तालिबान का राज: अफ़ग़ान महिलाओं के लिए 'माहौल दम घोटने वाला'

तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा हुए 17 महीने बीत चुके हैं और देश इस समय तमाम चुनौतियों से घिर चुका है.

देश की आधी आबादी भीषण भुखमरी, गिरती अर्थव्यवस्था, कभी कभार आने वाली बिजली के बीच शून्य से भी नीचे तापमान की सर्दी में ज़िंदा बचे रहने की जद्दोजहद का सामना कर रही है.

लगभग हरेक के लिए ज़िंदगी बहुत मुश्किल है लेकिन महिलाओं के लिए हालात और ख़राब हैं.

इस्लामिक शासन ने जो नियम बनाए हैं उनसे महिलाओं की काम करने की, पढ़ने या बाहर जाने की आज़ादी बहुत अधिक प्रभावित हुई है.

देश के अलग अलग हिस्सों में रहने वाली महिलाएं अपनी वॉइस रिकॉर्डिंग या मैसेज के ज़रिए बीबीसी से अपनी बातें साझा की हैं.

उन्होंने बताया कि तालिबान शासन में किस तरह उनकी ज़िंदगी नाटकीय रूप से बदल गई है.

सुरक्षा कारणों से हम इनमें से कुछ की पहचान ज़ाहिर नहीं कर रहे हैं.

*चेतावनीः इस लेख में आत्महत्या के कुछ संदर्भ भी मौजूद हैं.*

'बिना उम्मीद के ज़िंदा हैं'

जबसे तालिबान ने सत्ता में वापसी की है, इसका असर हर तबके की महिलाओं पर हुआ है. इन्हीं में एक महिला बदख़्शां हैं जो एनजीओ में काम करती थीं. ये देश का सबसे दूरदराज़ वाला और सबसे ग़रीब इलाक़ा है.

बीते दिसम्बर में तालिबान ने एक आदेश जारी कर महिलाओं के एनजीओ में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया था.

उनका तर्क था कि महिला एनजीओ कार्यकर्ताओं ने हिजाब या नकाब न पहन कर, ड्रेस कोड का उल्लंघन किया है.

इसे अफ़ग़ानिस्तान को दी जा रही आपातकालीन मानवीय सहायता को बाधित करने और महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कदम बताया गया था.

एक एनजीओ कार्यकर्ता ने बीबीसी को संदेश के ज़रिए बताया, "हम अलग अलग लोगों से मिलते थे, हम महिलाओं, बच्चों, पुरुषों और बुज़ुर्ग लोगों से बात करते थे. हम उनकी समस्याओं, उनकी ज़रूरतों के बारे में पूछते और फिर अपने ये सारी जानकारी अपने दफ़्तर में देते. लोगों की मदद कर मुझे बहुत ख़ुशी होती थी."

अफ़ग़ानिस्तान के आपदा प्रबंधन मंत्रालय के मुताबिक़, देश में पड़ रही भयानक ठंड में कम से कम 124 लोगों की मौत हो गई है और ऐसे में यहां मदद की सख़्त ज़रूरत है.

संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि पिछले साल के अंत में अफ़ग़ानिस्तान में दो तिहाई आबादी ऐसी थी जिसे मानवीय सहायता की ज़रूरत थी.

इस एनजीओ कार्यकर्ता का कहना है, "हम बिना उम्मीद के ज़िंदा हैं. अब मैं अपना ज़्यादातर समय घर पर बिताती हूं. मैं सोशल मीडिया पर फ़िल्में और वीडियो और टीवी प्रोग्राम देख कर समय काटती हूं."

ये एनजीओ कार्यकर्ता ग्रेजुएशन के बाद की पढ़ाई करने की उम्मीद कर रही थीं, लेकिन अब उनके 'सपने टूट' चुके हैं.

वे कहती हैं, "अब मैं कोशिश करती हूं कि दिन में कुछ भी न करूं. मैं अब निश्चिंत होकर बाहर भी नहीं जा सकती."

वो कहती हैं कि तालिबान के साथ उनके कई बार झगड़े हो चुके हैं.

उन्होंने बताया, "जब भी मैं बाहर जाती हूं, वे चेकपॉइंट पर रोकते हैं और मुझे हिजाब लगाने, चेहरा और बाल ढंकने को कहते हैं. हालांकि मैं बक़ायदा हिजाब पहनती हूं, तब भी वे आपको रोकते हैं और अपना हिजाब ठीक से पहनने को कहते हैं."

'मेरे पास कोई काम नहीं है'

क़रीब 30 साल की एक महिला अफ़ग़ानिस्तान में परम्परागत और रंगीन डिज़ाइन वाले कपड़े सिलने के लिए वो काफ़ी मशहूर थीं.

अब ये महिला अकेले ही अपने परिवार का खर्च उठाती थीं. लेकिन जबसे तालिबान ने उन्हें अपनी दुकान बंद करने का आदेश दिया वो अपने पति और बच्चों की मदद नहीं कर पा रही हैं.

वो कहती हैं, "जब मैं सुबह उठती हूं, मेरे पास कोई काम नहीं होता. मैं नमाज़ पढ़ती हूं, नाश्ता तैयार करती हूं और घर साफ़ करती हूं. पहले मैं दुल्हन के कपड़ों से लेकर बच्चों और स्थानीय पारंपरिक कपड़े सिलती थी. मैं इन कपड़ों पर छोटे छोटे शीशे लगाती थीं, अलग अलग डिज़ाइन और रंगों के कपड़ों के टुकड़ों को टांकती थी."

उन्होंने अपनी दुकान को शहर से हटाकर अपने गांव में खोली, लेकिन यहां भी तालिबान ने ये दुकान बंद करा दी.

वो बताती हैं, "मेरी दुकान बंद है, महिलाओं को काम करने की इजाज़त नहीं है. मेरे ग्राहक लगातार पूछते रहते हैं कि मैंने दुकान क्यों बंद कर दी और मैं उनसे कहती हूं कि मैं दुकान तो नहीं खोल सकती लेकिन आपके कपड़े घर पर ही तैयार कर सकती हूं."

उनके मुताबिक, "लेकिन मैं अपनी पूरी दुकान अपने घर में तो नहीं ला सकती क्योंकि मेरा घर छोटा है और मेरे पास बस एक साधारण सी मशीन है, और उसी को मैं इस्तेमाल कर सकती हूं."

उन्होंने बीबीसी को बताया, "मैं सिर्फ सामान्य कपड़े ही सिलती हूं, शादी विवाह या पार्टी के कपड़े नहीं सिलती क्योंकि मेरे पास वैसे साधन नहीं हैं."

वो कहती हैं, "मेरे पति और मैं इस समय बेरोज़गार हैं और हमारी आर्थिक हालत दिनों दिन ख़राब होती जा रही हैं. और हमारी बेटियां भी हमारी कोई मदद नहीं कर पा रही हैं. कभी कभार रिश्तेदारों से हमें कुछ मदद मिल जाया करती है, बस यही है."

'धीमा ज़हर'

जबसे तालिबान ने सत्ता अपने हाथ में ली है, महिलाओं की पढ़ाई उनके निशाने पर है.

सितम्बर 2021 में सरकार ने लड़कियों के सेकेंड्री स्कूल जाने पर प्रतिबंध लगा दिया. दिसम्बर में महिलाओं को विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया.

एक महिला मनोचिकित्सक एक ख़ुफ़िया स्कूल में पढ़ाने का काम करती हैं. वो 70 बच्चों को पढ़ाती हैं जिनमें 10 से 20 साल की उम्र के बच्चे हैं.

वो इन बच्चों के साथ उनके पैरेंट के लिए थेरेपी सेशन भी चलाती हैं.

उन्होंने एक वॉइस रिकॉर्डिंग भेज कर बीबीसी को बताया, "प्रतिबंध के पहले, मैं अक्सर दिन के इस समय अपने ऑफ़िस जाया करती थी. ये बहुत अजीब है कि सबकुछ बदल गया है, अपने रोज़मर्रे के कामों से लेकर ज़िंदगी के तौर तरीक़ों तक."

वो कहती हैं कि उनकी क्लास में पढ़ने आने के लिए हर रात 30 से ज़्यादा मैसेज आते हैं. वो कहती हैं कि ये संख्या लगातार बढ़ रही है.

वो कहती हैं, "वो सभी लड़कियां हैं, जो जो मुझसे भी बुरे हालात में हैं और उनके मन में ख़ुदकुशी के ख्याल आते हैं. वो खुद का जीवन ख़त्म कर लेना चाहती हैं क्योंकि उनसे हरेक बुनियादी ज़रूरत छीन ली गई है."

मनोचिकित्सक ने अपने सबसे डरावने अनुभव के बारे में बताया. एक अफ़ग़ान महिला को चेकपॉइंट पर तालिबान द्वारा रोका गया.

वो कहती हैं, "आपको ऐसा लगता है कि आपकी सांस घुट रही है. हो सकता है कि वे हमारा मोबाइल या पर्स चेक करने के लिए न मांगे. ऐसी चीजें नहीं होती हैं लेकिन वे हमें धीमे धीमे मार रहे हैं, धीमे ज़हर की तरह."

"हमें डराना, हमें ऐसा महसूस कराना कि...मेरा मतलब...एक ऐसा मुद्दा खड़ा करना कि वे हमें गोली नहीं मारेंगे लेकिन वे हमें डर से मार डालेंगे. अगर वे आपसे पूछ लें कि आपका महरम (अभिभावक) कहां है? या ये पूछ लें कि आप कहां काम करती हैं?"

'मैं आज़ाद महसूस करती हूं'

ओमार-ताह एक मदरसे में टीचर हैं और मेडिकल स्कूल में पहले साल की छात्रा हैं.

अन्य महिलाओं से जो हमने सुना है उससे उलट वो कहती हैं कि वो तालिबान के शासन में आज़ाद महसूस करती हैं.

वो कहती हैं, "हम सुरक्षा को लेकर काफ़ी ख़ुश हैं. अब यह बहुत अच्छा हो गया है. पर्यावरण पढ़ने से मुक्ति मिलने से हम ख़ुश हैं."

उनके मुताबिक, "महिलाएं आज़ाद महसूस कर सकती हैं और बीते दिनों के मुकाबले अच्छी पढ़ाई कर सकती हैं. ये हमारे धर्म का हिस्सा है और साथ ही मर्दों औरतों के लिए अलग अलग जगहें भी हैं."

महिलाओं के कपड़े पर लगी पाबंदी की ओमारो-ताह समर्थक हैं. पिछले साल मई से ही महिलाओं को आदेश दिया गया है कि वे सार्वजनिक जगहों पर हिजाब पहनें और अपने चेहरे को ढंक कर रखें.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "हमारे मजहब के मुताबिक हमें ढंक कर रहने की ज़रूरत है. ये महिलाओं के लिए ही बेहतर है."

हालांकि वो ये भी मानती हैं कि तालिबान के आने से नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है, जैसे कि "लोगों की आर्थिक हालत ख़राब हुई है, बेरोज़गारी बढ़ी है, फ़ैक्ट्रियां बंद हुई हैं और इसकी वजह से दूसरे देशों में लोगों का पलायन भी हुआ है."

वो कहती हैं, "ये मुद्दे लोगों के हौसले को प्रभावित करते हैं. लेकिन मुझे उम्मीद है कि ये सभी मुद्दे हल हो जाएंगे."

रिपोर्टिंगः आकृति थापर, महफ़ूज़ जुबैद और एंड्र्यू क्लैरेंस

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