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ताइवान पर चीन के रुख़ से बढ़ गई है जापान की चिंता, क्या कह रहा है जापानी मीडिया
जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा ने ताइवान के नज़दीक चीन के जारी सैन्य अभ्यास की निंदा की है और इसे 'बड़ी समस्या' बताया है.
प्रधानमंत्री ने चीन के आक्रामक रवैये को जापान की क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए भी बड़ा ख़तरा माना है.
दरअसल, अमेरिकी कांग्रेस की स्पीकर नैंसी पेलोसी के ताइवान दौरे के बाद बीते 4 अगस्त से चीन ताइवान को घेरकर सैन्य अभ्यास कर रहा है.
उसने कई बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं. इनमें पांच मिसाइलें जापान के विशेष आर्थिक क्षेत्र में भी गिरी हैं. जिसके बाद जापानी प्रधानमंत्री ने चीन से तत्काल सैन्य अभ्यास रद्द करने की मांग की.
हालांकि इसका कोई असर नहीं हुआ. ऐसे में चीन की कार्रवाई से न केवल ताइवान, बल्कि जापान की भी चिंताएं बढ़ गई हैं.
जापान के प्रधानमंत्री ने साफ़तौर पर कहा है कि चीन की कार्रवाइयों का उनके क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की शांति और स्थिरता पर गंभीर प्रभाव पड़ा है.
जापानी मीडिया में भी चीन की सैन्य कार्रवाई और देश की आंतरिक सुरक्षा के सामने खड़ी चुनौतियों पर कई बातें लिखी जा रही हैं.
क्या कह रहा है जापानी मीडिया?
ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल जापान टुडे ने चीन की कार्रवाई के बाद देश में आंतरिक सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंताओं पर एक लेख प्रकाशित किया है.
लेख में कहा गया है कि जापान के विशेष आर्थिक क्षेत्र में गिरी चीन की पांच मिसाइलों के बाद, लोग बढ़-चढ़ कर देश में सैन्य निर्माण की ज़रूरतों का समर्थन कर सकते हैं.
लेख में देश की सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ सांसद और पूर्व विदेश और रक्षा मंत्री तारो कोनो के हवाले से लिखा गया कि चीन की हालिया कार्रवाई ये दर्शाती है कि अगर ताइवान के साथ कुछ हुआ तो जापान भी प्रभावित होगा.
"ये साफ़तौर पर जापान के लिए ख़तरे के संकेत हैं."
लेख में चीन से बढ़ती चुनौती पर जापानी सेल्फ डिफेंस फोर्सेस ज्वॉइंट स्टाफ के पूर्व प्रमुख एडमिरल कत्सुतोशी कवानो कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि रक्षा बजट को लेकर अब गंभीर चर्चा होगी."
वहीं जापान के ताकुशोकू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ताकाशी कावाकामी ने कहा है कि चीन ने किशिदा को अपना रुख़ स्पष्ट करने का मौका दिया है.
"जापान को ये दिखाने की ज़रूरत है कि वो लड़ने के लिए तैयार है."
शांतिवादी संविधान बना चुनौती
हालांकि जापान में सुरक्षा एक विभाजनकारी मुद्दा रहा है. दूसरे विश्व युद्ध में हारने के बाद, अमेरिका के कहने पर जापान ने शांतिवादी संविधान अपनाया और बदले में अमेरिका ने जापान की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उठाई.
जापान के संविधान के अनुच्छेद 9 के तहत, वह कभी भी किसी देश के साथ अपने विवाद को सुलझाने के लिए सैन्य शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता.
साथ ही, वह न तो कोई सेना रख सकता है और न ही सेना से जुड़े सामान तैयार कर सकता है, लेकिन फ़रवरी में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद से ताइवान और जापान में चीनी सैन्य गतिविधियों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं.
चिंता इस बात को लेकर भी बढ़ी है कि अगर चीन और जापान के बीच टकराव की स्थिति पैदा होती है तो अमेरिका किस हद तक उनकी मदद करेगा.
इन चिंताओं के मद्देनज़र पिछले कुछ सालों में जापान के रक्षा बजट में लगातार इज़ाफ़ा हुआ है. वहीं सैन्य ताकत बढ़ाने को लेकर भी चर्चाएं तेज़ हुई हैं.
'धमकियों के ख़िलाफ़ मज़बूती से खड़े होने का व़क्त'
जापान के सबसे बड़े और पुराने अंग्रेज़ी अख़बार दी जापान टाइम्स अपने संपादकीय में लिखा है कि ये व़क्त चीन की धमकियों के ख़िलाफ मज़बूती से खड़े होने का है.
"ताइवान के मित्र देश और समर्थकों को पेलोसी के दौरे का समर्थन करना चाहिए और ये सुनिश्चित करना चाहिए कि चीन ने ख़ुद को संकट में धकेल दिया है. ताइवान को लेकर अमेरिका, यहां तक कि पूरे क्षेत्र की नीति नहीं बदली है."
अखबार ने लिखा है, "हम सभी चीन की चिंताओं से वाक़िफ़ हैं, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम ताइवान के ख़िलाफ चीन की धमकियों और वहां के नागरिकों के अधिकारों के उल्लंघनों के साथ समझौता कर लें."
इसके लिए एक कठोर कूटनीति बनाने के साथ ही रक्षा बलों को मज़बूत करने की ज़रूरत है.
अख़बार अपने संपादकीय में कहता है कि चीनी नेतृत्व इस बात से वाक़िफ़ है कि ताइवान के ख़िलाफ़ सीधा कदम उठाना उसके लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है. फिर भी, चीन का कोई भरोसा नहीं.
संबंधित सरकारों को इस बात का ख़याल रखना चाहिए कि चीन शांत रहे और अस्थिर करने वाली गतिविधियों से दूर रहे. इसके साथ ही इन देशों को किसी भी विपरीत परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने की ज़रूरत है.
आसियान देशों में सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता
निक्केई एशिया ने अपनी रिपोर्ट में ताइवान तनाव के बीच आसियान देशों की सुरक्षा चुनौतियों पर बात की है.
रिपोर्ट में ये दावा किया गया है कि पेलोसी के ताइवान दौरे के बाद जिस तरह से चीन ने अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर की है, इससे आसियान देशों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है.
यही वजह है कि शुक्रवार को कैम्बोडिया में दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों के संगठन (आसियान) के विदेश मंत्रियों की बैठक में ताइवान का मुद्दा छाया रहा.
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने पेलोसी के ताइवान दौरे पर चीन की प्रतिक्रिया को गलत ठहराते हुए कहा कि पेलोसी का दौरा शांतिपूर्ण था. सैन्य अभ्यास के रूप में चीन की ये प्रतिक्रिया, कहीं से भी जायज़ नहीं ठहराई जा सकती.
जापान के आर्थिक क्षेत्र में चीनी मिसाइल गिरने पर ब्लिंकन ने कहा कि अमेरिका 'चीन की ख़तरनाक कार्रवाई' के मद्देनजर जापान के साथ 'मज़बूती से खड़ा' है.
सैन्य अभ्यास बना चिंता का सबब
ब्रितानी दैनिक समाचार पत्र 'दी गार्डियन' में छपे एक लेख के मुताबिक़ जापान के बाहरी दक्षिणी द्वीपों के नज़दीक चीन का सैन्य अभ्यास देश के लिए चिंता का सबब बना हुआ है.
चीन जापान के जिन द्वीपों के नज़दीक सैन्य अभ्यास कर रहा है, उनमें योनागुनी, जो ताइवान से सिर्फ 100 किमी (62 मील) की दूरी पर है, और सेनकाकस शामिल है.
सेनकाकस एक ऐसा द्वीप है, जो जापान द्वारा प्रशासित है, लेकिन चीन और ताइवान दोनों ही देश इस पर अपना दावा करते हैं. चीन जापान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, लेकिन सेनकाकस के मुद्दे पर दोनों ही देश आमने-सामने हैं.
सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने चीन और परमाणु-सशस्त्र उत्तर कोरिया से बढ़ते खतरों का हवाला देते हुए सैन्य खर्च को जीडीपी के 2% तक दोगुना करने का वादा किया है.
जापान के रक्षा मंत्री नोबुओ किशी ने देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र में गिरी चीनी मिसाइलों का विरोध करते हुए कहा है कि ये "जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा और जापानी लोगों के जीवन के लिए खतरा है. इसकी हम कड़ी निंदा करते हैं".
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