You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
विश्व खाद्य दिवसः चूहे, हड्डियां और मिट्टी, अकाल में लोग क्या-क्या खाने को मजबूर
- Author, स्वामीनाथन नटराजन
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
अकाल, ग़रीबी, युद्ध और बीमारी. ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से हमारे खान पान में बड़ा बदलाव आ सकता है.
बेहद मुश्किल हालात में घिरे परेशान लोग ज़िंदा रहने के लिए मिट्टी, चूहे, फेंकी हुई हड्डियां और जानवरों की खाल तक खाने को मजबूर हो सकते हैं.
भीषण भूख, कुपोषण और कम खाना मिलना आज दुनिया के कई हिस्सों में हर रोज़ की चुनौती है. ये समस्या बहुत बड़ी है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि दुनिया में कम से कम 82.8 करोड़ लोग रोज़ाना रात को भूखे सोते हैं और 34.5 करोड़ लोग भीषण खाद्य असुरक्षा में जीवन गुज़ार रहे हैं.
रविवार (16 अक्तूबर) को विश्व खाद्य दिवस मनाया जा रहा है. इसके पहले बीबीसी ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अत्याधिक भूख का सामना कर रहे चार लोगों से बात की और उनसे समझा कि वो ज़िंदा कैसे रहे.
'मैं सिर्फ़ चूहों का मांस ही ख़रीद सकती हूं'
दक्षिण भारत में रहने वाली रानी कहती हैं, "मैं बचपन से चूहों का मांस खा रही हूं और मुझे कभी स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या नहीं रही है. मैं अपनी दो साल की पोती को भी चूहों का मांस खिलाती हूं. हमें ये खाने की आदत हो गई है."
49 वर्षीय रानी तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के पास रहती हैं और वो भारत के सबसे पिछड़े समुदायों में से एक से आती हैं. जब वो पांच साल की थीं तब उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था.
भारत के जाति आधारित समाज में रानी का समुदाय हमेशा से हशिये पर रहा है और सदियों से भेदभाव का सामना करता रहा है. रानी एक एनजीओ में काम करती हैं जो उनके समुदाय के लोगों की मदद करता है.
ये संगठन इरुला समुदाय के बंधुआ मज़दूरी में फंसे लोगों को मुक्त कराता है.
रानी ने बीबीसी को बताया, "हम हमेशा ही शहरों और क़स्बों से बाहर रहे हैं. मेरे पिता और दादा बताते थे कि कई बार उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं होता था. यहां तक कि कंदमूल भी नहीं. उन मुश्किल दिनों में चूहों से ही हमारे समुदाय को ज़रूरी पोषण मिलता था."
"मैंने बहुत कम उम्र में ही चूहे पकड़ना सीख लिया था."
रानी ने बचपन में पेट भरने और अपनी जान बचाने के लिए चूहे पकड़ने की जो कला सीखी थी वो अब भी उनके काम आ रही हैं. वो सप्ताह में कम से कम दो दिन चूहों का मांस पकाती हैं.
इरुला समुदाय के लोग धान के खेतों में मिलने वाली चूहों की एक प्रजाति को खाते हैं. ये लोग घरों में मिलने वाले चूहों को नहीं खाते हैं.
रानी कहती हैं, "हम चूहों की खाल उतारकर उन्हें आग पर सेकते हैं और खा लेते हैं. कई बार हम उनके मांस के छोटे टुकड़े करके दाल और इमली की चटनी के साथ पकाते हैं."
चूहे अपने बिलों में जिन दानों को छुपा लेते हैं उन्हें भी इरुला लोग निकाल लेते हैं और खाते हैं.
रानी कहती हैं, "मैं चिकन या मछली महीने में एक ही बार खरीद सकती हूं. चूहे फ्री मिलते हैं और खूब मिलते हैं. इसलिए हम चूहे खाते हैं."
'जानवरों की खाल खाने के लिए मजबूर'
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि सोमालिया इस समय जानलेवा भुखमरी का सामना कर रहा है. पिछले चालीस सालों के सबसे भीषण सूखे ने लाखों लोगों को घर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया है.
सात बच्चों की मां चालीस वर्षीय शरीफ़ो अली को भी अपना घर छोड़ना पड़ा है.
उन्हें अपना गांव छोड़कर क़रीब दो सौ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. शाबेल इलाक़े से निकलकर वो राजधानी मोगादिशु के बाहरी इलाक़े में आ गई हैं. वो पांच दिन तक पैदल चलती रहीं थीं.
वो कहती हैं, "यात्रा के दौरान हम दिन में सिर्फ़ एक बार खाते थे. जब हमारे पास खाना खाने के लिए कम होता तो सिर्फ़ बच्चे खाते और हम भूखे सोते."
राजधानी की तरफ़ बढ़ते हुए उन्होंने कई बेहद हैरान करने वाले दृश्य देखे.
शरीफ़ो अली कहती हैं, "नदी पूरी तरह सूख गई थी. कई सालों से नदी में बहुत कम पानी था, हम गंदा पानी ही पीते थे."
"मैंने रास्ते में सैकड़ों मरे हुए जानवर देखे. लोग जानवरों के कंकाल और खाल खाने के लिए मजबूर हैं."
शरीफ़ो के पास 25 गायें और इतनी ही बकरियां थीं. सूखे में सबकी मौत हो गई.
"बारिश बिल्कुल भी नहीं हो रही है और हमारे खेत में कोई उपज नहीं हो रही है."
शरीफ़ो अली अब दूसरों के घरों में काम करती हैं और एक दिन में दो डॉलर से भी कम कमाती हैं. ये उनके परिवार का पेट भरने के लिए काफ़ी नहीं है.
"मैं इससे एक किलो चावल और सब्ज़ी तक नहीं ख़रीद पाती हूं. हमारे पास कभी भी पेट भर खाना नहीं होता है. ये सूखा हम पर बहुत भारी पड़ रहा है."
शरीफ़ो अली को मददगार संस्थाओं से कुछ मदद मिल रही है लेकिन ये पर्याप्त नहीं है.
वो कहती हैं, "हमारे पास कुछ भी नहीं है."
'हम फेंकी गई खाल और हड्डियों पर निर्भर हैं'
ब्राज़ील के साओ पाउलो में रहने वाली 63 वर्षीय लिंडीनाल्वा मारिया डा सिल्वा नासीमेंटो पिछले दो सालों से स्थानीय कसाइयों की फेंकी गई हड्डियों और खाल पर निर्भर हैं. इन्हें खाकर ही वो पेट भर रही हैं.
पेंशनभोगी लिंडीनाल्वा के पास पूरे दिन के लिए बस चार डॉलर ही होते हैं. इसी में उन्हें अपने पति, एक बेटे और उसके दो बच्चों का ख़र्च चलाना होता है. वो मांस नहीं ख़रीद सकती हैं, ऐसे में अलग-अलग कसाइयों के पास जाती हैं और हड्डियां और मुर्गों की खाल ख़रीदती हैं. ये भी उन्हें लगभग 0.70 डॉलर प्रति किलो मिलता है.
"मैं हड्डियों को पकाती हूं, उन पर कुछ मांस लगा होता है. फिर मैं स्वाद के लिए उनमें फलियां डाल देती हूं."
वो बताती हैं कि मुर्गे की खाल को वो एक फ्राई पैन में बिना तेल के फ्राई करती हैं जिससे चर्बी निकल आती है जिसे वो इकट्ठा कर लेती हैं. वो इस चर्बी में बाद में दूसरे भोजन को फ्राई करती हैं.
लिंडीनाल्वा की नौकरी महामारी के दौरान चली गई थी. उनका बेटा भी बेरोज़गार है.
वो कहती हैं, "लोग कुछ खाना दे देते हैं, स्थानीय कैथोलिक चर्च भी मदद करता है. हम इसी तरह जिंदा हैं."
ब्राज़ील के नेटवर्क फ़ॉर फूड सिक्यूरिटी की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक ब्राज़ील में 3.3 करोड़ से अधिक लोग भुखमरी का शिकार हैं.
जून में प्रकाशित इस नए शोध पत्र के मुताबिक देश की आधी से अधिक आबादी खाद्य असुरक्षा का सामना कर रही है.
लिंडीनाल्वा शिकायती लहज़े में कहती हैं, "कसाई भी अक्सर ये कह देते हैं कि उनके पास हड्डियां नहीं हैं."
वो कहती हैं कि खाना बचाने के लिए वो कम से कम खाने का प्रयास करती हैं.
"मैं इस विश्वास से भी ज़िंदा हूं कि कभी ना कभी हालात सुधर जाएंगे."
'रेड कैक्टस का फल खाकर ज़िंदा हैं'
"बारिश नहीं हो रही है और कोई फसल नहीं हुई है. हमारे पास बेचने के लिए कुछ भी नहीं है. हमारे पास कोई पैसा नहीं है. हम चावल भी नहीं ख़रीद सकते हैं."
हिंद महासागर के मेडागास्कर द्वीप में रहने वाली 25 वर्षीय पेफीनियाना दो बच्चों की मां हैं.
यहां दो साल से बारिश कम हुई है जिसकी वजह से फसलें बर्बाद हो गई हैं और लोगों के जानवर मर गए हैं. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह से दस लाख से अधिक लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं.
फेफीनियाना सूखे से सबसे ज़्यादा प्रभाविक अम्बोसरी शहर में रहती हैं.
वो और उनके पति पानी बेचकर अपना पेट भरते हैं.
यूनिसेफ़ के एक अनुवादक की मदद से वो बीबीसी को बताती हैं, "जब मैं कुछ पैसे कमा लेती हूं तो मैं चावल और कसावा ख़रीदती हूं. जब मेरे पास कुछ नहीं होता तो मैं रेड कैक्टस का फल खाती हूं या फिर भूखी ही सो जाती हूं."
वो कहती हैं, "यहां अधिकतर लोग कैक्टस का फल खाते हैं, ये इमली जैसा खट्टा होता है."
"हम चार महीने से इसे खा रहे हैं और अब मेरे दोनों बच्चों को डायरिया हो गया है."
विश्व खाद्य कार्यक्रम ने बीते साल बताया था कि दक्षिणी मेडागास्कर में "लोग सफेद मिट्टी इमली के जूस के साथ खा रहे हैं. इसके अलावा कैक्टस की पत्तियां, जंगली जड़ें और कंदमूल खा रहे हैं ताकि वो अपनी भूख शांत कर सकें."
ये फल फेफीनियाना के परिवार को ज़िंदा तो रख सकता है लेकिन शरीर के लिए ज़रूर विटामिन और मिनिरल नहीं देता है.
यहां बहुत से बच्चों का कुपोषण के लिए इलाज किया जा रहा है, उनका चार साल का बेटा भी इनमें से एक है.
वो कहती हैं कि अगर थोड़ी सी बारिश भी होती है तो वो कुछ ना कुछ फसल उगा लेंगे. "फिर हम आलू, कसावा और फल खा सकेंगे."
"फिर हमें कैक्टस का फल नहीं खाना पड़ेगा."
विश्व खाद्य कार्यक्रम का कहना है कि इस समय दुनिया और भी ज़्यादा भूखी है.
इस लगातार गहराते संकट के लिए वह चार कारणों को ज़िम्मेदार मानते हैं. हिंसक संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, कोविड महामारी के आर्थिक प्रभाव और बढ़ती क़ीमतें.
डब्ल्यूएफ़पी की 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, "विश्व स्वास्थ्य कार्यक्रम का हर महीने का ख़र्च 7.36 करोड़ डॉलर है जो 2019 के औसत ख़र्च से 44 फ़ीसदी अधिक है."
"अब कार्यक्रम के ऑपरेशन पर जो पैसा अधिक ख़र्च हो रहा है उससे हर महीने चालीस लाख लोगों का पेट भरा जा सकता था."
हालांकि संगठन का कहना है कि सिर्फ़ पैसे से इस संकट का तब तक समाधान नहीं हो सकता जब तक दुनियाभर में संघर्षों को समाप्त करने और जलवायु परिवर्तन को रोकने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं होगी.
रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है, "भूख के अहम कारण बेरोकटोक जारी रहेंगे."
(इस रिपोर्ट में फिलीप सूजा ने सहयोग किया.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)