तालिबान की आपसी कलह आई सामने, क्या ये विरोधियों के लिए है मौक़ा?

    • Author, माजिद नुसरत
    • पदनाम, अफ़ग़ानिस्तान मामलों के जानकार, बीबीसी मॉनिटरिंग

अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी प्रांत फ़रयाब में हाल ही में पैदा हुई अशांति को दबाने में तालिबान क़ामयाब रहा. लेकिन इस असंतोष ने तालिबान के भीतर मौजूद जातीय और कबायली समूहों के उस मतभेद से पर्दा उठा दिया, जिसका फ़ायदा इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों के साथ ही हाल ही में गठित हुआ तालिबान विरोधी नेशनल रेज़िस्टन्स फ्रंट भी उठा सकता है.

इस साल जनवरी के मध्य में, तालिबान ने जानेमाने उज़्बेक कमांडर मख़दूम आलम को हिरासत में ले लिया था. इससे नाराज़ होकर उज़्बेक प्रदर्शनकारी और लड़ाके फ़रयाब प्रांत की राजधानी मायमाना की सड़कों पर उतर आए.

मख़दूम ने फ़रयाब, जोज़्जान और सर-ए-पोल जैसे उत्तरी प्रांतों में कई सालों तक तालिबानी बलों का नेतृत्व किया था.

तालिबान ने इन इलाकों में पश्तून से सैकड़ों अतिरिक्त सैनिकों को लाकर स्थिति पर काबू तो पा लिया लेकिन इससे पहले के दो दिन अराजकता भरे रहे. इन दो दिनों में पश्तून लड़ाकों को निहत्था कर दिया गया था. हिंसा की वजह से कई लोग मारे गए और कई घायल हुए.

तालिबान ने सर-ए-पोल में भी विशेष बलों के 2,500 सदस्यों को तैनात किया. इस प्रांत में भी ठीक ऐसी ही हिंसा और झड़पें शुरू होने की अफ़वाहें थीं.

बीते साल अगस्त के महीने में काबुल पर क़ब्ज़े के बाद तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में जिस प्रशासन का गठन किया, उसमें लगभग सभी सदस्य पश्तून थे. तालिबान के इस क़दम ने अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी इलाकों में मौजूद ग़ैर-पश्तून सहयोगियों को निराश किया.

नाराज़गी की वजह यह भी रही कि तालिबान के 85 हज़ार लड़ाकों की संख्या में पांचवां हिस्सा ग़ैर-पश्तूनों का है और बीते साल गर्मियों में उत्तरी क्षेत्र पर कब्ज़ा ज़माने में भी इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

अफ़ग़ानिस्तान की आबादी में लगभग 40 फ़ीसदी पश्तून हैं और दक्षिण में इनकी संख्या ज़्यादा है. वहीं, ताजिक और उज़्बेक देश के उत्तरी हिस्से में बहुसंख्यक हैं.

असंतोष से समर्थक न बन जाएं विरोधी

तालिबान प्रशासन के बारे में अभी तक यही पता था कि इसमें शामिल पश्तूनों के दो गुटों में मतभेद हैं. ख़ासतौर पर पूर्वी पश्तून (हक़्कानी) और उनके दक्षिणी प्रतिद्वंद्वी (कांधारी) के बीच. लेकिन फ़रयाब प्रांत में जो अशांति फैली उसने उत्तरी क्षेत्र में भी तालिबान प्रशासन की कमज़ोरियों को उजागर कर दिया.

मख़दूम की गिरफ़्तारी ने उज़्बेकों के मन में पश्तूनों की तुलना में भेदभाव की भावना को और बल दिया.

तालिबान यह समझाने की मशक़्कत करता रहा कि आख़िर उसने उज़्बेक कमांडर को क्यों गिरफ़्तार किया. स्थानीय मीडिया ने अपहरण सहित कई अस्पष्ट आरोपों का हवाला दिया, लेकिन ये सब विफल रहे.

इस मामले में जानेमाने यूट्यूबर रज़ाक ममुन की आयोजित एक परिचर्चा में उज़्बेक लेक्चरर तॉरडिकल मैमानगी ने कहा, "मख़दूम आलम की गिरफ़्तारी ने फरयाब के लोगों को विरोध जताने का मौक़ा दे दिया. आपने देखा कि सभी प्रदर्शनकारी चाहे महिला हों या पुरुष, तालिबान समर्थक नहीं थे. जब कोई मुद्दा जातीय हो जाता है तो विचारधारा, पार्टी की मान्यता और विश्वास प्रणाली अपना बल खो देती है."

तालिबान के अधिकारियों और समर्थकों ने इस अशांति को दबाया और इसकी निंदा की. लेकिन अधिकतर प्रमुख उज़्बेक और ताजिक तालिबान कमांडर और अधिकारियों ने इस मामले पर चुप्पी साधे रखी. केवल कुछ लोगों ने नपी-तुली प्रतिक्रियाएं दीं.

एक वीडियो बयान जारी कर उज़्बेक कमांडर ने कहा, "मेरे प्यारे हमवतनों...मैं, कारी सलाहुद्दीन अयूबी, अभी काबुल में हूं. मैंने फ़रयाब प्रांत की यात्रा नहीं की है और मुझे घात लगाकर मारे जाने की रिपोर्ट बेबुनियाद हैं. अफ़ग़ानिस्तान के दुश्मन लोगों के बीच डर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. मैं देशवासियों को भरोसा दिलाता हूं कि कोई दिक़्कत नहीं है. इस्लामिक अमीरात एक है और एकजुट है."

इससे पहले उत्तरी प्रांत में मौजूद सूत्रों के हवाले से 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने अपनी ख़बर में बताया था कि फ़रयाब में मध्यस्थता के लिए जाते समय कारी सलाहुद्दीन अयूबी पर दो बार घात लगाकर हमला किया गया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पश्तून तालिबान को डर था कि अयूबी विद्रोही गुट में शामिल हो जाएंगे.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि उनका एक बॉडीगार्ड इस हमले में मारा गया और कई घायल हो गए.

मख़दूम को हिरासत में लिए जाने के तुरंत बाद ही एक अन्य गैर-पश्तून कमांडर कारी वकील को गिरफ़्तार कर लिया गया था. हश्त-ए-सोभ अख़बार के मुताबिक कारी वकील जातीय ताजिक समुदाय से हैं.

उत्तरी क्षेत्र के सहयोगियों को 'कमज़ोर' करना चाहता है तालिबान

तालिबान अक्सर अपने सशस्त्र विरोधियों को जनता की नज़रों में गिराने के मक़सद से इस्लामिक स्टेट से जुड़ा हुआ, चोर या अपहरणकर्ता बनाकर पेश करता है.

फ़रयाब प्रांत में अशांति फैलने से पहले ही, सोशल मीडिया पर जानकार उत्तरी प्रांत में तालिबान के पश्तून और ग़ैर-पश्तून धड़ों में तनाव की चर्चा करते आ रहे हैं. हालांकि, अफ़ग़ानिस्तान का मीडिया तालिबान के बदले के डर से इस तरह की टिप्पणियां करने से बच रहा था.

जानेमाने पत्रकार ताजुदीन सोरॉश ने 9 दिसंबर को ट्वीट किया, "सूत्र बता रहे हैं कि फ़रयाब में उज़्बेकों और पश्तूनों के बीच दो फाड़ को देखते हुए, तालिबान की बदरी ब्रिगेड ने मख़दूम आलम के 70 करीबी उज़्बेकियों को इस्लामिक स्टेट से संबंधों के आरोप में कब्ज़े में ले लिया. इसकी वजह से उत्तरी क्षेत्र में तालिबान के पूर्व कमांडर (उज़्बेक) सलाहुद्दीन अयूबी फ़रयाब लौट आए हैं."

फ़रयाब के पूर्व गवर्नर नक़ीबुल्लाह फाइक़ ने कहा कि तालिबान उत्तरी क्षेत्र के कमांडरों की बढ़ती ताक़त से चिंतित है और इसलिए वह अफ़ग़ान सेना से बीते साल ज़ब्त किए गए हथियार न लौटाने जैसे आरोपों के सहारे उन्हें कमज़ोर करना चाहता है.

भविष्य में क्या हो सकता है?

भले ही तालिबान पश्चिमी देशों के सैन्यबलों पर अपनी जीत का ढिंढोरा पीटे या फिर यह दिखाने की कोशिश करे कि वह किसी भी तरह की बग़ावत का मुक़ाबला करने के लिए तैयार है, लेकिन फ़रयाब प्रांत की अशांति नस्लीय अल्पसंख्यकों के बीच मौजूद असंतोष को सामने ले आई है.

साथ ही यह भी आशंका है कि आने वाले समय में यह इतना बड़ा मसला बन सकता है कि तालिबान के भरोसेमंद माने जाने वाले ग़ैर-पश्तून दूसरी विचारधारा वाले गुटों में शामिल हो सकते हैं. इस मतभेद का फ़ायदा घरेलू और विदेशी विरोधी तत्व भी उठा सकते हैं.

अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़े के बाद से आईएस की स्थानीय शाखा इस्लामिक स्टेट खुरासन (आईएसकेपी) ने भी अपने छोटे-बड़े हमलों में इज़ाफा किया है. वहीं, अहमद मसूद की अगुवाई वाली नेशनल रेज़िस्टन्स फ़्रंट (एनआरएफ़) ने भी हाल ही में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ाई हैं. माना जा रहा है कि एनआरएफ़ आने वाले महीनों में बड़ी बग़ावत की तैयारियों में जुटा हुआ है.

ख़तरा भांपते हुए, तालिबान ने हिज़्ब उत-तहरीर और जमीयत-ए-इस्लाह जैसे सलाफ़ी मौलवियों और समूहों पर छोटी-मोटी कार्रवाई शुरू कर दी हैं. इन्हें ताजिकों और उज़्बेकों के बीच कुछ समर्थन भी हासिल है. हालांकि, ये दोनों समूह सशस्त्र गतिविधियों को अंजाम देने के लिए नहीं पहचाने जाते लेकिन तालिबान इन्हें आईएस के लिए लड़ाकों की भर्ती करने वालों गुटों के तौर पर देखता है.

इस बीच कम-से-कम सैकड़ों की संख्या में इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ उज़्बेकिस्तान (आईएमयू) और अन्य मध्य एशियाई चरमपंथी उत्तरी क्षेत्र में शांत हैं. इन लड़ाकों के तालिबान से बीते कई सालों से रिश्ते ख़राब चल रहे हैं. आईएमयू के साथ तालिबान के संबंधों में खटास साल 2015 में आई थी, जब इस समूह ने आईएस के प्रति निष्ठा जताई थी.

दिसंबर के महीने में वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक ख़बर में बताया था कि "जब तालिबान के पास संसाधनों की कमी हुई तो अपने नियंत्रण को मज़बूत करने के लिए उसने पाकिस्तान से हज़ारों तालिबान लड़ाके और समर्थकों को अफ़ग़ानिस्तान बुलाया था."

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