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ताइवान और चीन को लेकर भारत ने साधी चुप्पी, क्या है मोदी सरकार की रणनीति? - प्रेस रिव्यू
अमेरिकी संसद की स्पीकर नैंसी पेलोसी के ताइवान दौरे के बाद जहां रूस, पाकिस्तान और श्रीलंका ने चीन के समर्थन में बयान दिया है वहीं, भारत इस मामले में बहुत संभलकर कदम बढ़ा रहा है.
अमेरिकी नेता के दौरे से गुस्साए चीन ने ताइवान के नज़दीक सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया. चीन ने ताइवान के उत्तर पूर्व और दक्षिण पश्चिम सीमा के पास समुद्र में कई डॉन्गफेंग बैलेस्टिक मिसाइल दागे.
नैंसी पेलोसी के दौरे के बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने फौरन प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, "जो लोग आग से खेल रहे हैं, वे जल जाएंगे."
पिछले 25 सालों में अमेरिका से इतनी बड़ी हैसियत का कोई शख़्स ताइवान की यात्रा पर नहीं गया था.
लेकिन, भारत की ओर से इस पूरे मामले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की इस बीच अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन से भी मुलाक़ात हुई लेकिन चीन को लेकर कोई बयान नहीं आया.
चीन और ताइवान के विवाद में भारत के रुख़ के बारे में अग्रेज़ी अख़बार द हिंदू ने एक विशेष लेख छापा है. आज अख़बारों की समीक्षा में चर्चा इसी लेख की.
वरिष्ठ पत्रकार सुहासिनी हैदर और अनंत कृष्णन के इस लेख में कहा गया है कि भारत सीमा विवाद को लेकर चल रही बातचीत के इस संवेदनशील समय में चीन के साथ कोई विवाद पैदा नहीं करना चाहता. हालांकि, भारत 'वन चाइना पॉलिसी' को लेकर अपना समर्थन भी ज़ाहिर नहीं करना चाहता है.
रिपोर्ट के अनुसार ताइवान यात्रा से अमेरिका और चीन के बीच पैदा हुए तनाव के बीच कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. लेकिन, भारत ने इस पूरे मामले में 'सोची-समझी चुप्पी' साधने का फ़ैसला किया है. यहां तक कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कंबोडिया में भारत-आसियान मंत्री स्तरीय बैठक में भी इस मसले पर कोई बयान नहीं दिया.
अमूमन ऐसे मामलों में निष्पक्षता जाहिर करने के मकसद से कोई देश दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील करता है. लेकिन, ताइवान के मामले में भारत ने ऐसा कोई बयान भी नहीं दिया है.
भारत के फ़ैसले की वजह
अख़बार लिखता है कि भारतीय अधिकारियों और विशेषज्ञों के मुताबिक भारत सोच-समझकर कोई बयान देने से बच रहा है क्योंकि वो अमेरिका और चीन के बीच ऐसे संवेदनशील मसले पर किसी भी विवाद से बचना चाहता है. वहीं, भारत ने कम से कम साल 2010 से इस क्षेत्र के अन्य देशों के उलट ''वन चाइना'' नीति का ज़िक्र करना छोड़ दिया है.
एस जयशंकर गुरुवार को भारत-आसियान सम्मेलन में शामिल हुए थे. यहां उनकी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका और वियतनाम के विदेश मंत्रियों से मुलाक़ात हुई.
जयशंकर ने इस बातचीत को 'उत्पादक' और 'गर्मजोशी' भरा बताया और कहा कि उन्होंने आसियान देशों के साथ कई मसलों पर बात की है जिसमें भारत-प्रशांत क्षेत्र, कनेक्टिविटी, कोविड-19, आतंकवाद, साइबरसिक्योरिटी, यूक्रेन और म्यांमार शामिल है. लेकिन, उनके बयान में ताइवान का ज़िक्र नहीं था.
वहीं, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भी इस मामले पर कोई बयान नहीं दिया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने वैश्विक और क्षेत्रीय मसलों पर वैचारिक आदान-प्रदान किया. इसमें यूक्रेन पर रूस का हमला और दुनिया भर में खाने के सामान को लेकर पैदा हुआ संकट जैसे मसले शामिल थे.
अधिकारी और विशेषज्ञ कहते हैं कि नैंसी पेलोसी के दौर पर चीन की तीखी प्रतिक्रिया को देखते हुए भारत ने ये निर्णय लिया है. सेवानिवृत्त हो चुके एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ''चीन के विरोध और समर्थन दोनों से बचने के लिए भारत ने चुप रहने को सबसे बेहतर प्रतिक्रिया माना है.''
भारत 1949 से वन चाइना नीति को मानता आ रहा है. वन चाइना पॉलिसी का मतलब उस नीति से है, जिसके मुताबिक़ 'चीन' नाम का एक ही राष्ट्र है और ताइवान अलग देश नहीं, बल्कि उसका प्रांत है. भारत के संदर्भ में वो ताइवान के साथ सिर्फ़ व्यापारिक और सांस्कृति संबंध रख सकता है.
भारत ने क्यों छोड़ा 'वन चाइना' का ज़िक्र
लेकिन, भारत ने साल 2008 के बाद सरकारी बयानों और संयुक्त बयानों में इस नीति का ज़िक्र करना छोड़ दिया था.
अधिकारियों के मुताबिक भारत ने ये फ़ैसला तब लिया जब चीन ने अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताने वाले बयान दिए, अरुणाचल के दो शहरों को मंदारिन भाषा में नाम दिए और जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल में रहने वाले भारतीय नागरिकों के लिए स्टेपल वीज़ा जारी किया था.
साल 2010 में ब्राज़ील में तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिनताओ और प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के साथ तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के संयुक्त बयान में वन चाइना नीति का संदर्भ नहीं दिया गया था.
एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, ''इसके पीछे सोच ये थी कि अगर चीन हमारे लिए संवेदनशीलता नहीं दिखा रहा तो हमें वन चाइना नीति को दोहराने की ज़रूरत क्यों है. ये भारत की नीति में बदलाव नहीं था बस उसे ना दोहराने का फ़ैसला लिया गया था.''
एक अन्य पूर्व अधिकारी कहते हैं, ''हमने ये संदेश दिया था कि अगर चीन चाहता है कि भारत वन चाइना नीति को माने तो उसे वन इंडिया के सिद्धांत का सम्मान करना चाहिए.'' अधिकारी बताते हैं कि साल 2014 में बीजेपी सरकार के आने के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी इस फ़ैसले को स्वीकार किया था.
ताइवान और चीन ने भारत को किया आगाह
लेकिन, भारत की चुप्पी के बीच चीन और ताइवान ने अपने बयानों में भारत का ज़िक्र किया है. दोनों ही तरफ़ से भारत पर एक तरह का दबाव बनाने की कोशिश है.
अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स ने भी चीन-ताइवान मुद्दे पर एक ख़ास रिपोर्ट प्रकाशित की है. अख़बार ने ताइवान के राजदूत बाओशेन गेर के साथ एक साक्षात्कार किया है जिसमें उन्होंने चीन को लेकर भारत को आगाह किया. उनसे पूछा गया था ताइवान के लोग नैंसी पेलोसी के दौरे, ताइवान के साथ अमेरिकी एकजुटता और लोकतंत्र को लेकर उनके बयान पर क्या सोचते हैं.
इसी सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने भारत का ज़िक्र भी किया. बाओशेन गेर ने कहा, ''लोकतंत्र सिर्फ़ रोशनी में फलता-फूलता है. अगर लोकतांत्रिक सिद्धातों के प्रति चीन की उपेक्षा और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के उल्लंघन पर ध्यान नहीं दिया गया और दूसरे लोकतांत्रिक देशों ने चुप्पी साधे रखी तो सिर्फ़ ताइवान ही नहीं बल्कि दूसरे आज़ाद और क़ानून से संचालित देश भी दीर्घकाल में इसका खामियाजा भुगतेंगे.''
उन्होंने कहा, ''कुछ टिप्पणीकर्ता मान सकते हैं कि ताइवान और दक्षिण चीन सागर में चीन की व्यस्तता से हिंद महासागर की तरफ़ उसका ध्यान कम हो जाएगा और तब भारत चीन के साथ कुछ समय के लिए शांति बनाए रखने को लेकर निश्चिंत हो सकता है. लेकिन, मैं इससे असहमत हूं. साल 2020 के बारे में सोचें, जब गलवान घाटी ने भारत-चीन सीमा पर टकराव हुआ था.''
राजदूत बाओशेन ने कहा, ''वास्तव में ताइवान और भारत दोनों अधिनायकवादी विस्तारवाद का सामना कर रहे हैं. ऐसे में लोकतांत्रिका और समान विचार वाले देशों का सहयोग पहले से ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है ताकि हम अपनी साझा समृद्धि और सामूहिक सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकें और आधिनायकवादी देशों के आर्थिक और सैन्य दबाव से एकसाथ मिलकर खुद की रक्षा कर सकें.''
वहीं, अंग्रेज़ी अख़बार डेक्कन हेराल्ड के मुताबिक भारत में चीन के दूतावास ने बयान जारी कर कहा है कि 'वन चाइना' नीति को लेकर भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच सामान्य सहमति है. साथ ही ये किसी भी देश के साथ संबंधों को विकसित करने के लिए चीन की राजनीतिक बुनियाद है.
ये बयान नैंसी पेलोसी के दौरे के एक दिन बाद जारी किया गया है. बयान में कहा गया है, ''भारत वन चाइना को मान्यता देने वाले पहले देशों में रहा है. चीन वन चाइना नीति के आधार पर हमारे संबंधों के विकास को आगे बढ़ाने के लिए इच्छुक है.''
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