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पाकिस्तान-सऊदी अरब तनाव के पीछे 'कहानी सिर्फ़ कश्मीर की नहीं'
- Author, शुमाइला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
पिछले साल जब सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पाकिस्तान का दौरा किया, तो उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के अनुसार अगर वो पाकिस्तान से चुनाव लड़ते तो क़ामयाब हो जाते.
जब मोहम्मद बिन सलमान दौरे पर आए, तो उनकी ख़ूब आवभगत हुई और वो भी इसी गर्मजोशी के साथ मिले और पाकिस्तानियों को बताया कि वो उन्हें सऊदी अरब में अपना प्रतिनिधि समझें.
इस दौरे पर मुश्किल में घिरी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए 20 अरब डॉलर के समझौतों पर दस्तख़त हुए और ऐसा लगा कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के ऐतिहासिक रिश्तों को नया आयाम मिल गया है.
लगभग 18 महीने बाद पाँच अगस्त, 2020 को भारत प्रशासित कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म होने के एक साल पूरा होने पर पाकिस्तान जब प्रताड़ना दिवस मना रहा था तो उसके विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने एक निजी न्यूज़ चैनल एआरवाई पर एक प्रोग्राम में बात करते हुए पब्लिक प्लेटफॉर्म पर पहली बार सऊदी अरब की नीति पर खुल कर मायूसी ज़ाहिर की.
उन्होंने कहा, "सऊदी अरब और हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं. इज़्ज़त और मोहब्बत का रिश्ता है. पाकिस्तानी मक्का और मदीना की सुरक्षा के लिए जान देने को तैयार हैं. आज मैं उसी मित्र देश (सऊदी अरब) से कह रहा हूँ कि पाकिस्तान का मुसलमान और वो पाकिस्तानी जो आपके लिए लड़ने मरने के लिए तैयार हैं, आज वो आप से कह रहा है कि आप (कश्मीर के मामले पर) उस नेतृत्व की भूमिका निभाएँ, जो मुसलमान आपसे उम्मीद कर रहे हैं और अगर न किया तो मैं इमरान ख़ान से कहूंगा कि अब और इंतज़ार नहीं हो सकता. हमें आगे बढ़ना होगा. सऊदी अरब के साथ या उसके बिना."
पाकिस्तान के विदेश मंत्री की तरफ़ से खुले आम सऊदी अरब से शिकायत पर कूटनीतिक हलक़ों में तहलका मच गया.
इस बयान को न केवल सऊदी अरब में बल्कि पाकिस्तान में सऊदी समर्थक हलक़ों में भी नापसंद किया गया.
कुछ राजनीतिज्ञों, न्यूज़ एंकरों और धार्मिक संगठनों की तरफ़ से इसे विदेश मंत्री की निजी राय बताया गया तो कहीं इसे प्रधानमंत्री पर दूसरे फ़िरक़ों और लॉबी के प्रभाव का नतीजा कहा गया.
हालाँकि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि सऊदी अरब के साथ कोई मतभेद नहीं है और उनके साथ मज़बूत भाईचारे के संबंध बने हुए हैं.
उनका कहना था कि सभी देश अपनी विदेश नीति के अनुसार फ़ैसला करते हैं और सऊदी अरब की भी अपनी नीति है.
विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के इस बयान के बाद परदे के पीछे की कूटनीति हरकत में आ गई.
सऊदी राजदूत ने संपर्क करने शुरू कर दिए और सबसे अहम संपर्क पाकिस्तान की फ़ौज के प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा से हुआ, जिनसे कुछ दिन बाद सऊदी राजदूत नवाफ़ सईद-अल-मालिकी ने रावलपिंडी में पाकिस्तान के सेना मुख्यालय में मुलाक़ात की.
कुआलालंपुर का मामला
विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अपने बयान में इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी को भी आड़े हाथों लिया था, जिसके सबसे बड़े कर्ताधर्ता सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान हैं.
जबसे कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया गया है, पाकिस्तान लगातार इस मामले पर इस्लामिक देशों के संगठन के विदेश मंत्रियों का सत्र बुलाने की कोशिश कर रहा है लेकिन उसे अब तक इसमें क़ामयाबी नहीं मिल सकी.
शाह महमूद कुरैशी ने कहा, "मैं एक बार फिर ओआईसी से विनम्रतापूर्वक अनुरोध करूँगा कि अगर आप विदेश मंत्रियों की परिषद की बैठक नहीं बुला सकते हैं, तो मैं मजबूरन अपने प्रधानमंत्री से कहूँगा कि वो मुस्लिम देश जो कश्मीर के मुद्दे पर हमारे साथ खड़ा होना चाहते हैं और कश्मीर के पीड़ितों का साथ देना चाहते हैं, उनका सत्र बुला लें चाहे वो ओआईसी के फ़ोरम पर हों या न हों."
शाह महमूद कुरैशी का इशारा तुर्की और मलेशिया की तरफ़ था. दिसंबर 2019 में उस समय के मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद के बुलाने पर इमरान ख़ान कुआलालंपुर शिखर सम्मेलन में भाग लेने वाले थे.
इस सम्मेलन में तुर्की, इंडोनेशिया, क़तर और पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों के नेताओं को बुलाया गया था और ऐसा लग रहा था कि ओआईसी से हट कर एक विचार रखने वाले मुस्लिम देशों का एक नया मंच उभर रहा है. जिसमें सऊदी अरब का केंद्रीय स्थान नहीं होगा.
पाकिस्तान ने शुरुआत में तो इस नए प्लेटफॉर्म का समर्थन किया लेकिन फिर अचानक इमरान ख़ान ने बैठक में भाग लेने से मना कर दिया था.
ऐसा सऊदी अरब के दबाव में किया गया था, जो नहीं चाहता था कि पाकिस्तान जैसा महत्वपूर्ण मुस्लिम देश अपने राजनीतिक, राजनयिक और सैन्य ताक़त किसी और पलड़े में डाले.
शाह महमूद कुरैशी ने पुष्टि की कि कुआलालंपुर न जाने का 'इतना बड़ा फ़ैसला' पाकिस्तान ने सऊदी अरब के दबाव में आ कर किया.
"सऊदी अरब ने दबाव डाला और हमने बड़े बोझल दिल के साथ (मलेशिया को) समझाने की कोशिश की. मैं शुक्रिया कहना चाहता हूँ महातिर मोहम्मद को, जिन्होंने बुरा तक नहीं माना और उस समय भी वो हमारी मुश्किलों को और मजबूरियों को समझ गए."
शाह महमूद कुरैशी ने कहा कि समय आ गया है कि ओआईसी बीच बचाव और आँख मिचौली से बाहर निकले और ये फ़ैसला करे कि वो इस संवेदनशील मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देना चाहती है या नहीं.
'पाकिस्तान के लोग ओआईसी से उम्मीदें रखते हैं'
अगले दिन, पाकिस्तान विदेश मंत्रालय में साप्ताहिक ब्रीफिंग के दौरान, जब पत्रकारों ने विदेश मंत्री के बयान पर स्पष्टीकरण माँगा और पूछा कि क्या यह राजनयिक परंपरा के ख़िलाफ़ नहीं है, तो प्रवक्ता ने जहाँ पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक भाईचारे के संबंध का हवाला दिया और पूर्व में ओआईसी की भूमिका की तारीफ़ की, वहीं उन्होंने ये भी दोहराया--
"पाकिस्तान के लोग ओआईसी से उम्मीदें रखते हैं और वो चाहते हैं कि ओआईसी वैश्विक स्तर पर जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को उजागर करने के लिए अग्रणी भूमिका निभाए. हम इसके लिए कोशिश करना जारी रखेंगे और उम्मीद करते हैं कि इस संबंध में सकारात्मक कार्रवाई होगी."
पाकिस्तान के सूचना मंत्री शिबली फ़राज़ ने बीबीसी के साथ इंटरव्यू में विदेश मंत्री के बयान को उनका निजी बयान नहीं माना बल्कि कहा कि "अगर विदेश नीति का कोई मक़सद पूरा नहीं हो रहा हो तो ज़ाहिर है कि आपको अपनी रणनीति को बदलनी पड़ती है."
उन्होंने आगे कहा कि "कश्मीर के मामले में हमने देखा है कि कई देशों के राष्ट्रीय हित हमारे राष्ट्रीय हितों के अनुरूप नहीं हैं. ऐसी स्थिति में, आप ऐसे देशों का चुनाव करते हैं जिनके राष्ट्रीय हित आपके हितों से मेल रखते हों."
सऊदी अरब, भारत और अमरीका
विश्लेषक ग़ना मेहर कहती हैं कि कश्मीर के मामले पर सऊदी अरब और ख़ास तौर से मोहम्मद बिन सलमान का भारत और अमरीका की तरफ़ झुकाव स्पष्ट है और ये बिल्कुल भी हैरान करने वाली बात नहीं है.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "सऊदी अरब और भारत के बीच मज़बूत व्यापारिक संबंध हैं, बल्कि भारत के साथ पाकिस्तान की तुलना में सऊदी अरब का ज़्यादा व्यापार है."
"अब दुनिया मुस्लिम उम्मत और अन्य देशों के ब्लॉकों के बीच विभाजित नहीं है. ये ऐसी दुनिया है, जहाँ हर देश अपने राष्ट्रीय हित को देखते हुए नए गठबंधन और नीतियाँ बना रहे हैं."
उनका आगे कहना था कि "ऐसी स्थिति में, सऊदी अरब की मुस्लिम पहचान अब पवित्र स्थलों के संरक्षक होने की हद तक सीमित हो चुकी है. मोहम्मद बिन सलमान के शासन में अमरीका के साथ सऊदी अरब के रिश्ते और व्यापारिक हित उनकी विदेश नीति के प्रमुख स्तंभ हैं."
ग़ना मेहर कहती हैं कि पाकिस्तान को इस समय अपनी नीति पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि सऊदी अरब की वजह से पाकिस्तान ईरान जैसे अन्य देशों के साथ अपने संबंध बनाने पर तवज्जो नहीं दे सकता है.
ग़ना के अनुसार, पाकिस्तान को मध्य पूर्व की समस्याओं के बजाय अपने क्षेत्र में संबंध बेहतर बनाने के लिए कोशिश करनी चाहिए.
पाकिस्तान, चीन और ईरान
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच तनाव की सबसे बड़ी वजह कश्मीर के मुद्दे पर सऊदी अरब की तरफ़ से पाकिस्तान के पक्ष का खुल कर समर्थन न करना है.
हालाँकि, कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कहानी सिर्फ़ कश्मीर के बारे में नहीं है और दोनों देशों के बीच 'दूरियों' की एक वजह ईरान की चाबहार बंदरगाह को चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (CPEC) का हिस्सा बनवाने में पाकिस्तान की भूमिका भी है.
पहले चाबहार रेलवे परियोजना का निर्माण भारत के सहयोग से किया जा रहा था, लेकिन अब ईरान ने रक्षा और आर्थिक महत्व रखने वाली इस परियोजना से भारत को अलग कर दिया है.
अब चीन इस रेलवे प्रोजेक्ट में निवेश करेगा. पाकिस्तान समझता है कि ये उसकी सुरक्षा और क्षेत्र में उसके व्यापार और राजनीतिक हितों में अच्छा है.
विश्लेषक डॉक्टर रिज़वान नसीर ने इस बारे में कहा, "अगर पाकिस्तान ने कोशिश की है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर ईरान से जुड़ जाए और चाबहार बंदरगाह भी सी-पैक के दायरे में आ जाए, तो सऊदी अरब में इस पर प्रतिक्रिया ज़रूरी है. ईरान और सऊदी अरब वैचारिक विरोधी हैं और दोनों के बीच यमन से लेकर सीरिया तक कई प्रॉक्सी (अप्रत्यक्ष युद्ध) चल रहे हैं."
रिज़वान नसीर ने आगे कहा कि सऊदी अरब अमरीका का सहयोगी है और अमरीका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं तो इसलिए ऐसी कोई भी परियोजना जो ईरान को आर्थिक रूप से फ़ायदा पहुँचाती है या चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना को मज़बूत करती है, अमरीका भी इसे नापसंद ही करेगा.
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान ने यह क़दम सदभावना और अपने और क्षेत्र के हित में उठाया है, लेकिन सऊदी अरब और उसके सहयोगियों, अमरीका और भारत के लिए इसे बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल है."
"ख़ास तौर पर सऊदी अरब मानता है कि पाकिस्तान हमेशा उसके हितों को पहले रखेगा."
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यही वजह है कि सऊदी अरब ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए जो तीन अरब डॉलर दिए थे उनकी समय से पहले वापसी की माँग की है. इसमें से पाकिस्तान ने चीन की मदद से लगभग एक अरब डॉलर वापस भी किए हैं.
एक अरब डॉलर की समय से पहले वापसी के सवाल पर, सूचना मंत्री शिबली फ़राज़ ने बीबीसी को बताया, "बैंकों में पड़े पैसे तो कभी भी वापस हो सकते हैं. ये सामान्य बात है. हो सकता है कि उन्हें (यानी सऊदी अरब) को ख़ुद ज़रूरत हो. हमें सकारात्मक पक्ष पर नज़र रखनी चाहिए. अभी भी उन्होंने पूरे पैसे वापस नहीं लिए हैं. अभी भी हमारे बैंकों में उनका पैसा मौजूद है."
सेना की कूटनीति
सन 2018 में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को क़र्ज़ चुकाने और डिफ़ॉल्टर होने से बचाने के लिए 6.2 अरब डॉलर का क़र्ज़ दिया था.
कहा जाता है कि सेना के प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और हालिया तनाव के बाद भी, सेना ही इस मुद्दे को सुलझाने के लिए आगे आई है.
सऊदी राजदूत से मिलने के कुछ दिनों बाद जनरल बाजवा के सऊदी अरब के दौरे की ख़बरें सामने आई. पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल बाबर इफ़्तिख़ार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ये दौरा नियमित रक्षा सहयोग के लिए है और इसके बारे में ज़रूरत से ज़्यादा अटकलें लगाने की कोई ज़रूरत नहीं.
सैन्य प्रवक्ता ने ये भी कहा कि मुस्लिम दुनिया में सऊदी अरब की भूमिका पर किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए.
सेना के प्रवक्ता का कहना था, "पाकिस्तान और सऊदी अरब के लोगों का दिल एक साथ धड़कता है और इन संबंधों पर सवाल उठाने के लिए कोई गुंजाइश नहीं."
'आक्रामक नहीं सम्मानजनक रणनीति'
विश्लेषकों का कहना है कि मुसलमानों के सबसे पवित्र स्थल मक्का स्थित 'काबा' और मदीना की मस्जिद-ए-नबवी का संरक्षक होने की वजह से सऊदी अरब का पाकिस्तानियों के दिलों में एक विशेष स्थान है और पाकिस्तान की कमज़ोर अर्थव्यवस्था को सऊदी अरब ने हमेशा सहारा दिया है.
लेकिन यमन से लेकर सीरिया तक छद्म युद्ध में व्यस्त सऊदी अरब के लिए पाकिस्तान की रक्षा सहायता बहुत महत्वपूर्ण है.
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि सऊदी सरकार की ओर से गठित सैन्य गठबंधन के कमांडर के रूप में पूर्व पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहिल शरीफ़ की नियुक्ति इस रक्षा निर्भरता और विश्वास का एक बड़ा उदाहरण है.
विशेषज्ञों के अनुसार, यही वजह है कि पाक-सऊदी संबंधों में उभरते इस संकट पर क़ाबू पाने में जनरल बाजवा से बेहतर भूमिका कोई नहीं निभा सकता था.
उम्मीद की जा रही है कि जनरल बाजवा के दौरे से अस्थायी तौर पर कड़वाहट में कमी आएगी. कई सऊदी समर्थक हलक़ों ने शाह महमूद कुरैशी के बयान को ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बताया और उन्हें विदेश मंत्रालय से अलग करने की बात भी कही.
लेकिन क्या ये ज़बान से फिसले हुए जज़्बाती शब्द थे या फिर 'गुड कॉप और बैड कॉप' की रणनीति के तहत दिया गया एक सोचा समझा बयान था?
विश्लेषक डॉक्टर रिज़वान नसीर के अनुसार, "विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी एक अनुभवी राजनीतिज्ञ हैं. और उनका बयान, शब्दों का चुनाव और लहजा और यहाँ तक कि समय का चुनाव कुछ भी बेमक़सद नहीं बल्कि सब बहुत सोचा समझा था."
ग़ना मेहर कहती हैं, "पाकिस्तान के राजनेताओं, मदरसों, धार्मिक नेताओं और ख़ासकर वहाबी मुसलमानों पर सऊदी अरब का प्रभाव किसी से छिपा नहीं है."
ऐसे में वह सोचती हैं कि ये एक सोची समझी रणनीति थी, जो आक्रामक नहीं थी बल्कि सम्मान जनक थी.
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