फ़ेसबुक के शेयरों में ऐतिहासिक गिरावट, क्या ये मेटा के पतन की शुरुआत है

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सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म 'फ़ेसबुक' शुक्रवार को 18 साल का हो गया. इसकी स्थापना 4 फ़रवरी, 2004 को हुई थी. कंपनी के 18 सालों के इतिहास में इसके यूज़र्स की संख्या पहली बार घटी है.
फ़ेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा नेटवर्क्स (पहले इसे भी फ़ेसबुक के नाम से जानते थे) ने बताया कि 2021 के आख़िरी तिमाही में फ़ेसबुक के रोज़ाना एक्टिव यूज़र्स की संख्या तीसरी तिमाही के 193 करोड़ से घटकर 192.9 करोड़ हो गई.
हालांकि फ़ेसबुक के कुल यूज़र्स की संख्या देखेंगें तो 10 लाख की गिरावट बेहद मामूली है. अहम बात यह है कि पिछले 18 साल में पहली बार इसके यूज़र्स की संख्या अब गिरनी शुरू हो गई है.
यह ख़बर सामने आने के बाद अमेरिका के न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में गुरुवार को मेटा नेटवर्क्स के शेयरों में क़रीब 27 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज़ की गई. इसके चलते कंपनी का बाज़ार मूल्य क़रीब 237 अरब डॉलर घट गया.
अमेरिका में एक दिन में किसी भी कंपनी के शेयरों में इससे ज़्यादा गिरावट कभी नहीं देखी गई.
इस गिरावट का क्या है कारण?
मेटा के सीईओ मार्क ज़करबर्ग ने कहा कि उसके यूज़र्स ख़ासकर युवाओं के टिकटॉक और यूट्यूब की ओर जाने से कंपनी के 'सेल्स ग्रोथ' पर फ़र्क पड़ा है. साथ ही, विज्ञापन देने वाले भी अपनी लागत में कटौती कर रहे हैं.
कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी डेव वेनर ने बताया, ''हमारा मानना है कि प्रतिस्पर्द्धी सेवाओं का वृद्धि दर पर नकारात्मक असर हो रहा है, ख़ासकर युवा दर्शकों पर.''
इससे पहले पिछले साल अक्टूबर में फ़ेसबुक कंपनी ने अपना नाम बदलकर मेटा रखने का एलान किया था. मार्क ज़करबर्ग अब मेटावर्स टेक्नोलॉजी के विकास पर फ़ोकस करना चाहते हैं.

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टिकटॉक की ताक़त
गूगल के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े डिजिटल एडवर्टाइज़िंग प्लेटफ़ॉर्म मेटा ने कहा कि ऐपल के ऑपरेटिंग सिस्टम की प्राइवेसी सेटिंग्स में बदलाव होने का भी असर पड़ा है.
वेहनर ने बताया कि इस बदलाव से अब किसी भी ब्रांड के लिए फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम के यूज़र्स तक अपने विज्ञापन पहुंचाना और उसके बाद उसकी संख्या का पता लगाना बहुत कठिन हो गया है. उनके अनुसार, इससे इस साल क़रीब 10 अरब डॉलर का ऑर्डर प्रभावित हो सकता है.
मुख्यत: विज्ञापनों की ब्रिकी से मेटा की आय बढ़कर 33.67 अरब डॉलर हो गई है. यह उम्मीद से थोड़ी ही ज़्यादा है. वहीं कंपनी ने बताया है कि मौजूदा तिमाही में उसका राजस्व 27 से 29 अरब डॉलर के बीच रह सकता है, जो जानकारों के अनुमान से कम है.
उधर टिकटॉक ने सितंबर में बताया था कि दुनिया भर में उसके कुल 100 करोड़ एक्टिव यूज़र्स हो गए हैं. छोटे-छोटे वीडियो के लिए बनी यह वेबसाइट चीन की बाइटडांस कंपनी की है.
सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों की बात करें तो टिकटॉक के यूज़र्स की वृद्धि दर शानदार रही है. अब से चार साल पहले, जनवरी 2018 में टिकटॉक के यूज़र्स की संख्या महज़ 5.5 करोड़ थी. एक साल बाद उसके यूज़र्स बढ़कर क़रीब 27 करोड़ हो गए. और एक साल में यह संख्या 50.7 करोड़ तक पहुंच गई.
टिकटॉक से मुक़ाबले के लिए अब फ़ेसबुक और उसके सहयोगी प्लेटफ़ॉर्म इंस्टाग्राम ने भी शॉर्ट वीडियो बनाने पर निवेश करना शुरू कर दिया है. इस चलते भी कंपनी के मुनाफ़े पर असर पड़ा है.
ज़करबर्ग ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि वीडियो बनाने और वर्चुअल रियलिटि के विकास पर ध्यान केंद्रित करने के सकारात्मक नतीज़े उन्हें मिलेंगे.
कंपनी ने पहले मोबाइल एडवर्टाइज़िंग और इंस्टाग्राम स्टोरीज़ पर दांव लगा चुकी है. कंपनी ने तो 'इंस्टाग्राम रील्स' नाम का एक वीडियो फ़ीचर भी लॉन्च किया है.
लेकिन ज़करबर्ग का कहना है उनकी कंपनी टिकटॉक से प्रतिस्पर्द्धा करने की इच्छुक नहीं है. उनका मानना है कि हमारी टीमें शानदार प्रदर्शन कर रही है और वह प्रोडक्ट तेज़ी से तरक़्क़ी कर रहा है.

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क्या अब मेटा का पतन शुरू हो गया?
जेम्स क्लेटॉन का विश्लेषण, उत्तरी अमेरिका टेक्नोलॉजी संवाददाता
फ़ेसबुक हमेशा से तरक़्क़ी करने वाला प्लेटफ़ॉर्म रहा है. इसके तिमाही नतीज़े हमेशा एक ही दिशा में यानी बढ़ती ही रही है.
हालांकि बीते कुछ सालों में कंपनी का यूरोप और अमेरिका में विकास रुक गया था, लेकिन दुनिया के दूसरे हिस्सों में इसके यूज़र्स में हो रही वृद्धि के चलते इस पर लोगों का ध्यान नहीं गया था.
अब युवाओं में फ़ेसबुक उतना लोकप्रिय नहीं रह गया है, जितना पहले कभी था. अब तो कंपनी भी स्वीकार भी कर रही है कि टिकटॉक से उसके कारोबार पर फ़र्क पड़ रहा है. लेकिन दूसरे कारण भी हैं, जिसके चलते निवेशकों के बीच मेटा को लेकर चिंता है.
उन्होंने मेटावर्स पर फ़ोकस बढ़ाने के चलते अपना नाम बदल दिया. लेकिन यह कंपनी अपने ख़्वाब यानी मेटावर्स टेक्नोलॉजी के विकास से अभी कोसों दूर है.
इसके बावजूद, केवल मार्क ज़करबर्ग की सोच की वजह से इस तकनीक के विकास पर अरबों डॉलर का निवेश, एक बहुत बड़ा ख़तरा भी साबित हो सकता है.
मेटा की समस्या का एक तात्कालिक समाधान यही हो सकता है कि वो टिकटॉक को ख़रीद ले, लेकिन अमेरिका के कंपटीशन लॉ के चलते वहां के रेगुलेटर ऐसा होने नहीं देंगे.
अब तो सिलिकॉन वैली में कई लोग फ़ेसबुक को ज़हरीला ब्रांड तक मानने लगे हैं. इनका मानना है कि अब फ़ेसबुक में काम का माहौल वैसा नहीं है, जैसा 10 पहले हुआ करता था. इससे प्रतिभावान लोगों का कंपनी में जाना और टिकना कठिन हो गया है.
हो सकता है कि आने वाले वक़्त में मेटा को और भी बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़े. यह हो सकता है उनके मुसीबत भरे दिनों की केवल शुरुआत हो.
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