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अल ज़वाहिरीः अमेरिका ने ऐसे बनाया बस अल क़ायदा नेता को निशाना, बीवी-बेटी रहे महफ़ूज़
- Author, बर्नड डेबुसमान, बीबीसी न्यूज़
- पदनाम, और क्रिस पैट्रिज, बीबीसी वेपंस एक्सपर्ट
31 जुलाई को सूर्योदय हुए कोई घंटा भर हुआ होगा, जब अल-क़ायदा के मुखिया अयमन अल-ज़वाहिरी टहलते हुए बालकनी पर आए.
बताते हैं, काबुल के एक मुख्य इलाक़े में स्थित इस घर में रह रहे मिस्र के इस नामी जिहादी का ये पसंदीदा शगल था. वो सुबह की नमाज़ के बाद अमूमन बालकनी पर आया करते थे.
मगर पिछले रविवार को ये आख़िरी काम था जो वो कर सके. ठीक 06:18 बजे (स्थानीय समय), दो मिसाइल बालकनी पर आकर गिरी, धमाका हुआ, और 71 साल के ज़वाहिरी की मौत हो गई.
लेकिन भीतर मौजूद ज़वाहिरी की पत्नी और बेटी को खरोंच तक नहीं आई.
ऐसा लगता है कि हमले से जो भी टूट-फूट हुई वो केवल बालकनी में ही हुई.
तो ये हमला ऐसा सटीक कैसे हुआ? इससे पहले कई बार ऐसा हुआ है जब अमेरिका ने हमले किए और इसमें निशाना चूका, या ग़लती हुई, जिससे आम लोग मारे गए, और फिर इसे लेकर हंगामा हुआ.
लेकिन ज़वाहिरी पर हुए हमले के मामले में, जिस तरह की मिसाइल का इस्तेमाल हुआ, और जिस तरह से ज़वाहिरी की आदतों पर क़रीबी नज़र रखी गई और उसका अध्ययन किया गया, उसी की वजह से ऐसा सटीक हमला हो सका - और आने वाले दिनों में ऐसे और भी हमले हो सकते हैं.
लेज़र तकनीक
अमेरिका ने हमले में जिस तरह की मिसाइल का इस्तेमाल किया वो सबसे अहम है. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक़ ये हेलफ़ायर मिसाइल थे जिन्हें ड्रोन से दाग़ा गया.
ये हवा से सतह पर मार करने वाली मिसाइलें हैं जो 11 सितंबर 2001 के हमले के बाद के दशकों में विदेशों में अमेरिका के आतंकवाद-विरोधी अभियानों का एक नियमित हिस्सा बन चुका है.
इन मिसाइलों को कई जगहों से दागा जा सकता है, कभी हवा में हेलिकॉप्टर या हवाई जहाज़ से, तो कभी ज़मीन पर किसी वाहन से, कभी समुद्र में किसी जहाज़ से - या फिर ज़वाहिरी के मामले में, किसी मानवरहित ड्रोन से.
समझा जाता है कि ये वही मिसाइल है जिससे उसने 2000 में बग़दाद में ईरानी सैन्य जनरल क़ासिम सुलेमानी को मारा था.
2015 में सीरिया में इस्लामिक स्टेट के ब्रिटेन में जन्मे ख़तरनाक चरमपंथी "जिहादी जॉन" को मारने में भी इसी मिसाइल का इस्तेमाल हुआ था.
हेलफ़ायर मिसाइलों के बार-बार इस्तेमाल किए जाने के पीछे मुख्य वजह इसका सटीक होना है, यानी ये बिलकुल निशाने पर मार करता है.
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जब किसी मिसाइल को ड्रोन से दाग़ा जाता है, तो कई बार उसको चलाने वाला ऑपरेटर कहीं दूर किसी एसी कमरे में बैठा होता है, जो दूर अमेरिका तक में हो सकता है. वो लक्ष्य का लाइव वीडियो स्ट्रीम देखता होता है, जो ड्रोन पर लगे कैमरों में लगे सेंसर्स सैटेलाइट माध्यम से भेजते रहते हैं.
कैमरा ऑपरेटर स्क्रीन पर लगे "टारगेटिंग ब्रैकेट्स" का इस्तेमाल कर, लक्ष्य को "लॉक" कर देते हैं और फिर उसकी ओर एक लेज़र किरण फेंकते हैं.
इसके बाद जैसे ही मिसाइल दाग़ी जाती है, वो लेज़र के रास्ते जाता है और सीधे लक्ष्य पर चोट करता है.
ड्रोन चलाने वाली टीम के सामने स्पष्ट दिशा-निर्देश होते हैं और कोई भी क़दम उठाने के लिए उन्हें उनका पालन करना ही पड़ता है, ताकि इसमें आम लोगों की जान ना जाए.
इससे पहले अमेरिका और सीआईए ने जो भी हमले किए हैं, उनमें हमले का आदेश देने से पहले सेना के वकीलों से परामर्श किया जाता रहा है.
इस तरह के अभियानों के विशेषज्ञ और सायराक्यूस यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फ़ॉर सिक्योरिटी पॉलिसी एंड लॉ के संस्थापक प्रोफ़ेसर विलियम बैंक्स का कहना है कि अधिकारियों को आम लोगों के मारे जाने के जोखिम और जिसे निशाना बनाया जाना है उसकी अहमियत के बीच संतुलन बनाना पड़ता है.
वो कहते हैं, कि ज़वाहिरी पर हुआ हमला, इस प्रक्रिया का एक "आदर्श इस्तेमाल" प्रतीत होता है.
प्रोफ़ेसर बैंक्स कहते हैं, "ऐसा लगता है कि वो लोग ज़वाहिरी को लक्ष्य करने के लिए जगह और समय को चुनने को लेककर बहुत सावधान थे, कि केवल उसे ही निशाना बनाया जाए, किसी और को नुक़सान ना हो."
ज़वाहिरी पर हुए हमले के बारे में एक और बात कही जा रही है, जिसकी हालाँकि पुष्टि नहीं हुई है, कि अमेरिका ने हेलफ़ायर मिसाइल के एक ऐसे प्रकार का इस्तेमाल किया जिसके बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है. आर नाइन एक्स (R9X) में छह ब्लेड होते हैं जो काइनेटिक एनर्जी का इस्तेमाल कर लक्ष्य को भेदता है.
समझा जाता है कि 2017 में अल-क़ायदा के एक अन्य नेता और ज़वाहिरी के मातहत काम करने वाले एक सहयोगी अबू ख़ैर अल-मसरी को सीरिया में R9X हेलफ़ायर से ही मारा गया था.
हमले के बाद अल-मसरी के वाहन की ली गई तस्वीरों से पता चलता है कि मिसाइल ने गाड़ी की छत में एक सूराख़ किया और भीतर बैठे लोगों को भेद डाला. मगर ना तो कोई धमाका हुआ और ना ही गाड़ी को कोई नुक़सान पहुँचा.
ज़वाहिरी के बालकनी पर जाने की आदत पर अमेरिका रखे था नज़र
काबुल में हमला करने से पहले अमेरिका ने क्या कुछ ख़ुफ़िया जानकारियाँ जुटाई थीं, अभी इसका ब्यौरा आ ही रहा है.
हालाँकि, हमले के बाद अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि उनके पास उस घर में ज़वाहिरी की जीवन शैली को लेकर पर्याप्त जानकारी थी, जैसे कि उनकी बालकनी पर जाने की आदत के बारे में.
इससे ऐसा लगता है कि अमेरिकी जासूस इस घर पर महीनों नहीं, तो कम-से-कम कई हफ़्तों से नज़र रखे हुए थे.
सीआईए के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी मार्क पॉलिमेरोपूलोस ने बीबीसी से कहा कि बहुत मुमकिन है कि हमले से पहले कई तरह के ख़ुफ़िया तरीक़ों का इस्तेमाल किया गया, जिनमें ज़मीन पर मौजूद जासूसों से मिली जानकारियाँ शामिल हैं.
कुछ और लोगों का ये भी अंदाज़ा है कि अमेरिकी ड्रोन्स या एयरक्राफ़्ट्स बारी-बारी से हफ़्तों या महीनों तक उस जगह की निगरानी करते रहे, जिन्हें नीचे से ना तो देखा जा सका, ना सुना जा सका.
मार्क पॉलिमेरोपूलोस ने कहा,"आपको ऐसी जानकारी चाहिए जो बिल्कुल पुख़्ता हो, कि ये वही शख्स है, और हमला इस तरह से कहना है कि कोई आम नागरिक ना मारा जाए."
"इसके लिए काफ़ी धैर्य की ज़रूरत होती है."
वो साथ ही ध्यान दिलाते हैं कि ज़वाहिरी पर हुए हमले में अमेरिका की ख़ुफ़िया बिरादरी को दशकों के अपने उस तजुर्बे का लाभ हुआ जब उन्होंने अल-क़ायदा के दूसरे नेताओं या दूसरे चरमपंथियों को निशाना बनाया था.
वो कहते हैं, "हम इसमें काफ़ी माहिर हैं. ये ऐसी चीज़ है जिसमें पिछले 20 सालों में अमेरिका सरकार काफ़ी अच्छी हो गई है."
हालाँकि, इस तहर के अभियानों में सब कुछ हमेशा योजना के हिसाब से नहीं होता. 29 अगस्त 2021 को, काबुल हवाई अड्डे के पास एक ड्रोन हमले में, निशाना इस्लामिक स्टेट की एक स्थानीय ईकाई को बनाया जाना था, मगर इसकी जगह 10 निर्दोष लोग मारे गए. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने बाद में स्वीकार किया एक "भारी ग़लती" हो गई.
अमेरिका के ड्रोन हमलों पर कई वर्षों से नज़र रख रहे एक जानकार, फ़ाउंडेशन फ़ॉर डिफ़ेंस ऑफ़ डेमोक्रेसीज़ के एक वरिष्ठ फ़ेलो बिल रोगियो कहते हैं कि पहले के अभियानों की तुलना में ज़वाहिरी पर हुआ हमला कहीं ज़्यादा मुश्किल था क्योंकि इस बार ना तो हमले की जगह के आस-पास अमेरिका था ना उनके सहयोगी.
जैसे, पहले कई ऐसे ड्रोन हमले हुए वो पाकिस्तान में हुए, और उन्हें अफ़ग़ानिस्तान से दाग़ा गया. वैसे ही सीरिया में जो हमले हुए उन्हें इराक़ से दाग़ा गया.
बिल रोगियो कहते हैं,"उन जगहों पर, अमेरिका के लिए पहुँचना कहीं आसान था. ज़मीन पर उनके लोग थे. मगर ये बहुत मुश्किल था. अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद से अल-क़ायदा या इस्लामिक स्टेट पर किया गया ये पहला हमला था. ये सामान्य बात नहीं है."
क्या ये फिर हो सकता है?
बिल रोगियो का कहना है कि उन्हें हैरानी नहीं होगी, अगर अफ़ग़ानिस्तान में अल-क़ायदा के ख़िलाफ़ फिर ऐसे हमले होते हैं.
वो कहते हैं,"ऐसे लोगों की कमी नहीं जिन्हें निशाना बनाया जा सकता है. अल-क़ायदा के अगले संभावित नेता अगर अफ़ग़ानिस्तान में पहले से ही मौजूद नहीं हैं, तो वो वहाँ जा सकते हैं."
"सवाल ये है कि अमेरिका क्या अब भी ये आसानी से कर सकता है, या ये एक मुश्किल काम होगा."
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