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जम्मू-कश्मीर पर विवादित बयान के बाद चीनी विदेश मंत्री की भारत यात्रा के क्या मायने हैं
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"कश्मीर के मुद्दे पर हम कई इस्लामी दोस्तों की आवाज़ सुन रहे हैं, चीन की भी इसे लेकर यही इच्छा है. चीन कश्मीर समेत दूसरे विवादों के समाधान के लिए इस्लामी देशों के प्रयासों का समर्थन जारी रखेगा."
ये बात 23 मार्च को चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने इस्लामी सहयोग संगठन(ओआईसी) में कही. ओआईसी के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की 48वीं बैठक पाकिस्तान में हो रही थी.
वांग यी का ये बयान ऐसे समय में आया जब उनकी भारत यात्रा के बारे में भारत और चीन के बीच संपर्क हो रहा था. अब वांग यी पाकिस्तान से काबुल होते हुए भारत पहुंच गए हैं. मीडिया में ख़बरें हैं कि वो विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल से मिलने वाले हैं. हालांकि विदेश मंत्रालय या सरकार की तरफ़ से इस यात्रा पर अभी तक कुछ भी नहीं कहा गया है.
भारत ने पाकिस्तान में दिए चीन के इस बयान की आलोचना करते हुए कहा ''हम उद्घाटन समारोह (ओआईसी बैठक के) में चीनी विदेश मंत्री वांग यी के भाषण में भारत के अनावश्यक संदर्भ की आलोचना करते हैं. केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर से जुड़े मामले पूरी तरह भारत के आंतरिक मामले हैं. चीन समेत दुनिया के किसी देश का इस पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है''
तीखी आलोचना करते हुए भारत की तरफ़ से चीनी विदेश मंत्री का नाम लिया गया जो बताता है कि भारत इस मामले को लेकर सख़्ती अपना रहा है.
इस्लामी सहयोग संगठन में चीन के दिए इस बयान के क्या मायने हैं? क्या पाकिस्तान इस मंच से सदस्य देशों को भारत के ख़िलाफ़ एकजुट कर रहा है ? या फिर ये बयान सिर्फ़ एक रस्म अदायगी है जिसका भारत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है.
चीन के कश्मीर पर बयान के मायने
ये पहली बार नहीं है जब चीन ने भारत के आंतरिक मामलों में दखल देते हुए जम्मू-कश्मीर पर बयान दिया हो. साल 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने पर भी चीन ने भौंहे तान ली थीं. तब चीन ने अगल-अलग मंचों पर अपना विरोध दर्ज किया था.
'नेहरू, तिब्बत एंड चाइना' किताब के लेखक अवतार सिंह भसीन इसके पीछे की वजह बताते हैं कि चीन ने कभी भी जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं माना. भारत और उसके पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर सालों से लिखने वाले अवतार सिंह भसीन इसे समझाने के लिए इतिहास की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं का ज़िक्र करते हैं.
साल 1954 में तिब्बत को लेकर चीन और भारत के बीच एक समझौता हुआ था जिसे हम पंचशील समझौता भी कहते हैं. ये समझौता चीन के क्षेत्र तिब्बत और भारत के बीच आपसी संबंधों और व्यापार को लेकर हुआ था.
बीबीसी से बातचीत में अवतार सिंह भसीन कहते हैं, ''रूडडाक और रवांग पैसेज लद्दाख को तिब्बत से जोड़ते थे. भारत ने ड्राफ्ट एग्रीमेंट में ये लिखकर चीन को दिया था कि इन पैसेज से तिब्बत में तीर्थयात्रा और व्यापार जारी रहे, लेकिन चीन ने इसे मानने से मना कर दिया. चीन का कहना था कि जम्मू-कश्मीर विवादित क्षेत्र है. फ़ाइनल ऐग्रीमेंट में इसे शामिल नहीं किया गया'
ये पहली बार नहीं था जब चीन ने जम्मू-कश्मीर को भारत का हिस्सा मानने से इंकार किया हो. अवतार सिंह भसीन एक और घटना का ज़िक्र करते हैं. वे कहते हैं, ''1955 में कश्मीर राज्य के डिप्टी मंत्री कुशक बकुला तिब्बत जाना चाहते थे. भारत ने चीन को नोट भेजा कि उनके लिए मंत्री स्तर की आधिकारिक व्यवस्था की जाए. चीन ने ऐसा करने से मना कर दिया. चीन ने कहा कि उनके लिए वीवीआईपी व्यवस्था की जा सकती है लेकिन उन्हें मंत्री का दर्जा देकर व्यवस्था नहीं की जा सकती है.''
इसका मतलब था कि चीन कुशक बकुला को मंत्री का दर्जा देकर जम्मू-कश्मीर पर अपना मत नहीं बदलना चाहता था. यही वजह है कि चीन तमाम मंचों पर भारत की नज़र में जम्मू-कश्मीर पर विवादित बयान देता है.
ओआईसी में जम्मू-कश्मीर पर चीन के बयान की कुछ और वजहें भी हैं. बीबीसी से बातचीत में फ़ोर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में चीन मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद कहते हैं, ''क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाने के लिए भी अलग-अलग मंचों पर चीन इस तरह की बयानबाज़ी करता है, लेकिन उसका भारत पर कोई ख़ास प्रभाव नहीं पड़ता''
चीन के विदेश मंत्री की भारत यात्रा
दो साल पहले लद्दाख में कई जगह पर चीन के सैनिकों की घुसपैठ हुई थी. इसके बाद गलवान घाटी में चीन और भारत के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई थीं जिसमें 20 भारतीय जवानों की मौत हुई थी और कई चीनी सैनिक मारे गए थे. गलवान में हुई हिंसक झड़पों के बाद ये पहली बार है कि जब चीन का कोई वरिष्ठ नेता भारत की यात्रा कर रहा है.
सवाल ये है कि अगर ये यात्रा होनी थी तो फिर इससे ठीक पहले जम्मू-कश्मीर पर चीन ने आईओसी में बयान क्यों दिया ? क्या इस बयान का बातचीत पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा.
चीन मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद कहते हैं, ''चीन के विदेश मंत्री का भारत आना एक बड़ी बात है. हमें उस चश्मे से देखना चाहिए कि चीन इस बात को महत्व दे रहा है कि भारत एशिया में एक बड़ा प्लेयर है. पहले ऐसा कहा जाता था कि चीन मल्टी पोलर वर्ल्ड के बीच में यूनीपोलर एशिया चाहता है. लेकिन अब चीन को लगता है कि वो अकेले एशिया पर कायम नहीं हो सकता है. अगर एशिया को बड़े पावर के रूप में स्थापित करना है तो उसे भारत को साथ लेना होगा.''
जानकारों का कहना है कि चीन भारत की मदद से अमेरिका के ख़िलाफ़ भी मोर्चाबंदी करने की कोशिश में है. ऐसे में भारत का साथ मिलना चीन के लिए फ़ायदेमंद होगा. प्रोफ़ेसर फ़ैसल अहमद मानते हैं, ''रूस-यूक्रेन संकट में चीन को लग रहा है कि भारत अमेरिका से दूरी बना रहा है. ऐसी स्थिति में वो भारत के साथ अपने रिश्तों को सुधार सकता है और दोनों मिलकर एक बड़ी शक्ति के रूप में उभर सकते हैं.''
जम्मू-कश्मीर पर मुस्लिम देश क्या सोचते हैं?
इस्लामी सहयोग संगठन के मंच से हर साल जम्मू-कश्मीर को लेकर बयान दिए जाते हैं. पाकिस्तान इसमें मुख्य भूमिका निभाता है. पाकिस्तान ये दिखाने की कोशिश करता है कि जम्मू-कश्मीर पर उसे कितने इस्लामिक देशों का समर्थन हासिल है.
विदेशी मामलों के जानकार क़मर आग़ा का मानना है कि इस तरह के बयानों से पहले भारत को थोड़ी चिंता ज़रूर होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है. बीबीसी से बातचीत में क़मर आग़ा कहते हैं, ''सऊदी अरब, यूएई, क़तर जैसे मुस्लिम देशों के साथ भारत के संबंध बहुत अच्छे बन गए हैं. इन देशों के सबसे बड़े उच्च नागरिक सम्मान पीएम मोदी को मिल चुके हैं. ओआईसी में ज़रूर कश्मीर को लेकर बयान आते हैं, लेकिन भारत के साथ द्विपक्षीय बातचीत में कोई भी इस्लामिक देश इस मसले को नहीं उठाता, ना ही इसके समर्थन में कोई कैंपेन चलाता है.''
क़मर आग़ा की मानें तो इस्लामी सहयोग संगठन के मंच पर पाकिस्तान हमेशा कश्मीर मुद्दे को लेकर आता है, लेकिन हासिल कुछ नहीं होता.
साल 2020 में भी ओआईसी के काउंसिल ऑफ़ फ़ॉरेन मिनिस्टर्स यानी सीएफ़एम की बैठक में कश्मीर का ज़िक्र हुआ था. इस बैठक में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कश्मीर का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया था. उस समय भी पाकिस्तान को अरब देशों का साथ नहीं मिला था.
ओआईसी में पाकिस्तान की कितनी चलती है ?
ओआईसी इस्लामिक या मुस्लिम बहुल देशों का संगठन है. इसके कुल 57 देश सदस्य हैं. ओआईसी में सऊदी अरब और यूएई का दबदबा है. सऊदी अरब दुनिया के उन टॉप 10 देशों में भी शामिल नहीं है, जहाँ मुस्लिम आबादी सबसे ज़्यादा है. हालांकि इस्लाम के लिहाज़ से मक्का और मदीना के कारण सऊदी अरब काफ़ी अहम है.
जानकारों के मुताबिक़ पाकिस्तान के इन दोनों देशों से रिश्ते उतने अच्छे नहीं हैं. सऊदी अरब चाहता है कि पाकिस्तान उसके क़र्जों का भुगतान जल्दी करे. ख़ास करके तब से जब पाकिस्तानी पीएम इमरान ख़ान ने ओआईसी के समानांतर तुर्की, ईरान और मलेशिया के साथ मिलकर एक संगठन खड़ा करने की कोशिश की थी. 2020 में यूएई ने पाकिस्तानी नागरिकों के लिए नया वीज़ा जारी करने पर अस्थायी रूप से प्रतिबंध तक लगा दिया था.
अगर भारत की बात करें तो वो ओआईसी का सदस्य नहीं है बावजूद इसके कि भारत मुस्लिम आबादी के लिहाज़ से दुनिया के शीर्ष तीन देशों में शामिल है.
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