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पाकिस्तान को आर्थिक तबाही से बचा पाएगा आईएमएफ़ का कर्ज़?
- Author, कैरोलाइन डेवीस
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद
पाकिस्तान अपने विदेशी मुद्रा भंडार के ख़ाली होने के ख़तरे से दो-चार है.
इस समय भारत का ये पड़ोसी देश अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज़ लेने का अंतिम प्रयास कर रहा है.
देश हर दिन गहरे आर्थिक संकट में डूबता जा रहा है.
पाकिस्तान के पास एक महीने के आयात के लिए ही डॉलर बचे हैं. देश आसमान छूते विदेशी कर्ज़े पर ब्याज़ देने तक के लिए भी सघंर्ष कर रहा है.
गुरुवार को पाकिस्तान में आईएमएफ़ की टीम पहुँची है. ये टीम 10 दिन वहाँ रहेगी. इन 10 दिनों में आर्थिक संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय फ़ंड जारी करने पर बातचीत होगी.
जनवरी में पाकिस्तान की वार्षिक मंहगाई दर 27 फ़ीसदी थी. ये 1975 के बाद पाकिस्तान में मुद्रास्फीति की सर्वाधिक दर है.
पाकिस्तान के इस चुनावी साल में वहाँ की अर्थव्यवस्था के डूबने का डर अब बढ़ता जा रहा है.
इसी हफ़्ते पाकिस्तानी रुपया डॉलर के मुक़ाबले 275 तक पहुँच गया है. ये पिछले साल इन दिनों 175 के आस-पास था.
इसकी वजह से पाकिस्तान को सामान ख़रीदना और बेचना महंगा पड़ रहा है. पाकिस्तान की सबसे पड़ी समस्या यही है - विदेशी मुद्रा भंडार की कमी.
पाकिस्तानी पंजाब के फ़ैसलाबाद शहर की जुबली फ़ैक्टरी के लिए भी यही दिक़्क़त थी. ये फ़ैक्टरी अब बंद हो गई है.
फ़ैक्टरी के मालिकों के पास कच्चा माल ख़रीदने के लिए डॉलर नहीं थे.
समस्या
फ़ैक्टरी के मैनेजर फ़हीम ने बीबीसी को बताया, "अगर हम कच्चा माल आयात नहीं कर सकते, तो सामान बनाएँगे कैसे? हम पहले ही बड़ा घाटा सह चुके हैं. हमने सभी 300 कर्मचारियों को घर भेज दिया है."
जुबली फ़ैक्टरी दरअसल एक बड़ी प्रिंटिग प्रेस है. ये बंद रहने के बाद पिछले महीने ही दोबारा चालू हुई थी.
बंद पड़ी मशीनों के बीच से गुज़रते हुए फ़हीम कहते हैं कि फ़ैक्टरी चीन से सामान आयात करने के लिए डॉलर का इंतज़ाम नहीं कर पा रही है क्योंकि बैंक उन्हें विदेशी मुद्रा देने से इनकार कर रहे हैं.
जानकारों का कहना है कि पाकिस्तान ने कृत्रिम तौर से मुद्रा एक्सचेंज रेट को नियंत्रण में रखा है. इसकी वजह से सिस्टम में डॉलर की भारी किल्लत हो गई है.
पिछले महीने के अंत तक उन्होंने पाकिस्तानी रुपए को डॉलर के मुक़ाबले गिरने दिया, जिससे कुछ व्यवसायों को तो लाभ हुआ होगा लेकिन उससे महंगाई और बढ़ गई.
पाकिस्तान भर में व्यवसायी कह रहे हैं कि उन्हें या तो उत्पादन बंद करना पड़ रहा है या अपने काम की रफ़्तार कम करनी पड़ रही है.
कई फ़ैक्टरियों का सामान बंदरगाहों पर पहुँच चुका है, लेकिन उस छुड़ाने के लिए बैंकों से डॉलर नहीं मिल रहे
जनवरी में पाकिस्तान के एक मंत्री ने बीबीसी को बताया था कि कराची की दो बंदरगाहों पर 8,000 कंटेनर पड़े हैं. इनमें दवाओं से लेकर खाना तक भरा पड़ा है.
इनमें से अब कुछ सामान छुड़ाया जा रहा है लेकिन अब भी अधिकतर कंटेनर भरे हुए हैं.
मुसीबतों का पहाड़
दुनिया के कई देशों की तरह पाकिस्तान कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध की मार झेल रहा है.
युद्ध की वजह से दुनिया में तेल की क़ीमतें बढ़ी हैं. पाकिस्तान पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर निर्भर है.
तेल की बढ़ती क़ीमतों के कारण खाने-पीने का सामान भी महंगा हो गया है.
बात साफ़ है. अगर रुपए की क़ीमत गिरती है, तो तेल महंगा होगा और उसका असर उन सब चीज़ों पर पड़ेगा, जिन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता है.
कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के अलावा पाकिस्तान की मुसीबतों में पिछले साल की बाढ़ ने भी इज़ाफ़ा किया है.
संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि पिछले साल की बाढ़ में 16 बिलियन यूएस डॉलर का नुकसान हुआ है.
पाकिस्तान का एक बड़ा भू-भाग पानी में डूब गया था. खेती वाली ज़मीन तबाह हो गई थी और अनाज पैदा करने की क्षमता बाधित हो गई थी.
इसके बाद ज़रूरत की चीज़ें जैसे गेहूँ और प्याज के दाम आसमान छूने लगे.
ये सारी दिक़्क़्तें एक ऐसे दौर में आ रही हैं, जब देश का सियासी पारा चढ़ता जा रहा है. साल के अंत तक पाकिस्तान में आम चुनाव होने हैं.
जहाँ तक बात बाहर से आर्थिक मदद की है, तो पाकिस्तान इसका आदी है. पाकिस्तान का मिलिट्री बजट बहुत अधिक है. और वहाँ बुनियादी ढाँचे पर ख़र्च भी कर्ज़े में लिए धन से ही किया जाता है. इसकी सब्सिडी भी एक समस्या ही है.
इन सभी कारणों से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था कभी स्थिर नहीं रह पाती है.
इस्लामाबाद के एसडीपी इंस्टीट्यूट के विश्लेषक डॉक्टर साजिद अमीन जावेद कहते हैं, "अगर आप पाकिस्तान के इतिहास पर नज़र दौड़ाएँ, तो हम बैलेंस ऑफ़ पेमेंट्स के संकट से जूझते रहे हैं."
"हम हर बार आईएमएफ़ के पास जाते हैं. फिर कड़ी शर्तों वाले आर्थिक सुधार लागू करते हैं. हम शुरू के दो-तीन सालों में सुधारों को सख़्ती से लागू करते हैं. लेकिन फिर चुनावी साल आ जाता है और सब पलट जाता है."
डॉक्टर जावेद कहते हैं कि पाकिस्तान में सब्सिडी का प्रयोग वोटरों को रिझाने के लिए किया जाता रहा है.
पाकिस्तान अगला श्रीलंका है क्या?
पिछले साल अप्रैल में सत्ता से हटाए गए इमरान ख़ान, साल 2018 में सत्ता में आए थे. उन्होंने वादा किया था कि वे देश की माली हालत को सुधार देंगे.
उन्होंने ये भी कहा था कि वो इसके लिए आईएमएफ़ की मदद नहीं लेंगे. लेकिन उनके दौर में भी महंगाई आसमान छूने लगी और पाकिस्तानी रुपया गिरने लगा.
इस वजह से इमरान ख़ान आईएमएफ़ से छह अरब डॉलर का कर्ज़ लेने को मजबूर हो गए. अब जो बातचीत हो रही है, वो इसी कर्ज़े के बचे हुए 1.1 अरब डॉलर के बारे में है.
मूल समझौते के तहत ये पैसे पाकिस्तान को बीते नवंबर में ही मिल जाने चाहिए थे, लेकिन आईएमएफ़ और पाकिस्तान के बीच बातचीत लगातार बेनतीजा ख़त्म होती रही हैं.
पाकिस्तान की मौजूदा सरकार और इमरान ख़ान की पार्टी तहरीके इंसाफ़ के भी अतीत में आईएमएफ़ से मतभेद रहे हैं. लेकिन इस समय पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार इतना सिकुड़ गया है कि उसके पास कोई विकल्प ही नहीं बचा है.
आईएमएफ़ और पाकिस्तान के बीच बातचीत काफ़ी मुश्किलों भरी रही है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ कह चुके हैं कि आईएमएफ़ के अधिकारी उनके वित्त मंत्री पर काफ़ी दवाब में डाल रहे हैं.
पिछले महीने एक इंटरव्यू में इमरान ख़ान ने कहा था कि पाकिस्तान में हालात ऐसे ही रहे तो देश श्रीलंका की राह पर चल सकता है.
पिछले साल श्रीलंका में ईंधन, खाद्यान और अन्य ज़रूरी सामान ख़रीदने के लिए पैसे ख़त्म हो गए थे.
श्रीलंका के नागरिकों ने राष्ट्रपति भवन पर कब्ज़ा कर लिया था. राष्ट्रपति को अपना पद छोड़ने पड़ा और अंतरिम सरकार सत्ता में आई.
डॉक्टर जावेद कहते हैं ये तुलना ग़ैर-वाजिब है.
वे कहते हैं, "दोनों देशों की अर्थव्यवस्था का आकार बिल्कुल अलग है. दूसरा पाकिस्तान को चीन, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे मित्र देशों से हमेशा अच्छी मदद मिलती रही है."
लेकिन डॉक्टर जावेद की भी चिंताएँ हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "श्रीलंका के साथ एक चीज़ जो समान है, वो है राजनीतिक अस्थिरता. और आने वाले वक़्त में आर्थिक संकट से निकलने के लिए इससे निपटना ज़रुरी होगा."
लेकिन पाकिस्तान की मौजूदा सरकार और इमरान ख़ान की पार्टी पीटीआई के बीच दुश्मनी गहराती जा रही है.
इमरान ख़ान जब से सत्ता से हटाए गए हैं, वे देश भर में रैलियाँ और मार्च निकालते रहे हैं.
उनका दावा है कि उन्हें पद से हटाना संविधान की नज़र में ग़लत था और पाकिस्तान में तुरंत चुनाव करवाए जाएं.
पाकिस्तान सरकार वक़्त से पहले चुनाव की मांग ठुकराती रही है.
देश के योजना मंत्री अहसन इक़बाल कहते हैं, "एक व्यक्ति के निजी हित के कारण हम सारे देश को ख़तरे में नहीं डाल सकते. इस वक़्त चुनाव करवाने का अर्थ है चार या पाँच महीने तक देश में अनिश्चितता."
लेकिन एक बात पर दोनों पक्ष सहमत हैं - बिना राजनीतिक स्थिरता के आर्थिक स्थिरता मुमकिन नहीं है.
सारे पत्ते आईएमएफ़ के हाथ में
तो क्या पाकिस्तान में हालात सुधरेंगे?
साफ़ शब्दों में कहें तो पाकिस्तान को डॉलर चाहिए और वो भी तुरंत, ताकि देश का चूल्हा-चौका चलता रहे.
जैसे-जैसे गर्मी आएगी बिजली की ख़पत बढ़ेगी. लोग फ़ैन चलाएँगे, एसी चलाएँगे. ऊर्जा की मांग बढ़ेगी. और इससे पाकिस्तान के लगभग ख़त्म हो चुके विदेशी मुद्रा भंडार पर दवाब बहुत अधिक बढ़ जाएगा.
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आईएमएफ़ के कर्ज़ के सहारे पाकिस्तान कब तक जी पाएगा.
पाकिस्तान पत्रकार ख़ुर्रम हुसैन कहते हैं, "अगर आईएमएफ़ से मदद मिल जाती है तो सऊदी अरब और संयुक्त राज्य अमीरात से मिलने वाली मदद भी आनी शुरू हो जाएगी. तब ये मुसीबत कुछ वक़्त के लिए टल जाएगी."
लेकिन ख़ुर्रम हुसैन कहते हैं, "अगर दूर की सोचें को आईएमएफ़ के कर्ज़े का कोई ख़ास असर नहीं होगा. पाकिस्तान भारी कर्ज़े में डूबा पड़ा है. पाकिस्तान को एक व्यापक ऋण पुनर्गठन पैकेज की ज़रूरत है. उसके बिना देश बार-बार इस मुसीबत में पड़ता रहेगा."
लेकिन आईएमएफ़ से डील भी आसान नहीं होगी. सरकार को कई मुश्किल फ़ैसले करने होंगे. आईएमएफ़ बिजली पर सब्सिडी को ख़त्म करने जैसी शर्तें लगा सकता है.
चुनावी साल में ऐसी कोई भी शर्त सत्तारूढ़ पार्टी को महंगी पड़ सकती है.
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