ताइवान की यूक्रेन से तुलना पर भड़का चीन, कहा- हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं

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जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने 12 अप्रैल को अमेरिकी अख़बार लॉस एंजिलिस टाइम्स में एक लेख लिखकर यूक्रेन और ताइवान की तुलना की थी और कहा था कि अमेरिका को ये साफ़ करना चाहिए कि वह ज़रूरत पड़ने पर ताइवान की मदद के लिए खड़ा होगा.
इस लेख के जवाब में चीन के काउंसल जनरल ज़ांग पिंग ने एक चिट्ठी अख़बार को लिखते हुए शिंजो आबे के लेख पर कड़ा ऐतराज़ दर्ज कराया है.
लेख के जवाब में ज़ांग पिंग ने लिखा है-
ऑप-पेड के लेखक शिंजो आबे ने ग़ैर-ज़िम्मेदाराना टिप्पणी करते हुए अमेरिका से यह स्पष्ट करने को कहा है कि वह ताइवान की रक्षा के लिए खड़ा रहेगा. यह केवल दो मुख्य देशों के बीच टकराव को भड़काने का काम है. चीन ऐसी बात को मज़बूती से ख़ारिज करता है.
ताइवान और यूक्रेन की स्थितियों की तुलना नहीं की जा सकती. ताइवान चीन का अभिन्न हिस्सा है, जहां पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना ही एकमात्र क़ानूनी सरकार है. इस एक-चीन सिद्धांत के बारे में चीन-अमेरिका और चीन-जापान के राजनयिक संबंधों के समय ही साफ़ किया जा चुका है.
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ताइवान खाड़ी में तनाव का मूल कारण ताइवान के अधिकारियों का एक-चीन सिद्धांत को मान्यता देने से इनकार करना है. कुछ बाहरी ताकतों ने "ताइवान की स्वतंत्रता" के लिए अलगाववादी ताकतों को बढ़ावा दिया है. यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी मानदंडों का गंभीर उल्लंघन है और ताइवान खाड़ी में शांति और स्थिरता को गंभीर ख़तरे में डालता है.
ताइवान का सवाल चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के मूल हितों से जुड़ा है.
यह पूरी तरह से चीन का आंतरिक मामला है, जिसमें किसी भी तरह के विदेशी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया जाएगा. इसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए चीनी नागरिक दृढ़ संकल्प हैं. हम पूरी ईमानदारी और हर प्रयास के साथ शांतिपूर्ण रियूनियन के लिए प्रयास करेंगे.
जिसका मतलब ये है कि हमारे पास विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप और मुट्ठी भर "ताइवान की स्वतंत्रता" की मांग करने वाले अलगाववादियों की गतिविधियों के जवाब में सभी ज़रूरी उपाय करने का विकल्प हैं.

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शिंजो आबे ने क्या लिखा था?
12 अप्रैल को शिंजो आबे ने अपने लेख में कहा था कि यूक्रेन पर रूस के आक्रमण ने कई लोगों को चीन और ताइवान के बीच बिगड़े हुए संबंधों की याद दिला दी है. लेकिन जहां यूक्रेन और ताइवान की स्थिति में तीन समानताएं हैं, वहीं कुछ असमानताएं भी हैं.
पहली समानता यह है कि ताइवान और चीन के बीच सैन्य शक्ति का बहुत बड़ा अंतर है. ताइवान के मुक़ाबले चीन की सेना कहीं ज़्यादा मज़बूत है. ठीक वैसे ही जैसे यूक्रेन और रूस के बीच सैन्य क्षमता में बड़ा अंतर है. यह अंतर हर साल बड़ा होता जा रहा है.
दूसरा, न तो यूक्रेन और न ही ताइवान के पास औपचारिक सैन्य सहयोगी हैं. दोनों देश अकेले ख़तरों या हमलों का सामना करने के लिए मजबूर हैं.
तीसरा, क्योंकि रूस और चीन दोनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी वीटो-पावर वाले सदस्य हैं इसलिए संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता पर उन संघर्षों के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता है, जिनमें वे शामिल हैं.

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यूक्रेन पर वर्तमान रूसी हमले के मामले में भी ऐसा ही हुआ है, और ताइवान पर भविष्य के किसी भी संकट में भी ऐसा ही होगा.
लेकिन ताइवान के आसपास के हालात और भी असहज करने वाले हैं.
ताइवान का कोई सहयोगी नहीं है लेकिन उसके पास ताइवान संबंध अधिनियम, 1979 का अमेरिकी क़ानून है. इसके मुताबिक़ अमेरिका को ताइवान को "आत्मरक्षा के लिए सक्षम बनाए रखने में आवश्यक सैन्य उपकरण की आपूर्ति करनी होगी."
अमेरिका खुलकर ताइवान पर अपना पक्ष साफ़ नहीं करता है ऐसे में ये क़ानून उसके लिए केवल ये कहने का रास्ता बनाता है कि अमेरिका हमले की सूरत में "ताइवान की रक्षा" करेगा, हालांकि ये व्यवस्था अब बदलनी चाहिए.
यूक्रेन पर रूस के हमले के जवाब में, अमेरिका ने जल्द ही साफ़ कर दिया था कि वह यूक्रेन की रक्षा के लिए वहां अपनी सेना नहीं भेजेगा. लेकिन जब ताइवान की बात आती है, तो अमेरिका ने रणनीतिक अस्पष्टता की नीति अपनाई है. यह स्पष्ट नहीं है कि ताइवान से जुड़े संकट में अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप करेगा या नहीं. ये यूक्रेन और ताइवान के संदर्भ में एक बड़ा अंतर है.
अमेरिका ताइवान पर हमले का जवाब देने के तरीके पर अपनी स्थिति को खुल कर नहीं बताता और इस पर असमंजस बना रहता है.

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ताइवान-चीन के बीच विवाद क्यों?
चीन मानता है कि ताइवान उसका एक प्रांत है, जो अंतत: एक दिन फिर से चीन का हिस्सा बन जाएगा.
दूसरी ओर, ताइवान ख़ुद को एक आज़ाद मुल्क मानता है. उसका अपना संविधान है और वहां लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार का शासन है. ताइवान दक्षिण पूर्वी चीन के तट से क़रीब 100 मील दूर स्थित एक द्वीप है.
यह 'पहली द्वीप श्रृंखला' में मौजूद है, जिसमें अमेरिका समर्थक कई देश स्थित हैं. अमेरिका की विदेश नीति के लिहाज़ से ये सभी द्वीप काफ़ी अहम हैं.
ताइवान और चीन के बीच अलगाव क़रीब दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हुआ. उस समय चीन की मुख्य भूमि में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का वहां की सत्ताधारी नेशनलिस्ट पार्टी (कुओमिंतांग) के साथ लड़ाई चल रही थी.
1949 में माओत्से तुंग के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी जीत गई और राजधानी बीजिंग पर क़ब्ज़ा कर लिया. उसके बाद, कुओमिंतांग के लोग मुख्य भूमि से भागकर दक्षिणी-पश्चिमी द्वीप ताइवान चले गए.
उसके बाद से अब तक कुओमिंतांग ताइवान की सबसे अहम पार्टी बनी हुई है. ताइवान के इतिहास में ज़्यादातर समय तक कुओमिंतांग पार्टी का ही शासन रहा है.
फ़िलहाल दुनिया के केवल 13 देश ताइवान को एक अलग और संप्रभु देश मानते हैं.चीन का दूसरे देशों पर ताइवान को मान्यता न देने के लिए काफ़ी कूटनीतिक दबाव रहता है.
चीन की ये भी कोशिश होती है कि दूसरे देश कुछ ऐसा न करे जिससे ताइवान को पहचान मिलती दिखे.
ताइवान के रक्षा मंत्री ने हाल में कहा था कि चीन के साथ उसके संबंध पिछले 40 सालों में सबसे ख़राब दौर से गुजर रहे हैं.
कुछ देशों ने ताइवान को संप्रभु राष्ट्र के तौर पर मान्यता दे रखी है. कई देशों के साथ ताइवान के अनाधिकारिक साझेदारी और समझौते हैं और अंतराष्ट्रीय मंचों पर वो नॉन स्टेट पक्ष की तरह रहता है.
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