यूक्रेन जंग: रूस आम लोगों से कर रहा है सेना से जुड़ने की अपील

    • Author, विल वर्नोन
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, वोलोसोवो, रूस

रूस के सेंट पीटर्सबर्ग के क़रीब वोलोसोवो शहर में लाउडस्पीकर से आने वाली तेज़ आवाज़ें आम हो गई हैं.

रूस के कई शहरों की तरह यहां भी सड़कों पर बड़े पोल में लाउस्पीकर लगाए गए हैं. आमतौर पर इनका इस्तेमाल राष्ट्रीय त्योहारों के दौरान देशभक्ति गीत बजाने के लिए किया जाता था. लेकिन अब इनका इस्तेमाल दूसरे कारणों के लिए हो रहा है.

आजकल स्पीकर से एलान किया जाता है, "दो हथियारबंद बटालियन बनाए जा रहे हैं. हम 18 से 60 साल के लोगों से जुड़ने की अपील करते हैं."

ये संदेश देश के कई हिस्सों में दोहराया जा रहा है. सोशल मीडिया, टीवी और बैनरों पर लोगों को शॉर्ट-टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर यूक्रेन के साथ लड़ने के लिए कहा जा रहा है. लड़ाई में कई सैनिकों की मौत के बाद रूसी सेना नए लोगों की भर्ती के लिए अभियान चला रही है. मैंने वोलोसोवो की सड़क पर एक व्यक्ति को रोककर पूछा कि वो इसके बारे में क्या सोचते हैं.

उन्होंने कहा, "अगर मैं जवान होता तो मैं ज़रूर जाता, लेकिन अब मैं बूढ़ा हो चुका हूं." इसके बाद वो मुट्ठी बांधते हुए कहते हैं, "हमें उनपर बमबारी करनी चाहिए."

लेकिन ज़्यादातर लोग इसे लेकर कम ही उत्साहित हैं. एक महिला शिकायती लहज़े में कहती हैं, "इस जंग के बारे में बात करना भी दर्दनाक है.अपने भाइयों को मारना ग़लत है."

मैंने पूछा कि अगर उनकी जान-पहचान का कोई जाना चाहे तो वो क्या कहेंगी, "उन्हें क्यों जाना चाहिए, वहां से सिर्फ़ लाश ही वापस आएगी."

और लाशें वापस आ भी रही हैं.

कितने सैनिकों की हुई मौत?

रूस ने मौतों से जुड़े आंकड़े नहीं बताए हैं. लेकिन पश्चिमी देशों के अधिकारियों की माने को 70,000 से 80,000 रूसी सैनिकों की मौत हो चुकी है.

नए लोगों की भर्ती के लिए, सरकार बहुत पैसे देने के लिए तैयार है. इसके अलावा ज़मीने और अच्छे स्कूलों में बच्चों की शिक्षा का भी वादा कर रही है. यहीं नहीं रूसी सेना जेलों में बंद लोगों को भी साथ आने के लिए कह रही है और बदले में आज़ादी करने का वादा कर रही है.

खोजी पत्रकार रोमन दोब्रोख़ोतोव के मुताबिक भर्ती प्रक्रिया इस बात का संकेत है कि रूसी सेना में हताशा है.

वो कहते हैं, "इस तरह के सैनिकों से जंग नहीं जीती जा सकती. रूस को अभी भी लगता है कि ख़राब गुणवत्ता के बावजूद संख्या बल पर जंग जीती जा सकती है. उन्हें लगता है कि कर्ज़ में डूबे लोगों को वो जंग के मैदान में भेज सकते हैं."

5700 डॉलर के ऑफ़र के बावजूद रोमन दोब्रोख़ोतोव का कहना है कि सच्चाई अलग है. वो कहते हैं, "लोगों को पैसे से फ़र्क नहीं पड़ता. जो यूक्रेन से लौट रहे हैं वो वहां की सच्चाई हम पत्रकारों को बता रहे हैं कि कैसे उन्हें धोखे में रखा गया. इसका असर यहां भी दिख रहा है. सरकार पर भरोसा कम होता जा रहा है, इसलिए मुझे नहीं लगता कि ये तरीका काम करेगा."

लेकिन कई लोग खुशी से सेना से जुड़ना चाहते हैं.

नीना छुबारिना के बेटे येवेगेनी अपना गांव छोड़कर बटालियन में वॉलंटियर करने गए . नीना का कहना है बिना किसी ट्रेनिंग के उनके हाथ में बंदूक थमा दी गई. कुछ ही दिनों बाद उनकी मौत की ख़बर आई.

नीना मुझसे एक पार्क में मिलने के लिए तैयार हुईं, यहीं उन्हें एक ब्रेड फ़ैक्ट्री में पार्ट टाइम काम मिला है. उनका कहना है कि काम में ध्यान लगा रहता है तो बेटे की याद कम आती है.

उन्हें याद है कि उन्होंने अपने बेटे से यूक्रेन जाने से मना किया था.

रूस को नहीं मिल रहा लोगों का समर्थन

वो रोते हुए कहती हैं, "मैंने उससे बात करने की कोशिश की. मैंने कहा कि जंग चल रही है, वहां मारे जाओगे. उसने कहा कि मां सबकुछ ठीक हो जाएगा."

यूक्रेन की जंग के लिए जिस तरीके से भर्तियां हो रही हैं , नीना उसकी आलोचना करती हैं. वो कहती हैं, "उन्हें मुर्गियों की तरह वहां फेंक दिया जा रहा है. उन्होंने पहले शायद ही कभी बंदूक पकड़ी हो. उन्हें लग रहा है, कोई वॉलंटियर मिल गया, इसे ले आओ."

लेकिन हर कोई वॉलंटियर करने के लिए उत्साहित नहीं है.

रूस का कहना है कि इस "स्पेशल मिलिट्री ऑपरेशन" को लोगों का समर्थन मिल रहा है लेकिन देश में घूमने के बाद आपको ये संकेत मिलते हैं कि रूस के लोग सरकार के साथ नहीं हैं.

जंग के समर्थन वाला चिन्ह, अंग्रेज़ी का अक्षर Z, बहुत ही कम गाड़ियों पर दिखता है. जानकारों का कहना है कि वॉलंटियर्स के जुड़ने की संख्या बहुत ही कम है.

सैन्य मामलों के जानकार पैवल ल्यूज़िन का कहना है कि अपने राष्ट्रपति के लिए लोग अपनी जान नहीं देना चाहते.

वो कहते हैं, "रूस के लोग पुतिन के तथाकथित 'द ग्रेट इम्पायर' के लिए मरना नहीं चाहते. भर्ती अभी इसलिए मुमकिन नहीं है क्योंकि जंग को लेकर लोगों में एकजुटता नहीं है."

"इसकी तुलना यूक्रेन से करिए. वहां लोग लड़ने के लिए तैयार हैं."

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