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यूक्रेन-रूस जंग की तबाही से बचने के लिए पांच संभावित तरीक़े
- Author, जेम्स लैंडेल
- पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता
क्या यूक्रेन संकट एक बड़ी जंग में तब्दील हो सकता है. यह आशंका ही सिहरन पैदा करने के लिए काफ़ी है. अगर रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो हज़ारों लोग मारे जाएंगे. उससे भी ज़्यादा लोगों को भाग कर जान बचानी होगी. बीबीसी के कूटनीतिक संवाददाता जेम्स लैंडेल के मुताबिक 5 ऐसे तरीके हैं, जिनसे इस तबाही से बचा जा सकता है.
जंग हुई तो इसके भयानक नतीजे होंगे. भारी आर्थिक नुकसान होगा. लोगों पर इसके घातक असर होंगे. इसके बावजूद रूस यूक्रेन को अपनी सेना से घेरता जा रहा है. दूसरी ओर पश्चिमी देश रूस को चेता रहे हैं कि अगर उसने यूक्रेन की सीमा की ओर एक क़दम भी और बढ़ाया तो उसे इसकी बड़ी क़ीमत चुकानी होगी.
लिहाजा इस संकट को टालने के लिए राजनयिक प्रयास तेज़ हो गए हैं. टकराव की जगह शांतिपूर्ण और स्थायी शांति के रास्ते तलाशे जा रहे हैं.
क्या है पुतिन की मंशा?
राजनयिक ''ऑफ़ रैंप'' की बात कर रहे हैं. यानी एक ऐसा तरीका ढूंढने की कोशिश हो रही है, जिसमें सभी पक्ष जंग के रास्ते से हट जाएं. लेकिन यह आसान नहीं है.
इस हालात में पश्चिमी देश रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन को यह समझा कर हमला रोक सकते हैं कि यूक्रेन संकट जंग की ओर बढ़ता है तो उसे फ़ायदे की तुलना में नुकसान ज़्यादा होगा.
उन्हें इस बात पर विचार करने के लिए बाध्य किया जा सकता है कि युद्ध हुआ तो इसकी आर्थिक कीमत बहुत अधिक होगी. भारी मानव त्रासदी झेलनी होगी. राजनयिक पलटवार भी बहुत जबरदस्त होगा. रूस के लिए यह सब झेलना आसान नहीं होगा. ऐसा हुआ तो जंग के मैदान में रूस की जीत भी बेमानी हो जाएगी.
पुतिन को इस बात का भी डर हो सकता है कि पश्चिमी देश यूक्रेन में सैन्य विद्रोह को समर्थन दे सकते हैं. ऐसे में उनके लिए वर्षों तक इस जंग की कीमत झेलना मुश्किल हो जाएगा.इससे अपने ही देश में पुतिन का समर्थन घट जाएगा. उनके नेतृत्व को चुनौती मिल सकती है.
हालांकि इस तबाही से बचने के तरीके भी मौजूद हैं.
1. रूस को राजनयिक जीत का श्रेय लेने दिया जाए
इन हालातों को देखते हुए पश्चिमी देश चाहेंगे कि रूस को अपनी राजनयिक जीत का श्रेय लेने दिया जाए. इन देशों को इस पर भी आपत्ति नहीं होगी की पुतिन ख़ुद को शांति का वाहक करार दें, जो नेटो के सैन्य उकसावे के बाद भी जंग नहीं चाहते हैं.
पुतिन यह भी दावा कर सकते हैं आखिर पश्चिमी देशों को उनकी बात सुननी पड़ी और वे रूस की 'वाजिब सुरक्षा चिंताओं' को समझने के लिए तैयार हैं. रूस उन्हें इस बात का अहसास कराएगा कि वह एक बहुत बड़ी सैन्य ताक़त है, जिसने बेलारूस में अपनी मौजूदगी और मजबूत कर रखी है.
अगर ऐसा हुआ तो यह कहा जा सकता है कि पुतिन नाकाम रहे हैं. उनके फैसलों ने पश्चिम देशों को नेटो के नेतृत्व में एक कर दिया है. नेटो रूस की सीमाओं को नजदीक आ गया और इसमें स्वीडन और फिनलैंड को शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहा है. यह कहना बड़ा आसान होगा.
लेकिन इस नज़रिए में एक बड़ी दिक्कत है. अगर पुतिन का इरादा यूक्रेन पर नियंत्रण करना और नेटो की ताक़त घटाना है तो फिर यह सोचना ग़लत होगा कि वह कमज़ोर पड़ गए हैं और पीछे हट रहे हैं.
अगर वह अपने इस मक़सद को हासिल ही करना चाहते हैं तो फिर पीछे क्यों हटेंगे.
2. बीच का रास्ता निकल सकता है
पश्चिमी ताक़तों ने यह साफ़ कर दिया है कि वे नेटो मूल सिद्धांतों पर कोई समझौता नहीं करेंगीं. जैसे कि यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा. उनका कहना है कि सदस्यता उन सभी देशों को लिए खुली है, जो नेटो में शामिल होना चाहे.
हालांकि अमेरिका और नेटो ने बीच का रास्ता भी सोचा हुआ है. बीच की ज़मीन यूरोप की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर खोजी जा सकती है.
इससे वक़्त के साथ छोड़ दिए गए हथियार नियंत्रण से जुड़े समझौते को दोबारा बहाल किया जा सकता है. इसके तहत दोनों ओर से मिसाइलों की संख्या घटाई जा सकती है ताकि रूस और नेटो की सेना के बीच आपसी भरोसा बन सके. सैन्य अभ्यासों पर पारदर्शिता बढ़े और एंटी सेटेलाइट हथियार टेस्टिंग पर भी सहयोग बन सके.
रूस पहले ही साफ़ कर चुका है कि ये मुद्दे उसकी सुरक्षा चिंताओं को मिटाने के लिए काफी नहीं है. वह रूस की सुरक्षा चिंताओं की कीमत पर यूक्रेन को नेटो में शामिल नहीं होने देना चाहता.
फिर अगर नेटो की मिसाइलों की तैनाती में एक हद तक कमी होती है तो वह रूस की सुरक्षा चिंताओं कुछ कम कर सकती है.
3. मिंस्क समझौते को पुनर्जीवित करने की रणनीति
कुछ हद तक रूस ने यहां बढ़त बना ली है. यूरोप अब रूस की शर्तों पर सुरक्षा वार्ता कर रहा है.
यूक्रेन, नेटो बनाम रूस का यह तनाव बेलारूस की राजधानी मिंस्क में हुए 2014 और 2015 के समझौतों को दोबारा जिंदा कर सकता है. ये समझौते यूक्रेन की सेना और रूस समर्थित विद्रोहियों के बीच लड़ाई खत्म करने के लिए हुए थे.
पश्चिमी देशों के नेता इस समझौते को दोबारा बहाल करना चाहते हैं ताकि शांति बनी रहे. लेकिन दिक्कत यह है कि यह समझौता जटिल और विवादित है.
रूस चाहता है कि यूक्रेन को स्थानीय चुनाव कराने चाहिए ताकि उसका समर्थन कर रहे राजनीतिक नेता मजबूत हो सकें. जबकि यूक्रेन का कहना है कि रूस विद्रोही लड़ाकों को हटाए और उन्हें हथियार देना बंद करे.
सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर है कि यूक्रेन डोनबास में अलग हुए एनक्लेव को किस हद तक स्वायत्तता देगा. यूक्रेन ने बहुत कम स्वायत्तता के संकेत दिए हैं. रूस इस पर राजी नहीं है. उसका कहना है कि दोन्तस्क और लुहांस्क को यूक्रेन की विदेशी नीति के मामले में ज्यादा अधिकार मिलना चाहिए. उनके पास नेटो सदस्यता के मामले में वीटो होना चाहिए.
और यही यूक्रेन का सबसे बड़ा डर है. अगर यह समझौता पुनर्जीवित हुआ नेटो में यूक्रेन को एंट्री में नहीं मिलेगी. भले ही इसके नेता नेटो यूक्रेन को शामिल करने में राज़ी क्यों न हो. इसलिए यूक्रेन में इस समझौते को दोबारा ज़िंदा करने के प्रति समर्थन मिलना मुश्किल है.
4. क्या यूक्रेन फिनलैंड की तरह निष्पक्ष हो सकता है?
क्या यूक्रेन पर यह दबाव डाला जा सकता है कि वह निष्पक्ष रवैया अपना ले.
ऐसे ख़बरें थीं (हालांकि इनका बाद में खंडन हो गया) कि फ्रांस के अधिकारियों ने यूक्रेन को फिनलैंड का मॉडल अपनाने को कहा है.
फिनलैंड ने शीतयुद्ध के दौरान औपचारिक तौर पर निष्पक्ष रवैया अपना रखा था. वह स्वतंत्र, संप्रभु और लोकतंत्र देश बना रहा. फिनलैंड हमेशा नेटो से बाहर रहा.
क्या यूक्रेन के लिए भी यह संभव है? यूक्रेन किसी भी सैन्य टकराव से बचना चाहेगा. सैद्धांतिक तौर पर इससे रूस के मन की यह मुराद पूरी हो सकती है कि यूक्रेन नेटो में शामिल नहीं हो जा रहा है.
लेकिन क्या यूक्रेन ऐसा चाहेगा. शायद नहीं, क्योंकि निष्पक्षता से यूक्रेन पर रूस का असर बढ़ जाएगा.
इसलिए निष्पक्षता अपनाना मुश्किल है और क्या यूक्रेन के ऐसा करने के बाद रूस अपनी शर्तों पर कायम रहेगा?
यूक्रेन निष्पक्ष हुआ तो उसके लिए यूरोपीय संघ की सदस्यता और दूर हो जाएगी.
5. हर पक्ष को समझौता करना होगा
क्या यह टकराव लंबे समय तक बना रहेगा और आगे चल कर इसकी गर्माहट कम हो जाएगी?
रूस अपनी सेना को धीरे-धीरे बैरकों में भेज कर अपने अभियान को बंद करने का एलान कर सकता है. लेकिन इसके काफी सारे सैनिक साजोसामान पीछे रह जाएंगे.
रूस दोनबास में विद्रोहियों को समर्थन जारी रख सकता है. लिहाजा यूक्रेन की राजनीति और अर्थव्यवस्था को रूस से अस्थिरता का खतरा बना रहेगा, जबकि पश्चिमी देश पूर्वी यूरोप में नेटो को मजबूत बनाए रखना चाहेंगे. नेटो को नेता और राजनयिक अपने रूसी समकक्षों से बराबर बात करते रहेंगे. हालांकि अब तक जो बातचीत हुई उसका कोई ख़ास असर नहीं हुआ है.
यूक्रेन आगे भी इस तरह के हालात से जूझता रह सकता है. लेकिन यह स्थिति पूरी तरह जंग में तब्दील नहीं होगी.
धीरे-धीरे यह टकराव सुर्खियों से हट जाएगा. रूस-यूक्रेन सीमा पर यह गर्माहट ठंडी पड़ जाएगी. यह भी उन टकरावों की सूची में शामिल हो जाएगी, जो लोगों की याददाश्त से गायब हो चुकी हैं.
लेकिन यह भी सच है कि यह इतना आसान नहीं है. इस स्थिति के लिए हर पक्ष को समझौता करना होगा.
बातचीत ने जगा रखी है उम्मीद
यूक्रेन में लोगों के बीच इस बात का डर है कि उनके देश को सबसे ज़्यादा समझौता करना पड़ सकता है. लोग सोच रहे हैं क्या इस भयावह ख़तरा सच साबित हो सकता है. अगर यह सच साबित हुआ तो इसे टालने के लिए क्या किया जा सकता है.
इस वक़्त एक ही उम्मीद बची है. वह यहै कि सभी पक्ष बातचीत के लिए राज़ी दिखते हैं. भले ही शुरुआती बातचीत से कोई नतीजा न निकला हो. सभी पक्ष जितनी अधिक बात करेंगे इस समस्या का राजनीतिक समाधान निकलने की संभावना भी उतनी ही मजबूत बनी रहेगी. भले ही अभी उम्मीदें थोड़ी ही नज़र आ रही हों.
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