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हिजाब का विरोध: 50 दिनों में इन पाँच तरीकों से बदला ईरान
पुलिस हिरासत में एक महिला की मौत ने ईरान में 50 दिन पहले विरोध प्रदर्शन के जिस सिलसिले को शुरू किया था, वो 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यहाँ की सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है.
ईरान में 16 सितंबर को 22 वर्षीय महसा अमीनी की मौत की प्रतिक्रिया के रूप में प्रदर्शन शुरू हुए थे. महसा अमीनी को तेहरान की मोरैलिटी पुलिस ने कथित तौर पर 'ठीक से हिजाब' न पहनने के आरोप में हिरासत में लिया और बाद में उनकी मौत हो गई.
ईरान के सख़्त नियमों के अनुसार, महिलाओं के लिए हिजाब या हेडस्कार्फ़ पहनना अनिवार्य है.
इसके बाद से ही प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाबलों की कड़ी कार्रवाई को धता बताते हुए अपना विरोध जारी रखा हुआ है.
ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट न्यूज़ एजेंसी (एचआरएएनए) ने अपनी वेबसाइट पर दावा किया है कि 129 शहरों में फैले प्रदर्शन में सुरक्षाबलों की कार्रवाई से अब तक 298 लोगों की जान गई है और 14 हज़ार से अधिक की गिरफ्तारी हो चुकी है. ये आंकड़े दो नवंबर तक के हैं.
विरोध कब तक जारी रहेगा, इसपर साफ़ तस्वीर मिलना अभी मुश्किल है.
लेकिन ईरान में रहने वाले लोगों ने बीबीसी को बताया कि ये प्रदर्शन अब तक यहाँ के लोगों के जीवन पर पाँच बड़े बदलाव ला चुके हैं.
हिजाब से छुटकारा
बीते कुछ सप्ताह में ईरान की बहुत सी महिलाओं को नियमित तौर पर सिर ढंकने से जुड़े देश के सख़्त नियमों को तोड़ते देखा गया है. महिलाएं गाड़ियों के ऊपर चढ़कर अपने हिजाब हवा में लहरा रही हैं.
सोशल मीडिया भी पर भी हिजाब का विरोध करने वालों से भरा हुआ है. ईरान की चर्चित अभिनेत्री फतेमह-मोतामेद आर्य भी इनमें शामिल हैं. इस इस्लामिक गणराज्य ने अपने इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर विरोध होते नहीं देखा है.
कुछ तस्वीरों में महिला सुरक्षाकर्मियों का सामने भी बिना सिर ढकें दिख रही हैं. हालाँकि, अधिकारियों का ज़ोर अभी भी इस बात पर है कि हिजाब को लेकर नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
ईरान की मोरैलिटी पुलिस के प्रवक्ता अली ख़ानमोहम्मदी ने 30 अक्टूबर को एक न्यूज़ वेबसाइट से बातचीत में कहा, "हिजाब हटाना अभी भी कानून के ख़िलाफ़ है."
लेकिन ये प्रतिबंध ईरानी महिलाओं को डराने में कामयाब नहीं रहा. एक 69 वर्षीय महिला ने बीबीसी को बताया कि जबसे प्रदर्शन शुरू हुए हैं, वो अक़्सर बिना हिजाब के ही घर से निकलती हैं.
पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर उन्होंने कहा, "एक दिन मैं सड़क पर चल रही थी और तभी मैंने पीछे से गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ सुनी. मैं मुड़ी और देखा कि एक कम उम्र की महिला गाड़ी में बिना हिजाब के है."
"उसने मुझे दूर से किस भेजी और जीत का इशारा किया. मैंने भी वही किया. सिर्फ़ चालीदिनों में ये देश बीते 40 सालों की तुलना में बहुत ज़्यादा बदल गया है."
ये भी पढ़ें: ईरान में विरोध प्रदर्शन का एक महीना, अब तक क्या हुआ
रंग गई सड़कें और दीवारें
ईरान का ये विरोध प्रदर्शन बीते समय में देश में फैले आंदोलनों से इसलिए भी अलग है क्योंकि इस बार प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक दीवारों को भी अपने रंग में रंग लिया है.
ईरान में जगह-जगह दीवारों पर नारे लिखे जा रहे हैं. लोग दीवारों पर लिखते हुए अपने वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर भी कर रहे हैं. प्रशासन इन दीवारों की दोबारा रंगाई-पुताई कर रहा है लेकिन इस जंग में वो प्रदर्शनकारियों के आगे हारते दिख रहे हैं.
अधिकतर नारों में देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह ख़ामेनेई को निशाना बनाया जा रहा है. ईरान में अपने नेता के ख़िलाफ़ इस तरह की भाषा शायद ही पहले कभी इस्तेमाल की गई होगी, न तो कभी यहाँ कि इस्लामिक सरकार पर ही इतने हमले किए गए.
लेकिन असल जंग तो सड़कों पर ही नज़र आ रही है. प्रदर्शन पर लगे प्रतिबंधों को लोग नज़रअंदाज़ कर रहे हैं, सरकारी इश्तहारों को फाड़ रहे हैं या उनकी जगह अपनी तस्वीरें लगा रहे हैं.
ईरानी लेखक और ऐक्टिविस्ट ऐलेक्स शम्स ने बीबीसी से कहा, "लोगों ने अपना एक अस्थायी आज़ाद कोना बना लिया है, जहाँ महिलाएं डांस कर रही हैं और भीड़ उनका जोश बढ़ा रही है, जहाँ लोग नारे लगा रहे हैं और इस दमन पर विराम लगाने की मांग कर रहे हैं. यहाँ लोग अपने आंदोलन की आगे की दिशा पर चर्चा कर रहे हैं."
"ये प्रदर्शन अपने आप में ईरानी लोगों के लिए एक ऐसी सबसे अहम जगह बन गया है जहाँ एकदम अलग तरह के भविष्य की कल्पना की जा सकती है."
युवाओं की ताक़त
ईरान के प्रदर्शनों में सबसे अधिक सक्रिय स्कूली छात्र हैं और एचआरएएनए का दावा है कि अभी तक इस आंदोलन में 47 बच्चों की जान गई है.
जान गंवाने वाले ये युवा अब प्रदर्शन के अहम प्रतीक बन गए हैं. नाइका शकरामी और सरीना इस्माइज़देह सबसे चर्चित हैशटैग बने और जगह-जगह दीवारों पर इनकी ही तस्वीरें बनाई जा रही हैं.
ये पहली बार है जब ईरान के युवा किसी प्रदर्शन के दौरान इस तरह की भूमिका संभाल रहे हैं.
सोशल मीडिया पर स्कूली छात्रों, ख़ासतौर पर लड़कियों के ऐसे कई वीडियो हैं जिनमें वो सरकार विरोधी नारे लगा रही हैं, सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह ख़ामेनेई की तस्वीरें फाड़ रही हैं या फिर अपनी स्कूल की किताबों में उनकी तस्वीर की जगह सुरक्षाबलों की कार्रवाई में मरने वालों का फ़ोटो लगा रही हैं.
सोशल मीडिया पर सबसे ज़्यादा शेयर हो रहे एक वीडियो में स्कूली छात्रों को सुरक्षाबलों के एक सदस्य पर चीखते-चिल्लाते देखा जा सकता है. ये सुरक्षाकर्मी स्कूल के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए थे लेकिन छात्राएं उनसे 'दफ़ा' होने को कह रही हैं.
विरोध के सामने पीछे रह गया डर
ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के प्रमुख हुसैन सलामी ने 29 अक्टूबर को प्रदर्शनकारियों को अल्टीमेटम दिया.
सरकारी मीडिया में सलामी का बयान छपा, जिसके अनुसार उन्होंने कहा, "सड़कों पर मत आइए! आज दंगों का आख़िरी दिन है."
लेकिन उसी दिन ईरान की सड़कों पर प्रदर्शन और सुरक्षाबलों के साथ झड़पों से जुड़े मामले बढ़ गए.
बीबीसी फ़ारसी कई लोगों की ऐसी कहानियों का गवाह बना, जो बर्बर कार्रवाई के आगे बेख़ौफ़ दिखे. इस पैमाने पर बेफ़िक्री पहले कभी नहीं दिखी थी.
एक युवती ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया कि वो अपने बच्चे को अपनी माँ के पास छोड़कर आई हैं ताकि प्रदर्शन में हिस्सा ले सकें.
"मैं डरी हुई थी, लेकिन मेरे बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए मुझे ये करना चाहिए."
जर्मनी में रहने वाली ईरानी गायिका और ऐक्टिविस्ट फ़रावज़ फ़वारदिनी भी मानती हैं कि लोगों के मन में पहले से भरे ग़ुस्से ने ईरानी समाज की मौजूदा परिस्थितियों के साथ मिलकर प्रदर्शन को बल दिया है.
फ़वारदिनी कहती हैं, "हर चीज़ महंगी होती जा रही है, यहाँ बहुत ही रोक-टोक भी है. महासा अमीनी के साथ जो हुआ उसके बाद लोगों ने ये महसूस किया कि राजनीति में शामिल ने होने वाले लोगों को भी बेवजह जान से मारा जा सकता है. मुझे लगता है कि इसने बहुत से लोगों को लड़ने के लिए प्रेरित किया."
एकता
इस विरोध प्रदर्शन ने ईरान के अलग-अलग हिस्सों में रह रहे लोगों के अंदर जो जोश भरा, वो अपने आप में विशिष्ट है. पहले के आंदोलनों से विपरीत.
वर्ष 2009 में राष्ट्रपति चुनावों के नतीजों के बाद शुरू हुए प्रदर्शन की अगुवाई मध्यम वर्गीय लोग कर रहे थे. इसी तरह साल 2019 की क्रांति में मुख्य तौर पर देश के आर्थिक रूप से पिछड़े हिस्से का योगदान था जो ईंधन के बढ़ते दामों के ख़िलाफ़ लामबंद हुए थे.
लेकिन ये आंदोलन ईरान के विभिन्न नस्लीय समूहों को एकजुट कर के उनके साथ चलने में कामयाब रहा और ये बदलाव नारों में भी झलक रहा है.
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