यूक्रेन संकट: मिन्स्क समझौते की इतनी चर्चा क्यों, क्या ये यूक्रेन को रूसी हमले से बचा सकता है

रूस-यूक्रेन संकट चरम पर है. यूक्रेन पर रूसी हमले की भले ही आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ब्रिटेन ने कहा है कि ऐसा हो चुका है.

इस बीच, अमेरिका ने कहा है कि पुतिन ने मिन्स्क समझौते की धज्जियां उड़ा दी हैं. इससे पहले संयुक्त राष्ट्र की राजनीतिक मामलों की प्रमुख रोजमैरी ए. डिकार्लो ने कहा था कि रूस-यूक्रेन के मौजूदा विवाद को 2015 में हुए मिन्स्क समझौते के तहत सुलझाया जाना चाहिए.

यूक्रेन के दो पृथकतावादी क्षेत्रों दोनेत्स्क और लुहान्स्क को रूस की ओर से मान्यता दिए जाने के बाद पूरी दुनिया में मिन्स्क समझौते पर चर्चा शुरू हो गई है. आइए जानते हैं कि मिन्स्क समझौता क्या है और क्यों इसे मौजूदा रूस-यूक्रेन संकट के समाधान के तौर पर देखा जा रहा है?

क्या है मिन्स्क समझौता?

पूर्वी यूक्रेन में रूस समर्थक विद्रोहियों और यूक्रेन की सेना के बीच खूनी संघर्ष के बाद पहले 2014 में मिन्स्क-1 और 2015 में मिन्स्क-2 समझौता हुआ.

फ़रवरी 2015 में बेलारूस की राजधानी मिन्स्क में रूस, यूक्रेन, जर्मनी और फ़्रांस के नेताओं की मौजूदगी में यह समझौता हुआ. इसके तहत उन इलाकों में शांति बहाल करने के क़दम उठाए जाने थे जिन पर रूस समर्थक अलगाववादियों ने क़ब्ज़ा कर लिया था.

यूक्रेन के डोनबास इलाके में अलगाववादियों के क़ब्ज़े वाले इलाके क्रमश: लुहान्स्क पीपल्स रिपब्लिक और दोनेत्स्क पीपल्स रिपब्लिक के नाम से जाने जाने लगे. यूक्रेन सरकार का कहना था कि अलगाववादियों को भड़का कर रूस ने एक तरह से इन इलाकों पर क़ब्ज़ा कर लिया है.

समझौते की अहम बातें क्या हैं?

मिन्स्क-2 समझौते पर रूस, यूक्रेन, अलगाववादी नेताओं और ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड को-ऑपरेशन इन यूरोप (OSCE) ने हस्ताक्षर किए थे. इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लाकर मंज़ूरी दी गई थी.

11 फ़रवरी 2015 की रात को जब यह समझौता हो रहा था उस वक्त भी यूक्रेन की सेना और रूस समर्थक अलगाववादियों के बीच भारी लड़ाई चल रही थी. यूक्रेन को उससे ज़बर्दस्त नुक़सान हो रहा था.

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस समझौते के 11 बिंदु हैं:-

1. समझौते की पहली शर्त दोनों ओर से तुरंत युद्धविराम है.

2. इलाकों और रूस के बीच 50-50 किलोमीटर का बफ़र जोन बनेगा. यूक्रेन और रूस समर्थक अलगाववादी अपने-अपने भारी हथियारों को हटा लेंगे.

3. ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड को-ऑपरेशन इन यूरोप (OSCE) इसकी निगरानी करेगा.

4. सेनाओं की वापसी के पहले दिन से ही स्थानीय चुनाव कराने पर बातचीत शुरू हो जाएगी.

5. दोनेत्स्क और लुहान्स्क की लड़ाई में शामिल लड़ाकों को माफ़ कर दिया जाएगा.

6. बंधकों और ग़ैरक़ानूनी ढंग से बनाए गए क़ैदियों को रिहा कर दिया जाएगा.

7. दोनों देश एक-दूसरे की मानवीय सहायता करेंगे, जो अंतरराष्ट्रीय निगरानी में होगा.

8. प्रभावित इलाकों में सामाजिक और आर्थिक संबंध बहाल होंगे.

9. यूक्रेन अपने देश की सीमा पर नियंत्रण बहाल करेगा.

10. यूक्रेन से सभी हथियारबंद विदेशी लड़ाकों की वापसी होगी.

11. 2015 के अंत तक यूक्रेन में संवैधानिक सुधार होगा, नया संविधान लागू होगा.

समझौते के बाद क्या हुआ?

OSCE की निगरानी की वजह से लड़ाई रूक गई. हालांकि रुक-रुक कर युद्धिविराम के उल्लंघन होते रहे. हालांकि ये मामले ज़्यादा नहीं रहे. फिर भी दोनों ओर से संघर्ष की वजह से यूक्रेन में 14 हज़ार लोग मारे जा चुके थे और 15 लाख लोग विस्थापित हो गए थे.

समझौते के बावजूद संघर्ष क्यों?

दरअसल मिन्स्क समझौता बहुत जल्दबाज़ी में किया गया था. रूस ने इस पर दस्तख़त किए थे, लेकिन संघर्ष में इसकी भूमिका को रेखांकित नहीं किया गया था. समझौते के दस्तावेज़ में 'रूस' शब्द का ज़िक्र भी नहीं है.

रूस के मुताबिक़ 'वह सिर्फ़ इस समझौते का पर्यवेक्षक है. समझौता यूक्रेन की सरकार और यूक्रेन के पूर्वी इलाके के विद्रोहियों के बीच होना चाहिए.'

रूस ने यह तर्क उस हालात में दिए थे, जब इसके साफ़ सबूत थे कि वह अलगाववादियों की मदद कर रहा है. इस बीच, यूक्रेन ने भी अलगाववादियों से सीधे बातचीत से इनकार कर दिया है.

समझौते की भाषा स्पष्ट नहीं है. रूस और यूक्रेन इसकी अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं. यूक्रेन विद्रोहियों के इलाकों में चुनाव कराने से पहले ही अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अधिकार करना चाहता है. इसके साथ ही वह रूसी सेना की वापसी भी चाहता है. जबकि रूस का कहना है कि विद्रोहियों के क़ब्ज़े वाले इलाके में उसकी कोई सेना नहीं है.

रूस चाहता है कि यूक्रेनी सेना के सीमा पर क़ब्ज़े से पहले ही दोनेत्स्क और लुहान्स्क में चुनाव हो जाएं.

पश्चिमी देशों ने इस पेच को सुलझाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे.

फिर पुतिन के लिए मिन्स्क समझौते की इतनी अहमियत क्यों?

अगर रूस के नज़रिए से देखा जाए तो इससे वह डोनबास में अपने समर्थक विद्रोहियों के ज़रिए यूक्रेन पर प्रभाव बनाए रख सकता है.

इससे इस इलाके को मिलाए बग़ैर रूस इस पर क़ब्ज़ा बरकरार रख सकता है. इसके साथ ही यूक्रेन के मामलों में रूस का हस्तक्षेप भी बना रहेगा. रूस ने डोनबास के हज़ारों लोगों को अपने पासपोर्ट देकर इस मामले को और पेचीदा बना दिया है.

इसके ज़रिए वह यूक्रेन की संसद में अपने समर्थक नेताओं को बढ़ावा दे सकता है. यूक्रेन के नेटो में शामिल होने की प्रक्रिया में ये नेता अड़ंगा डाल सकते हैं. रूस की फ़िलहाल सबसे बड़ी मांग है कि रूस को नेटो की सदस्यता नहीं मिलनी चाहिए. यह मौजूदा तनाव की सबसे बड़ी वजह है.

मिन्स्क समझौते को लेकर अब भी इतनी उम्मीद क्यों?

फ़्रांस और अमेरिका दोनों ने कहा है कि इस समझौते से यह तनाव ख़त्म हो सकता है. भले ही इस समझौते में इस बात का स्पष्ट उल्लेख नहीं है कि यूक्रेन नेटो में शामिल होगा या नहीं, लेकिन माना जा रहा है कि यह समझौता मौजूदा तनाव को ख़त्म कर सकता है.

समझौते में यूक्रेन को अपनी सीमा पर नियंत्रण का अधिकार दिया गया है. अगर यह समझौता लागू होता है तो रूस का हमला टल सकता है. यूक्रेन में बड़ी तादाद में लोगों को लगता है कि मिन्स्क समझौता रूसी हमले से बचाने में मददगार साबित हो सकता है. लेकिन फ़िलहाल यह सूरत नहीं दिख रही है.

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