑर्डिनेशन टीम प्रभावित देश की केन्द्र और स्थानीय सरकार की टीम के साथ मिलकर करती है.
मलबे में फंसे लोगों की तलाशी और रेस्क्यू ऑपरेशन आमतौर पर आपदा के पांच से सात दिन के बाद ख़त्म घोषित किया जाता है. जब एक या दो दिन में कोई ज़िंदा शख्स किसी भी साइट से नहीं मिलता.
हालांकि कई बार ऐसा भी हुआ है, जब इस तय सीमा के बाद भी हादसाग्रस्त जगह से लोगों को जिंदा निकाला गया.
2010 में जब हेती में भूकंप आया था, तो यहां एक मलबे से एक शख्स को 27 दिन बाद बार निकाला गया था.
इसी तरह 2013 में बांग्लादेश में आए भूकंप के बाद एक फैक्ट्री के मलबे से एक महिला को 17 दिन बाद बाहर निकाला गया था.
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