रूस के लिए इतना अहम क्यों है यूक्रेन- जानिए इसके तीन बड़े कारण

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- Author, एंजेल बरमुडेज़
- पदनाम, बीबीसी न्यूज मुंडो
कुछ इसे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सनक मानते हैं तो दूसरों का कहना है कि यह एक तरह से नए शीत युद्ध की तरफ़ बढ़ने का प्रयास है. रूस और यूक्रेन के बीच तनाव ने दुनिया भर के उन विदेश मंत्रालयों में बेचैनी पैदा कर दी है जो खुले तौर पर इन दो देशों के बीच संभावित युद्ध की बात कर रहे हैं.
यूक्रेन की सीमा पर रूस ने एक लाख से अधिक सैनिकों की तैनाती कर दी है, हालांकि अभी भी वो इस बात से इनकार कर रहा है कि उसकी योजना सैन्य हमले की है. लेकिन रूस ने नेटो को अपनी सुरक्षा मांगों की एक लिस्ट भेजी है.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 'नेटो पर क्षेत्रीय सुरक्षा को नज़रअंदाज़ करने का' खुलेआम आरोप लगाते हुए कहा कि दूसरी बातों के अलावा नेटो यूक्रेन और सोवियत संघ के पूर्व घटक दशों को इस संगठन का सदस्य बनने से रोके.
रूस ऐसा इसलिए चाहता है ताकि सोवियत संघ के विघटन के बाद से उस गठबंधन में शामिल होने वाले देशों के सैनिकों और उनसे मिलने वाले हथियारों की हद तय हो सके. इसके साथ ही उसने पूर्वी यूरोप के देशों में 1997 के बाद स्थापित बुनियादी ढांचे को भी हटाने की मांग की.
इंटरनेशनल फ़ॉरेनसाइट ऐंड एनालिसिस फ़र्म जियोपॉलिटिकल फ़्यूचर्स के संस्थापक जॉर्ज फ़्राइडमैन रूस की मांग को संक्षेप में बताते हैं, "वास्तव में वो ठीक वैसा ही चाहते हैं जैसा शीत युद्ध के दौरान पूर्वी यूरोप की सीमाएं थीं."
यूक्रेन पर रूस के ख़तरे को लेकर लगातार बोल रहे अमेरिका ने पूर्वी यूरोप में भेजने के लिए अपने 8,500 सैनिकों को अलर्ट पर रखा है, उसने काला सागर में अपने युद्ध पोत भेजे हैं. साथ ही उसने यूक्रेन की राजधानी कीव में अपने राजनयिकों के रिश्तेदारों को निकालने का आदेश भी दिया है.
इसके विपरीत, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने पश्चिमी देशों से अपील की है कि यूक्रेन की सीमा पर रूसी सैनिकों की मौजूदगी के बीच वे युद्ध को लेकर दहशत न पैदा करें. उन्होंने यह भी कहा है कि यह संकट क्राइमिया पर रूसी आक्रमण और पूर्वी यूक्रेन के डोनबास इलाके में रूसी समर्थकों के क़ब्ज़े के साथ शुरू हुआ था, जहां 2014 में क़रीब 14 हज़ार लोग मारे गए थे.
इसके बाद रूस के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाए गए थे और पश्चिम के साथ इसके अलगाव को और बल मिला था.
इन सब के बीच यह समझना ज़रूरी है कि आखिर रूस के लिए यूक्रेन इतना महत्वपूर्ण क्यों है. इसके पीछे तीन वजहें सबसे अहम हैं.

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1. सिक्योरिटी ज़ोन
वर्जीनिया में टेक यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल रिलेशन के प्रोफ़ेसर जेरॉल्ड टॉल कहते हैं, "जो नीति रूस अभी अपना रहा है वो इसलिए है कि वो अपने देश की सीमा के क़रीब एक ख़तरनाक सैन्य गठबंधन का प्लेटफ़ॉर्म बनते देख रहा है. वह यूक्रेन को नेटो सदस्य बनने से रोकने की पूरी कोशिश कर रहा है ताकि उसे उसके सदस्य देशों से मिसाइल और सैनिक न मिल सकें."
जियोपॉलिटल फ़्यूचर्स के जॉर्ज फ़्राइडमैन बताते हैं कि 1812 में नेपोलियन के आक्रमण के समय से ही यूक्रेन के इलाके ने रूस के लिए एक बफ़र ज़ोन के रूप में काम किया है.
वे कहते हैं, "यूक्रेन रूस की पश्चिमी सीमा पर है. जब उस पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पश्चिम से हमला हुआ था तब ये यूक्रेन का ही क्षेत्र था जहां से उसने अपनी रक्षा की थी. वहां से रूस की राजधानी मास्को 1,000 मील (यानी 1,600 किलोमीटर) है. अगर यूक्रेन नेटो के हाथों में चला जाता है तो मॉस्को महज़ 400 मील (640 किलोमीटर) दूर ही रह जाएगा. तो यूक्रेन वो सिक्युरिटी ज़ोन है जिसे वो हर हाल में अपना पास चाहते हैं क्योंकि इसने नेपोलियन के बाद से रूस को बचाया है."
टॉल इशारा करते हैं कि रूस में ये धारणा है कि वो दुश्मनों के एक गठबंधन से घिरा है, जो इस महाशक्ति के लिए चिंता का विषय है.

इस संकट की शुरुआत के बाद रूसी उप विदेश मंत्री ने 1962 के मिसाइल संकट का उल्लेख किया था, और बाद में रूस ने यह टिप्पणी भी की थी कि वो क्यूबा और वेनेज़ुएला में सैन्य बलों की तैनाती कर सकता है.
टॉल कहते हैं, "उन्होंने ऐसा इस बात पर ज़ोर डालने के लिए किया कि अमेरिका का अपना मुनरो डॉक्ट्रिन है, उसकी अपने देश के ईर्दगिर्द शुत्र ताक़तों की उपस्थिति को लेकर चिंताएं हैं, लिहाज़ा रूस का ऐसा कहना एक जायज़ बात है."
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2. ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध
12 जुलाई 2021 को यूक्रेन के साथ संबंधों पर अपने एक विस्तृत लेख में व्लादिमीर पुतिन ने लिखा कि उनका पड़ोसी देश एक ख़तरनाक खेल में पड़ रहा है, वो यूरोप और रूस के बीच एक बाधा बन रहा है.
पुतिन न केवल सुरक्षा और इस क्षेत्र की राजनीति की बात कर रहे थे बल्कि उनका इशारा यहां की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध की ओर भी था, जिससे रूस और यूक्रेन दोनों का संबंध है. उन्होंने इस पर विस्तार से लिखा.
राष्ट्रपति ने अन्य बातों के अलावा ये भी लिखा कि बेलारूस, रूस और यूक्रेन के पूर्वज एक समान थे. रूस और यूक्रेन के लोग एक समान हैं इस पर बहस के लिए उन्होंने कई ऐतिहासिक अहम बातों के बारे में लिखा.
टॉल बताते हैं कि उनके इस विचार में इतिहास, संस्कृति और पहचान को लेकर कई चीज़ें थीं.
वे कहते हैं कि रूस यूक्रेन को केवल एक अन्य देश के रूप में नहीं देखता है. उसका दृष्टिकोण यूक्रेन को बहु स्लाविक राष्ट्र मानता है. साथ ही वो इसे रूस का दिल भी मानता है. यूक्रेन को लेकर यह रूस का एक बहुत ही शक्तिशाली नज़रिया है जो उसकी मूल पहचान में निहित है.
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वे कहते हैं, "जब यूक्रेन एक देश के रूप में ख़ुद की पहचान रूस के विरोधी के रूप में करता है तो वहां (रूस में) बहुत तीव्र भावनाएं पैदा होती हैं. रूस में इसे लेकर बहुत गुस्सा और निराशा होती है, जैसा कि एक भाई के विश्वासघात करने से पैदा होती है."
जॉर्ज फ़्राइडमैन सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रूप से यूक्रेन के महत्व को नकारते हुए कहते हैं कि रूस की मुख्य चिंता उसकी अपनी भू-राजनीतिक स्थिति की वजह से है.
वे कहते हैं, "हां, वो इतिहास साझा करते हैं. ऐतिहासिक रूप से यूक्रेनियों पर रूसियों का अत्याचार रहा है. सोवियत संघ के दौर में वहां एक भयंकर अकाल पड़ा था तब लाखों की संख्या में लोगों की मौत हुई थी, और ये तब हुआ था जब रूस वहां उगाए जाने वाले अनाज को निर्यात करना चाहता था. ऐसे में रूसी और यूक्रेनी लोगों के बीच एकता की बात कोरी बकवास है."
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3. पुतिन की विरासत
यूरोपियन काउंसिल ऑन फ़ॉरेन अफ़ेयर्स के विश्लेषक कादरी लीक ने पिछले साल अपने एक इंटरव्यू में बीबीसी को बताया था कि यूक्रेन के मुद्दे पर रूसी राष्ट्रपति पुतिन की निजी भावनाएं जुड़ी हुई हैं. लीक ने कहा था कि शायद यही वजह है कि यूक्रेन पर, रूसी नीति कई बार तर्कसंगत नहीं लगती.जेरार्ड टॉल बताते हैं कि पुतिन ने यूक्रेन में कई बार रूस की हिमायत वाले नेताओं को सत्ता में लाने की कोशिशें की थीं, लेकिन वे असफल रहे.जेरार्ड टॉल कहते हैं, "एक आम तर्क ये है कि पुतिन अरसे से इस मुद्दे से जूझते रहे हैं और अब उन्हें लगता है कि ये अधूरा काम उनकी विरासत बन जाएगा इसलिए इसे हमेशा-हमेशा के लिए 'फ़िक्स' करना ज़रूरी है."

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उन्होंने कहा, "पुतिन का मानना है कि पश्चिमी देशों ने यूक्रेन को एक रूस विरोधी मंच बना दिया है और इस समस्या का हल ज़रूरी है."
लेकिन टॉल, कादरी लीक की तरह, यूक्रेन के संकट का एक जज़्बाती नज़रिए से विश्लेषण करना जोख़िम भरा मानते हैं.

वे कहते हैं, "बहुत से विशेषज्ञ यही करते हैं. मुझे लगता है कि ये एक ख़रनाक दृष्टिकोण है. ये नज़रिया सारे संकट को पुतिन की नाराज़गी और ग़ुस्से तक सीमित कर देता है. हम पुतिन को पागल समझने लगते हैं जो तर्कहीन फ़ैसले करत हैं. मुझे लगता है कि ये एक ग़लती है. पुतिन की भावनाएं वास्तविक हैं और रूस की भू-राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा हैं. इसलिए रूस के किसी भी नेता को इस समस्या से निपटना होगा."
जानकार ये भी मानते हैं कि पुतिन की नीतियों का उनके माज़ी में केजीबी का जासूस होने से कोई ताल्लुक़ नहीं है. ये ज़रूर है कि रूस में पुतिन से बाद का नेतृत्व बेशक इसे अलग दृष्टि से देखेगा.
लेकिन टॉल साफ़ कहते हैं कि ''यूक्रेन पर रूसी जज़्बात असली हैं और हम ये क़तई नहीं कह सकते हैं कि ये महज़ पुतिन के व्यक्तित्व का हिस्सा हैं.''
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