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झारखंडः हेमंत सोरेन की सदस्यता पर सस्पेंस जारी, निगाहें राज्यपाल पर
- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए.
बारिश के कारण खुशनुमा हुए रांची के मौसम में सियासी गर्मी का तड़का लगने लगा है. झारखंड की राजधानी रांची का सियासी तापमान बढ़ गया है. इस कारण मुख्यमंत्री आवास और राजभवन में भी सरगर्मी बढ़ी है.
लोगों की दिलचस्पी चुनाव आयोग के उस कथित ख़त का मजमून जानने में है जिसे उन्होंने एक सीलबंद लिफ़ाफ़े में झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस को भेजा है.
जब यह ख़त राजभवन पहुंचा, तब राज्यपाल अपने इलाज के लिए दिल्ली में थे. हालाँकि, 25 अगस्त की दोपहर जब राज्यपाल बैस रांची वापस लौटे तो एयरपोर्ट पर मौजूद मीडिया से उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसे किसी खत की जानकारी नहीं है. वे राजभवन जाने के बाद ही इस बारे में कुछ कहने की हालत में होंगे.
इसके बाद वे राजभवन चले गए लेकिन वहां से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया.
इससे पहले, उनकी रांची वापसी से पहले ही स्थानीय मीडिया में सूत्रों के हवाले से ख़बरें चलने लगी थीं कि चुनाव आयोग ने राज्यपाल को भेजे गए अपने पत्र में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की सिफ़ारिश की है.
बताया जा रहा है कि चुनाव आयोग ने हेमंत सोरेन को लोक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 9-ए के उल्लंघन का दोषी पाया है.
हेमंत सोरेन पर क्या हैं आरोप, चुनाव आयोग कैसे पहुँचा मामला
फरवरी 2022 में झारखंड के सियासी क्रिकेट की गेंद चुनाव आयोग के पाले में तब गई, जब बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास ने रांची में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री और खनन मंत्री रहते हुए अपने पद का कथित तौर पर दुरुपयोग किया है.
उन्होंने आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन ने अपने पद पर रहते हुए रांची ज़िले की एक स्टोन माइंस की लीज़ अपने नाम आवंटित करा ली, जो लोक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 9-ए का उल्लंघन है. रघुबर दास ने तब इससे संबंधित कागज़ात भी मीडिया से साझा किए.
वे बीजेपी के दूसरे नेताओं के साथ तब राजभवन गए और राज्यपाल से मिलकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की विधानसभा सदस्यता खत्म करने की मांग की.
इसके बाद राज्यपाल रमेश बैस ने उस शिकायत की प्रति चुनाव आयोग को भेजकर उनसे मंतव्य देने को कहा. चुनाव आयोग ने इसकी सुनवाई शुरू कर शिकायतकर्ता बीजेपी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को नोटिस भेजकर अपना-अपना पक्ष रखने के लिए कहा.
दोनों पक्षों के जवाब हासिल करने और कई तारीखों के बाद चुनाव आयोग ने इसी महीने अपनी सुनवाई पूरी की. अब चर्चा है कि आयोग ने अपना मंतव्य राज्यपाल को भेज दिया है. इस प्रकार यह गेंद अब वापस राज्यपाल के पास आ गई है.
राज्यपाल की ओर निगाहें
राज्यपाल ने इस मामले पर अभी तक न तो इसकी पुष्टि की है और न ही राजभवन की ओर से कोई खंडन जारी किया गया है.
इस कारण झारखंड की मौजूदा हेमंत सोरेन सरकार के भविष्य को लेकर अटकलें लगायी जा रही हैं. ऐसे में कहा जा रहा है राज्य की सियासत के लिए अगले कुछ घंटे महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं.
राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी और सत्तासीन झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) तथा उनकी सहयोगी पार्टियों के नेता इस घटनाक्रम को लेकर चौकस हैं और अलग-अलग जगहों पर उनकी कुछ बैठकें हुई हैं. दावों-प्रतिदावों का दौर भी चरम पर है.
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी कहा है मीडिया में चल रही खबरों के बावजूद उन्हें चुनाव आयोग या राजभवन से कोई पत्र या सूचना नहीं मिली है.
उन्होंने सवाल किया कि जब चुनाव आयोग की रिपोर्ट सीलबंद लिफ़ाफ़े में भेजी गई है, तो मीडिया को उसका पता कैसे चला. क्या बीजेपी के नेताओं और मीडिया के लोगों ने वह रिपोर्ट तैयार की है.
उन्होंने कहा , "ऐसा लगता है कि बीजेपी के एक सांसद और उनसे जुड़े मीडिया के लोगों ने ही चुनाव आयोग की रिपोर्ट का ड्राफ्ट तैयार किया है. बीजेपी ने संवैधानिक संस्थाओं और सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग और उसपर शर्मनाक तरीके से नियंत्रण कर लिया है. ऐसा भारत के लोकतंत्र में पहले कभी नहीं देखा गया."
इसके बाद एक ट्वीट कर उन्होंने कहा कि -"संवैधानिक संस्थाओं को तो खरीद लोगे, जनसमर्थन कैसे खरीद पाओगे."
आरोपों पर हेमंत सोरेन की सफ़ाई
इस मामले मे हेमंत सोरेन की तरफ से कहा गया कि उस ख़नन पट्टे के लिए उन्होंने कई साल पहले आवेदन किया था. तब वे लाभ के किसी पद पर नहीं थे.
हालांकि, बीजेपी द्वारा इस मामले को उछाले जाने के बाद उन्होंने वह लीज सरेंडर कर दी और उसपर कोई खनन नहीं हुआ.
ऐसे में यह लाभ के पद के दुरुपयोग का मामला ही नहीं है और उन्हें डिस्क्वालिफाई नहीं किया जा सकता.
हेमंत सोरेन के एमएलए भाई की सदस्यता पर भी सवाल
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने साल 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में संथाल परगना की बरहेट और दुमका सीटों से जीत हासिल की थी. बाद में उन्होंने दुमका सीट से इस्तीफा दे दिया.
फिर दुमका सीट पर उपचुनाव हुआ जहाँ से उनके छोटे भाई बसंत सोरेन की जीत हुई. उनके ख़िलाफ भी ऐसा ही एक मामला चुनाव आयोग में लंबित है.
बीजेपी ने आरोप लगाया था कि दुमका के मौजूदा विधायक बसंत सोरेन ने भी लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के प्रावधानों का उल्लंघन किया है.
जेएमएम पहले से ही इन आरोपों का खंडन करती रही है. पार्टी का आरोप है कि बीजेपी संवैधानिक संस्थाओं का बेजा इस्तेमाल कर रही है और इससे उनकी लोकप्रियता पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
जेएमएम के केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य और सांसद विजय हांसदा ने गुरुवार की शाम एक प्रेस कांफ्रेस में कहा कि उन्हें कानून पर भरोसा है. लिहाजा उम्मीद है कि चुनाव आयोग ने वैसा कोई मंतव्य नहीं दिया होगा, जिससे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता खतरे में पड़े. अगर ऐसा कुछ हुआ तो हम ज़रूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए सक्षम जगह पर अपील में जाएंगे.
झारखंड विधानसभा का अंकगणित
जेएमएम के प्रमुख शिबू सोरेन के बड़े बेटे दुर्गा सोरेन की साल 2009 में हुई असमय मौत के कुछ साल बाद उन्होंने हेमंत सोरेन को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया था.
वे मुख्यमंत्री होने के साथ अपनी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं.
उनके नेतृत्व में हुए विधानसभा चुनाव में जेएमएम ने झारखंड की 81 सदस्यीय विधानसभा में 30 सीटें हासिल की थी.
वह पहला मौका था जब जेएमएम ने इतनी अधिक सीटों पर जीत हासिल की. उस चुनाव में जेएमएम ने कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से गठबंधन किया था.
तब कांग्रेस को 18 और आरजेडी को 1 सीट पर जीत मिली. उन्हें एक निर्दलीय और एक माले विधायक का भी समर्थन मिला.
झारखंडः 81 सीटें
- जेएमएमः 30
- कांग्रेसः 18
- आरजेडीः 1
- बीजेपीः 26
- आजसूः 2
- मालेः 1
- निर्दलीयः 3
इस प्रकार उनका गठबंधन सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 41 विधायकों से अधिक के समर्थन के साथ सत्ता में आया था.
अंकगणित के लिहाज से यह गठबंधन विपक्षी बीजेपी गठबंधन से ज्यादा मज़बूत स्थिति में है.
पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 26 और उनके गठबंधन में शामिल आजसू पार्टी को सिर्फ 2 सीटें मिलीं.
उन्हें 2 निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन हासिल है. इसके बावजूद यह गठबंधन विधानसभा में ज़रूरी बहुमत के आंकड़े से फिलहाल बहुत पीछे है.
ऑपरेशन लोटस की चर्चाएँ
झारखंड में वक्त-बेवक्त आपरेशन लोटस की चर्चा होती रहती है. बीजेपी के नेताओं ने भी कई मौकों पर कहा है कि हेमंत सोरेन की सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी.
यहां की सरकार गिराने की कथित साज़िश को लेकर झारखंड पुलिस ने पिछले ढाई साल के दौरान कुछ रिपोर्टें भी दर्ज की थीं. इनमें कुछ लोगों की गिरफ्तारियां भी की गईं. अब उन्हें ज़मानत मिल चुकी है.
तब यह आरोप लगा कि महाराष्ट्र बीजेपी के कुछ नेता झारखंड कांग्रेस के विधायकों को सरकार गिराने के एवज में बड़ी रकम देने का प्रस्ताव दे रहे हैं.
तब कुछ विधायकों पर दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में बीजेपी के नेताओं से मिलने के भी आरोप लगे. उस समय बीजेपी नेताओं ने इन सभी ख़बरों का खंडन किया था.
सरकार गिराने की कथित साज़िश का ताज़ा मामला पिछले महीने चर्चा में आया, जब पश्चिम बंगाल की पुलिस ने कांग्रेस के तीन विधायकों को बड़ी रकम के साथ कोलकाता में गिरफ्तार किया.
तब कांग्रेस के ही एक विधायक ने रांची में पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराकर आरोप लगाया कि असम के मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता हिमंत बिस्वा शर्मा झारखंड सरकार गिराने की साजिश में शामिल हैं.
आरोप लगे कि कोलकाता में गिरफ्तार किए गए झारखंड के उन विधायकों को भी असम के मुख्यमंत्री से मिलाया जाना था ताकि झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार गिराई जा सके.
हालांकि, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इन आरोपों का खंडन किया और अब उन तीनों विधायकों को भी सशर्त ज़मानत मिल चुकी है. ज़मानत की शर्तों के मुताबिक उन्हें अभी कुछ और दिनों तक कोलकाता में ही रहना होगा. वे झारखंड नहीं आ सकते.
झारखंड में केंद्रीय एजेंसियों की गतिविधियां
पिछले कुछ महीने के दौरान झारखंड में न केवल चुनाव आयोग बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई भी चर्चाओं में रही है.
ईडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्र को गिरफ्तार कर लिया और उनके प्रेस सलाहकार से भी लंबी पूछताछ की.
बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे भी ईडी की कार्रवाईयों को लेकर लगातार ट्वीट करते रहे हैं.
इसपर जेएमएम ने कई दफा कड़ी प्रतिक्रिया दी है. गैर भाजपा दलों का आरोप है कि बीजेपी संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल अपनी सियासत साधने में कर रही है.
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