You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
यूक्रेन का ये शहर रूसी जनरलों की क़ब्रगाह कैसे बन गया
- Author, ज़हाना बेज़पियाचुक
- पदनाम, बीबीसी मुंडो
इस साल 24 फ़रवरी को रूसी सेना ने यूक्रेन पर हमला बोल दिया था. नौ महीने बीत चुके हैं लेकिन पूरी दुनिया के लिए मुसीबत बन चुकी ये जंग अभी तक थमी नहीं है. इस बीच, इस दौरान यूक्रेन का एक शहर मिसाल बन कर उभरा है.
खेरसोन के बाहरी इलाके में बसा ये शहर और इसका मिलिट्री एयरपोर्ट अब यूक्रेनी प्रतिरोध और रूसी सैनिकों की हार का प्रतीक बन चुका है. अब इसकी मिसाल देती कई कहानियां सामने आ रही हैं.
रूसी सेना को भारी नुक़सान पहुंचाने वाले इस शहर का नाम है चोर्नोबायकवा. फ़रवरी में लड़ाई शुरू होने के कुछ ही हफ़्तों में रूसी सेना ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया था. लिहाज़ा यूक्रेनी सेना को रूसी सेना का सामना करने के लिए अपने ही शहर पर बार-बार हमला करना पड़ा.
चोर्नोबायकवा इस युद्ध के सबसे अहम लड़ाई के मैदानों में से एक साबित हुआ.
शुरू में रूस ने अपने सैनिक साज़ो-सामान और रसद को विमानों से पहुंचाने की योजना बनाई थी ताकि दक्षिण में मोर्चाबंदी कर रहे अपने सैनिकों को मज़बूत कर सके.
शुरुआत में उसने यूक्रेन के दक्षिणी तट से सट कर आगे बढ़ने की योजना बनाई थी. इस रणनीति के हिसाब से सबसे पहले उन्हें माइकलोवा और फिर ओडेसा पहुंचना था.
रूसी सेना के लिए सबसे फ़ायदे की बात ये थी कि चोर्नोबायकवा पहुंचने के बाद अगर वह पश्चिम की ओर बढ़ना चाहती तो उसे ख़तरनाक नदी को पार नहीं करना पड़ता.
लेकिन इस बेस पर क़ब्ज़ा बरक़रार रखना उसके लिए बड़ा मुश्किल काम साबित हुआ. यूक्रेनी हमले में यहां कई रूसी हेलीकॉप्टर और सैन्य वाहन ध्वस्त हो गए.
यूक्रेनी हमलों की मार से यहां इस बेस में दो रूसी जनरलों की मौत हो गई. यूक्रेनी सेना यहां रूसी सैनिकों के चैन नहीं लेने दे रही थी. हर दिन एक के बाद एक भारी हमले हो रहे थे.
यूक्रेन के गौरव का प्रतीक
यूक्रेनी सेना का ये मज़बूत प्रतिरोध यूक्रेन के गौरव और रूसी हार का प्रतीक बन गया. जैसे-जैसे रूसी हमलों की स्ट्रैटेजी खुलती जा रही थी, वैसे-वैसे चोर्नोबायकवा में यूक्रेनी लोगों में मातृभूमि के गौरव का भाव नज़र आने लगा था.
चोर्नोबायकवा यूक्रेनी लोगों के लिए वॉर मीम बन गया था. यूक्रेनियों के लिए ये वो शहर बन गया, जहां रूसी सैनिक बड़ी तादाद में हताहत हो रहे थे.
इस महीने की शुरुआत में यूक्रेनी सेना ने खेरसोन शहर और चोर्नोबायकवा पर लगभग एक ही वक्त पर क़ब्ज़ा कर लिया.
लेकिन शहर से पीछे हटते वक्त रूसी सेना भारी मात्रा में बारूदी सुरंग छोड़ गई. इसके साथ ही रूसी हथियारों, वाहनों और सैनिकों की क़ब्रगाह भी यहीं रह गई.
रूसी सेना ने अभी तक नहीं बताया कि उसके कितने सैनिक मारे गए हैं या घायल हुए हैं.
पिछले कुछ सप्ताह के दौरान जब रूसी सेनाओं ने पीछे हटना शुरू किया तो यूक्रेनी सेना ने पूरी योजना बना कर पुलों, कमान प्वाइंट और हथियार डिपो पर हमले शुरू कर दिए.
हालांकि रूसी रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि नीपा नदी के पश्चिमी किनारों से पीछे हटते हुए उसके सैनिकों और साज़ोसामान को कोई नुक़सान नहीं पहुंचा है.
रूसी सैनिकों के अत्याचार की कहानी
चोर्नोबायकवा लंबे समय वक्त तक सैनिकों के क़ब्ज़े में रहा. अब वहां मलबा पड़ा है. एयरबेस से सटा इलाका और यहां रहने वाले लोग अब बाहरी दुनिया से कट चुके हैं. लेकिन अनजाने ही ये राष्ट्रीय प्रतिरोध का प्रतीक बन चुका है.
यहां रहने वाली विक्टोरिया कहती हैं, ''हम इस दौरान एक महीने में एक-दो बार ही बाहर निकले. सिर्फ़ खाना लेने के लिए. वह युद्ध शुरू होने के पहले तक चोर्नोबायकवा बेस पर ऑपरेटर के तौर पर काम कर रही थीं.
उन्होंने कहा, ''हमने अपने घर के पिछवाड़े में ही गाजर, चुकंदर और आलू की खेती की.''
आठ मार्च को यहां रूस ने अपना क़ब्ज़ा शुरू कर दिया था. उन्होंने उस वक्त के वाकये का ज़िक्र करते हुए बताया, ''मैं रूसी सेना के आने के कुछ दिन बाद ब्रेड खरीदने जा रही थी. ठीक उसी समय रूसी सैनिक टैंक पर सवार होकर स्टोर तक आए और हवा में गोलियां दागने लगे. सच में, इससे पहले मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी टैंक नहीं देखा था.''
कुछ महीनों के बाद वो जगह तबाह कर दी गई, जहां वो काम करती थीं.
यूक्रेनी झंडे का अपमान
शहर के बीचोंबीच एक बेंच पर बैठी स्वेतलाना मिरास्निको ने बताया कि कैसे रूसी सैनिक उनके देश के झंडे का अपमान कर रहे थे. उन्होंने कहा, ''वो इससे अपनी कार को पोंछ रहे थे. ये देख कर मेरा दिल टूट गया.''
उन्होंने बताया कि उनके दो पूर्व छात्र लड़ाई के मैदान में मारे गए. हालांकि कुछ अभी भी मोर्चे पर डटे हुए हैं.
गांव के प्रमुख ने बताया, ''कुछ लोग रूसी क़ब्ज़े के दौरान यहीं बने रहे. कुछ लोग भाग गए.''
उन्होंने कहा, ''कुछ लोगों को अपने बच्चों को निकाल कर ले जाना पड़ा. दूसरे लोग बेहद डरे हुए थे. जो लोग यहां से भाग गए थे उन्हें अब डर है कि उनके बारे में राय बनाई जा रही है. अब वे और डर गए हैं.''
रूसी क़ब्ज़े के दौरान गांवों में रहना मौत को दावत देने जैसा था. कुछ सैनिकों ने सिगरेट मांगने के बाद दो किशोरों को अपनी बंदूक़ से उड़ा दिया. विक्टोरिया ने बताया के वे दोनों उनके पड़ोसी थे.
स्थानीय यूक्रेनी अब एयरफ़ील्ड में एक वॉर म्यूज़ियम बनाने के बारे में सोच रहे हैं. हालांकि युद्ध अभी ख़त्म नहीं हुआ है.
अब भी लोगों के घरों के सामने तोप के गोले गिरते रहते हैं. लेकिन इस तरह के ख़तरों के बावजूद यहां के कई लोगों को ये लग रहा है कि अब सबसे बुरे दिन ख़त्म हो चुके हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)