भारतीय सेना में पाकिस्तान से जंग लड़ने वाले ये नेपाली गोरखा क्यों जी रहे बदहाल ज़िंदगी

- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नेपाल के पोखरा से

भारतीय सेना में 1979 का गोरखा विद्रोह
- 1979 में भारतीय सेना के 4/3 गोरखा रेजिमेंट में विद्रोह का मामला हुआ, 45 फ़ौजियों को मिली सज़ा
- सभी ने पाकिस्तान के साथ दो-दो जंग लड़ी थी लेकिन अब बदहाली में
- इंद्र बहादुर गुरुंग ने कोर्ट मार्शल की सज़ा के बाद विश्व हिन्दू परिषद में हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी
- लेह में ऑफिसर्स मेस में गोरखाओं के समर्थन में नारा लगाने का मामला

इंद्र बहादुर गुरुंग जब भारतीय सेना में 1962 में भर्ती हुए तब 20 साल के थे. वह गोरखा रेजिमेंट 4/3 में थे.
तीन साल बाद ही पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया. इंद्र बहादुर गुरुंग को मोर्चे पर जाना पड़ा. बहुत ही बहादुरी से उन्होंगे जंग लड़ी. छह साल बाद एक बार फिर से 1971 में पाकिस्तान से जंग छिड़ गई.
इसी जंग के बाद बांग्लादेश बना था. 1971 की जंग में इंद्र बहादुर गुरुंग ने बांग्लादेशियों को जलपाइगुड़ी में हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी थी.
अब गुरुंग 82 साल के हो गए हैं. वह नेपाल के पोखरा में रहते हैं. गुरुंग कहते हैं, ''भारतीय सेना में रहा था, इस पर गर्व करूं या ख़ुद से नाराज़ रहूं? यह दुविधा लंबे समय तक रही. लेकिन अब कोई दुविधा नहीं है. अब मैं ख़ुद से पूछता रहता हूँ कि भारतीय सेना में क्यों गया था? मेरी ज़िंदगी के आख़िरी पल बचे हैं लेकिन मरने के बाद भी मेरी आत्मा इंसाफ़ के लिए भटकती रहेगी.''
इंद्र बहादुर गुरुंग जब ऐसा कह रहे थे तो उनकी बूढ़ी आँखें ऐसे टपक रही थीं, मानो वह अपना दर्द साझा करने के लिए लंबे समय से बेक़रार थे.

ख़ुद को संभालते हुए गुरुंग कहते हैं, ''भारत को अपनी मातृभूमि माना था. जब पाकिस्तान के ख़िलाफ़ मोर्चे पर गया था तो कई पाकिस्तानियों को खुखरी से ही निपटा दिया था. वो साहस महज़ नौकरी निभाने के लिए नहीं था. भारतीय फौज को अपना भविष्य मानकर काम कर रहा था. लेकिन 1979 के बाद का भविष्य मौत के इंतज़ार में कटा है.''
इंद्र बहादुर गुरुंग अपने साथ फाइलों की पूरी गट्ठर रखते हैं. ये फाइलें उनकी लड़ाई के सबूत हैं. इन फाइलों में लाल कृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फ़र्नांडिस, नरेंद्र मोदी और पूर्व सांसद बैकुंठ लाल शर्मा के पत्र हैं.
इनमें से कुछ पत्रों में गुरुंग को इंसाफ़ दिलाने का आश्वासन दिया गया है. गुरुंग कहते हैं कि 2017 में पीएम मोदी, तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के ऑफिस में गए लेकिन किसी से मुलाक़ात नहीं हुई.

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1979 में क्या हुआ था?
साल 1979 की तारीख़ आठ जनवरी. लेह में गोरखा रेजिमेंट 4/3 में प्रमोशन कैडेट की ओपनिंग सेरिमनी थी. कुल 45 जवानों को आना था. कर्नल ओपी भाटिया इस पलटन को संबोधित करने वाले थे. कर्नल ओपी भाटिया को पता चला कि सात लोग अनुपस्थित हैं. कुल 38 लोग ही आए थे. कर्नल ओपी भाटिया बहुत नाराज़ हुए और वह बिना संबोधित किए ही ग़ुस्से में वापस चले गए.
कर्नल ओपी भाटिया ने सात लोगों की ग़ैरमौजूदगी के लिए पूरे पलटन को सज़ा सुनाई. पलटन के सभी 45 जवानों को तीन दिन तक लेह से 120 किलोमीटर दूर बल्टी टॉप, कैमेल बैक, येलो पैच पर चढ़ने-उतरने के लिए कहा. ये तीनों टॉप 17 हज़ार से 19 हज़ार फुट की ऊंचाई पर हैं. कर्नल ओपी भाटिया की इस सज़ा को लेकर पलटन में काफ़ी नाराज़गी थी.

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गोरखा रेजिमेंट 4/3 में सुबेदार मेजर रहे बीबी राणा ने बीबीसी से कहा, ''पलटन के लोग काफ़ी नाराज़ थे. सुबेदार मेजर पलटन के माँ-बाप की तरह होता है. लोग आकर मुझसे शिकायत कर रहे थे. लोगों का कहना था कि बिना ग़लती किए सज़ा मिली है. जो सात लोग अनुपस्थित थे, उन्हें सेना के ही दूसरे काम में लगाया था.''
''किसी ने भी जानबूझकर ऐसा नहीं किया था. कर्नल ओपी भाटिया से यह बात बताई भी लेकिन उन्होंने नहीं सुनी. उन्होंने कहा था कि पहले क्यों नहीं बताया. लेकिन यह बताने का काम सुबेदार मेजर का नहीं होता है.''
बीबी राणा बताते हैं, ''पहले दिन की सज़ा काटने के बाद जवान वापस आए तो देखा कि क्लब में तीन कैप्टन रैंक के ऑफिसर्स शराब पी रहे हैं. 10-12 जवान क्लब में घुस गए और नारा लगाना शुरू कर दिया. इनका कहना था कि जब सुबेदार मेजर को भी सज़ा दे दी गई तो हम क्या मायने रखते हैं.''
''उस वक़्त क्लब में मैं भी था. मैंने उन जवानों को समझाया और कहा कि वे चुपचाप वापस चले जाएं. इससे 4/3 जीआर की छवि ख़राब होगी. समझाने के बाद जवान चले भी गए थे लेकिन मामला बिगड़ चुका था.''

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इंद्र बहादुर गुरुंग कहते हैं, ''क्लब में किसी जवान ने टेबल पर बोतल मार दी थी. नौ जनवरी को बताया गया कि ब्रिगेडियर साहब आ रहे हैं और सैन्य सम्मेलन होगा. 10 जनवरी को सैन्य सम्मेलन हुआ. इसके बाद 22 जनवरी को 73 लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया.''
''सबका बयान लिया गया. गिरफ़्तार लोगों में 11 ऑफिसर भी थे. सारे लोगों से मनमानी करते हुए बयान लिया. हमें न हिन्दी आती थी और न ही अंग्रेज़ी. नेपाली दुभाषिया नहीं दिया. एक साल नौ महीने 13 दिन अंडर अरेस्ट रखा गया. 3 लोगों को कोर्ट मार्शल के बाद आजीवन कारावास और 5 लोग को 10 साल की सज़ा मिली. 9 को सात साल की सज़ा मिली. 25 एनसीओ के जॉब से बर्खास्त कर दिया गया. 9 जेसीओ के डिस्चार्ज फ्रोम सर्विस किया गया.''
बीबी राणा को भी कोर्ट मार्शल के बाद 16 जनवरी 1981 के बाद नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. डिस्चार्ज सर्टिफिकेट में लिखा है कि बीबी राणा को भारतीय सेना में विद्रोह भड़काने के मामले में बर्खास्त किया जा रहा है.
इंद्र बहादुर गुरुंग भी 25 एनसीओ में शामिल थे. गुरुंग कहते हैं, ''हमने किसी का नुक़सान नहीं किया था. कोई जनहानि नहीं की थी. केवल सूबेदार मेजर ने नारा लगाया था. यह नारा नेपाली में था- गोरखाली हो कि होईन? 4/3 जीआर हो कि होईन? यानी गोरखा हो कि नहीं और 4/3 गोरखा रेजिमेंट के हो कि नहीं. इसी नारे को सैन्य विद्रोह बता दिया गया. नॉर्दन जनरल लेफ्टिनेंट जगदीश सिंह ने पूरे मामले की जांच की थी लेकिन साउदर्न कमांड के जीओसी आरडी हीरा से हस्ताक्षर करा लिया गया. नॉर्दन कमांड ने सब जांच कर लिया था लेकिन कुछ नहीं निकला था.''

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19 साल भारतीय फ़ौज में रहने के बाद इंद्र बहादुर गुरुंग कोर्ट मार्शल में बर्खास्त कर दिए गए. 45 लोगों की पलटन में सबको नौकरी से निकाल दिया गया. किसी को पेंशन नहीं मिली. बीबी राणा उन तीन लोगों में एक थे, जिन्हें उम्र क़ैद की सज़ा मिली थी. राणा जनवरी 1981 से 1989 तक जेल में रहे. बीबी राणा 85 साल के हो गए हैं. पिछले 12 सालों से लकवाग्रस्त हैं. लेकिन 1979 की घटना को वह भूल नहीं पाए हैं और पूरे वाक़ये को विस्तार से बताते हैं. बीबी राणा 1955 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे.
इन्होंने अपनी पेंशन की शिकायत काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के डिफेंस विंग में भी की थी. भारतीय दूतावास के डिफेंस विंग से मेजर पंकज सिंह के हस्ताक्षर वाला एक पत्र जारी किया गया है. इस पत्र में इन पूर्व फौजियों की संपत्ति और परिवार के सदस्यों का जानकारी मांगी गई है. इंद्र बहादुर गुरुंग कहते हैं कि सारी जानकारी दे दी गई लेकिन कुछ भी हासिल नहीं हुआ.

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मेजर पंकज सिंह से पूछा कि जानकारी देने के बाद भी कुछ क्यों नहीं हुआ? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ''मामला सेना में विद्रोह भड़काने का था. इसमें कोर्ट मार्शल हुआ और सबको दोषी पाया गया. ऐसे में अब कुछ हो नहीं सकता. कोई अपनी पेंशन की शिकायत लेकर आता है तो हम जितना कर सकते हैं, मदद करते हैं.''
गोरखा रेजिमेंट में ही रहे मेजर जनरल अशोक मेहता 1779 की इस घटना पर कहते हैं कि यह एक अनुशासनहीनता का गंभीर मामला था और फ़ौज इसे बहुत ही सख़्ती से हैंडल करती है. जनरल मेहता कहते हैं, ''इन्हें कोर्ट मार्शल में दोषी ठहराया गया था. कोर्ट मार्शल के बाद बहुत कम विकल्प बचते हैं.''
''इनका अपना पक्ष हो सकता है कि इनके साथ नाइंसाफ़ी हुई है लेकिन कोर्ट मार्शल में इन्हें सज़ा मिली, यह भी एक तथ्य है. पाकिस्तान से इन्होंने जंग लड़ी इसके एवज में अनुशासनहीनता के मामले में कोई छूट नहीं मिल सकती है. इन्होंने राष्ट्रपति से भी शिकायत की थी लेकिन राष्ट्रपति ने भी इनकी मांगों को नकार दिया था.''

अकेलेपन और बदहाली में कटता बुढ़ापा
फौज से निकाले जाने के बाद इंद्र बहादुर गुरुंग को नौकरी की तलाश थी. उन्हें 1985 में पुणे में बजाज में नौकरी मिल गई. एक साल तक गुरुंग ने यहाँ नौकरी की. इसी दौरान वह विश्व हिन्दू परिषद के संपर्क में आए. गुरुंग कहते हैं कि वह 1986 से 2002 तक विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, आरएसएस और दुर्गा वाहिनी में हथियार चलाने की ट्रेनिंग देते रहे. गुरुंग कहते हैं कि वीएचपी नेताओं ने पेंशन दिलाने का आश्वासन दिया था. इसीलिए वह 16 सालों तक इन संगठनों से जुड़े रहे.
गुरुंग कहते हैं, ''इतने सालों तक आरएसएस और वीएचपी में काम करता रहा. उम्मीद थी कि पेंशन मिल जाएगी. 1999 में बीजेपी की सरकार भी बन गई. लेकिन किसी ने नहीं सुनी. सबने मेरा इस्तेमाल किया. 1986 में मैं जब आया तो गुजरात वीएचपी के नेता रहे डॉ विश्ननाथ वनिकर ने पूछा था कि यहाँ के हिन्दू लड़के मुसलमानों से क्यों डर जाते हैं?''
''मैंने कहा था कि आत्मबल की ट्रेनिंग देने की ज़रूरत है. इसके बाद मैंने इनके कार्यकर्ताओ को हथियारों की ट्रेनिंग शुरू कर दी. बाद में पता चला कि यह ट्रेनिंग 1992 में बाबरी मस्जिद तोड़ने की तैयारी का हिस्सा था. बाबरी विध्वंस के दौरान मेरा स्टूडेंट भी मारा गया था.''

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गुरुंग रोते हुए कहते हैं, ''पेंशन तो मिलने से रही लेकिन इस पेंशन के लिए उन लोगों को साथ दिया जो मुसलमानों से नफ़रत करते हैं. पेंशन नहीं मिलने के दर्द से उबर जाता लेकिन जिन लोगों को मैंने 16 सालों तक साथ दिया, उस दर्द से कभी नहीं उबर पाऊंगा.''
गुरुंग कहते हैं कि अब आरएसएस ऑफिस में फोन करते हैं तो कोई बात भी नहीं करता है.
विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार से गुरुंग के आरोपों के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ''नेपाल मिलिंद परांडे जी देखते हैं और वही इस बारे में ज़्यादा ठीक से बताएंगे.''
मिलिंद परांडे से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.
इंद्र बहादुर गुरुंग कहते हैं, ''43 साल इंसाफ़ की तलाश में पागल हो गया हूँ. पाँच साल बनारस ज़िला कोर्ट में लड़ा. इलहाबाद हाई कोर्ट में 1986 में गया. 28 साल यहाँ लड़ा. वकील पैसे ऐंठते गए. बच्चे कहते हैं कि क्यों पीछे पड़े हो. लालकृष्ण आडवाणी से मिला. वीएचपी से मिला. आरएसएस में रहा. लेकिन कहीं इंसाफ़ नहीं मिला.''

इंद्र बहादुर गुरुंग के दो बेटे और एक बेटी हैं लेकिन कोई नेपाल में नहीं रहता है. एक बेटा दक्षिण कोरिया, एक अमेरिका और बेटी हॉन्ग कॉन्ग में हैं. 85 साल की उम्र में अकेले ज़िंदगी काट रहे गुरुंग पाकिस्तान के साथ भारत की दो-दो जंग की कई कहानियां बताते हैं. आरएसएस और वीएचपी के साथ अपना अनुभव बताते हैं.
गुरुंग कहते हैं, ''मुझे उम्मीद नहीं है कि भारत से पेंशन मिलेगी. लेकिन अपने बच्चों को यही सिखाया कि गोरखा बहादुर हैं, इसलिए फौज में ही जाएंगे, इस सोच से बाहर निकलो. मैंने अपने किसी संतान को फौज में नहीं जाने दिया. देशभक्ति और राष्ट्रवाद आम आदमी और इंसानियत को तोड़ने वाली विचारधारा है. आज मैं सेना में बहादुरी के लिए मिले मेडल देखता हूं तो गर्व नहीं ग़ुस्सा आता है.''
इंद्र बहादुर गुरुंग बड़े ही अनमने ढंग से मेडल को फाइल के साथ समेट लेते हैं.

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यह दास्तां केवल इंद्र बहादुर गुरुंग की नहीं
घम बहादुर पुन अभी 79 साल के हो गए हैं. 1962 में इंडियन आर्मी में भर्ती हुए. 1965 में पाकिस्तान से जंग लड़ी. 1971 की जंग में भी मोर्चे पर जाना पड़ा. इनके दो बच्चे हैं. एक बेटा और एक बेटी. बेटा यूरोप चला गया. बीबी की भी मौत हो गई. बेटी के साथ रहते हैं. न घर है न कोई जगह.
नेपाल की सरकार से चार हज़ार रुपए वृद्धा पेंशन मिलती है और उसी से खर्च चलता है. इन्होंने भारतीय सेना में 19 साल चार महीने नौकरी की. पहले सैलरी भी कम थी और कुछ भी पैसा नहीं बचाया. जो बचा उसे केस मुक़दमें में ही खर्च कर दिया. घम बहादुर पुन अपनी दास्तां सुनाते हुए रोने लगे. रोते हुए कहते हैं, ''मौत का इंतज़ार कर रहा हूँ. जिस मुल्क के लिए लड़ा, उससे यही जीवन मिला. अच्छा होता कि सरहद पर मारा जाता.''
रुद्र बहादुर मल्ल नेपाल में श्यांगजा के हैं. 16 साल की उम्र में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे. रुद्र बहादुर भी 4/3 जीआर में ही थे. इन्होंने भी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ 1965 और 1971 की जंग लड़ी थी. श्यांगजा से पोखरा 56 किलोमीटर दूर है. किराया 550 रुपए हैं. लेकिन रुद्र बहादुर क़र्ज़ लेकर अपना दास्तां सुनाने पहुँचे थे.
रुद्र बहादुर कहते हैं, ''मेरा कोई गुनाह नहीं था लेकिन पलटन की सज़ा में मैं पिस गया. मैं भले नेपाल का था पर भारत को अपनी मातृभूमि की तरह समझा और सेवा की. जान की परवाह नहीं की. रेजिमेंट में कमिशन ऑफिसर बनने की उम्मीद थी इसलिए और उत्साह के साथ काम करता था. अगर अब भी रायफल मिल जाए तो दुश्मन से लड़ने को तैयार हूँ.''

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रुद्र बहादुर मल्ल 31 जनवरी 1962 में भारतीय सेना में भर्ती हुए. वह कहते हैं, ''1979 में एक नाटक हुआ था. नाटक कराने वाला कर्नल ओपी भाटिया था और हमें विलेन बना दिया गया. खुखरी से कितनों को हलाल किया. लेकिन इस मेहनत का इनाम यही मिला.''
रुद्र बहादुर मल्ल कहते हैं, ''मेरे पाँच बच्चे हैं. सभी मज़दूरी करते हैं. पत्नी बीमार हैं. घुटना काम नहीं करता है. 84 में मैं नेपाल आ गया था. अंतिम घड़ियां गिन रहा हूँ. 4/3 जीआर के 46 में से 22 मर गए. अब मेरी बारी है. मुझ जैसे दुखी और ग़रीब पर कौन ध्यान देगा.''
''शादी के वक़्त के ससुर ने अंगूठी दी थी. बेचनी पड़ी. एक अंगूठी और बची है पता नहीं इसे भी कब बेचनी पड़े. कर्नल ओपी भाटिया हमलोग को हर समय गाली देता था. कहता था कि महाराजा वीरेंद्र तुम्हें खाने के लिए नहीं देता है, इसलिए यहाँ आए हो. 19 साल तक सेना में रहा और आज दाने-दाने के लिए मोहजात हूँ.''
अगर 1979 में का यह वाक़या नहीं हुआ होता तो 4/3 गोरखा रेजिमेंट के सभी जवानों को अच्छी ख़ासी पेंशन मिल रही होती. कोई कर्नल बनकर रिटायर हुआ होता तो कोई कैप्टन. लेकिन ये पिछले चार दशकों से गुमनाम और मुफलिसी की ज़िंदगी जीने पर मजबूर हैं.
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