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इमरान ख़ान के चीन दौरे से पहले ग्लोबल टाइम्स ने भारत के मुसलमानों का मुद्दा छेड़ा
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अगले महीने चीन के दौरे पर जाने वाले हैं. इमरान ख़ान बीजिंग में आयोजित विंटर ओलंपिक्स के उद्घाटन समारोह में शामिल होंगे.
बीजिंग में विंटर ओलंपिक्स चार से 20 फ़रवरी तक चलेगा. इसके बाद चार मार्च से 13 मार्च तक पैरालंपिक्स है. एक तरफ़ अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा ने बीजिंग विंटर ओलंपिक्स का राजनयिक तौर पर बहिष्कार किया है तो दूसरी तरफ़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान उद्घाटन समारोह में शरीक होने चीन जा रहे हैं.
पाकिस्तान को चीन का सदाबहार दोस्त माना जाता है. चीन ने पाकिस्तान में 'चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर' के तहत अरबों डॉलर का निवेश भी किया है.
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता असीम इफ़्तिख़ार ने पिछले हफ़्ते 14 जनवरी को साप्ताहिक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा था, ''चीनी नेतृत्व के आमंत्रण पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान तीन फ़रवरी को तीन दिवसीय दौरे पर चीन के लिए रवाना होंगे.''
14 फ़रवरी को पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने इमरान ख़ान के चीन दौरे की पुष्टि की थी और उसके चार दिन पहले यानी 10 जनवरी को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने भारत की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए दो ट्वीट किए थे.
इमरान ख़ान ने अपने ट्वीट में लिखा था, ''मोदी सरकार की अतिवादी विचारधारा के तहत भारत में सभी धार्मिक अल्पसंख्यक हिन्दुत्व समूहों के निशाने पर हैं. मोदी सरकार का अतिवादी एजेंडा एक सच्चाई है और यह इस इलाक़े की शांति के लिए ख़तरा है. अतिवादी हिन्दुत्व समूह ने दिसबंर में एक समारोह में अल्पसंख्यकों के जनसंहार की अपील की थी लेकिन मोदी सरकार की चुप्पी नहीं टूट रही है. ख़ास कर 20 करोड़ मुसलमानों के लिए यह सवाल है कि क्या बीजेपी इस अपील का समर्थन करती है. अब समय आ गया है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर कोई क़दम उठाए.''
इमरान ख़ान ने 19 और 20 दिसंबर को उत्तराखंड के हरिद्वार में आयोजित विवादित धर्म संसद में मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काऊ और हिंसक भाषण का हवाला देकर मोदी सरकार पर निशाना साधा था.
चीनी अख़बार और इमरान ख़ान
अब जब इमरान ख़ान के चीन दौरे में महज़ 14 दिनों का वक़्त बचा है तो चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना के मुखपत्र माने जाने वाले अंग्रेज़ी दैनिक ग्लोबल टाइम्स ने मंगलवार को एक लेख के ज़रिए इमरान ख़ान के सवालों को आगे बढ़ाया है.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि मुसलमानों, इसाइयों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों पर भारत में हिन्दू अतिवादियों के हमले बढ़े हैं लेकिन पश्चिम के आभिजात्यों को क्या इसकी चिंता है? ग्लोबल टाइम्स ने हरिद्वार की धर्म संसद का हवाला देते हुए लिखा है, ''भारत में पिछले महीने हुए दक्षिणपंथी हिन्दुओं के सम्मेलन का एक वीडियो यूट्यूब पर है. अतिवादी हिन्दू राष्ट्रवादी समूह हिन्दू महासभा की पूजा शकुन पांडे अपने समर्थकों से देश को बचाने के लिए मुसलमानों को मारने की अपील कर रही है. वह महिला कह रही है कि अगर हम में से 100 लोग भी 20 लाख लोगों को मारने को तैयार हैं तो हमारी जीत होगी और भारत को हिन्दू राष्ट्र बना सकेंगे. मारने और जेल जाने को तैयार रहो.''
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''पूजा पांडे कोई एकमात्र हिन्दू एक्टिविस्ट नहीं थी, जो सम्मेलन में मुसलमानों के जनसंहार की बात कर रही थी. मुसलमानों के प्रति शत्रुता और हिंसा बढ़ रही है और यह भारत में मुसलमानों के जनसंहार के संकेत हैं. मीडिया में इस बात पर बहस हो रही है कि भारत मुसलमानों के जनसंहार की ओर बढ़ रहा है या नहीं.''
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''भारत में मुसलमान दशकों से भेदभाव का सामना कर रहे हैं लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी की सरकार आने के बाद से हालात और बदतर हुए हैं.''
मोदी सरकार पर निशाना
ग्लोबल टाइम्स से शंघाई इंस्टिट्यूट फोर इंटरनेशनल स्टडीज़ में चाइना साउथ एशिया कॉर्पोरेशन के रिसर्च सेंटर के महाप्रबंधक लिउ चोंगयी ने कहा है, ''मोदी सरकार ने ऐसे कई क़दम उठाए, जिसे हिन्दू राष्ट्रवादियों की मांग के रूप में देखा जाता है. इनमें मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म करना और मुस्लिम विरोधी क़ानून नागरिकता संशोधन एक्ट बनाना शामिल हैं. एक महीने से भी कम वक़्त में भारत के पाँच राज्यों में चुनाव है और बीजेपी फिर से मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए मुस्लिम विरोधी भावना भड़का सकती है.''
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''इतना कुछ होने के बावजूद पश्चिमी देश, ख़ासकर अमेरिका जो मानवाधिकारों की रक्षा की वकालत करता है; वो भारत के मामले में चुप रहता है. यहाँ तक कि अमेरिका भारत के लोकतंत्र की तारीफ़ कर रहा है. दिसंबर, 2021 में अमेरिका की ओर से आयोजित कथित लोकतंत्र समिट में भारत को भी बुलाया गया था. जुलाई 2021 में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने कहा था कि भारतीय लोकतंत्र एक ताक़त है, जो मुक्त इंडो-पैसिफिक की रक्षा के लिए अच्छा है. अमेरिका के मार्को रुबियो और क्रिस स्मिथ जैसे नेता मुसलमानों की बात अक्सर करते हैं लेकिन भारत के मामले में उनके होंठ सिल जाते हैं.''
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि अमेरिकी नेताओं को पता है कि भारत में क्या हो रहा है लेकिन चीन के ख़िलाफ़ वे भारत को साझेदार के तौर पर देखते हैं. बाइडन प्रशासन मानवाधिकारों की बात ख़ूब करता है लेकिन भारत के मामले में चुप रहना ही ठीक समझता है.
इमरान ख़ान, चीन और मुसलमान
इमरान ख़ान भारत और पश्चिम में मुसलमानों के अधिकारों को लेकर बोलते रहते हैं लेकिन चीन में विगर मुसलमानों के मुद्दे पर ख़ामोश रहते हैं. पिछले साल जून में पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम परिवार की कनाडा में हत्या हो गई थी.
इसे लेकर इमरान ख़ान ने ट्वीट कर कहा था, ''पश्चिम के देशों में इस्लामोफ़ोबिया बढ़ रहा है. इस्लामोफ़ोबिया के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सोचने की ज़रूरत है.''
इमरान ख़ान के इस ट्वीट के जवाब में जाने-माने पत्रकार आतिश तासीर ने लिखा था, ''इस्लामोफ़ोबिया डरावना है. लेकिन चीन ने तो जनसंहार किया है. यह तो और ख़राब है. इसके ख़िलाफ़ आपने आख़िरी बार कब बोला?''
मार्च 2019 में फ़ाइनैंशियल टाइम्स की स्टेफनी फिन्डले को दिए एक इंटरव्यू में इमरान ख़ान ने कहा था कि उन्हें चीन में रहने वाले मुसलमानों के बारे में जानकारी नहीं है. स्टेफनी फिन्डले ने इमरान ख़ान से सवाल पूछा था कि वो चीन में रहने वाले वीगर मुसलमानों की स्थिति के बारे में क्या सोचते हैं. इसके उत्तर में इमरान ख़ान ने कहा, "सच कहूँ तो मुझे इसके बारे में अधिक जानकारी नहीं है."
उन्होंने माना था कि वो दुनिया के सभी मुसलमानों के पक्ष की बात करते हैं, लेकिन कहा था कि "मुस्लिम दुनिया अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है. अगर मुझे इसकी जानकारी होती तो मैं बात करता. इसकी ख़बरें अधिक नहीं छपतीं."
चीन ने अपने पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में अल्पसंख्यक वीगर मुसलमानों के लिए निगरानी बस्ती बना रखी है. बीते साल बीबीसी ने अपनी एक पड़ताल में ये पाया था. चीन ने पिछले कुछ सालों में ऐसी तमाम जेल सरीखी इमारतें शिनजियांग सूबे में बना डाली हैं. चीन ने इस बात से लगातार इनकार किया है कि उसने मुसलमानों को बिना मुक़दमा चलाए क़ैद कर के रखा है.
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक इसाइयों, हिन्दुओं, शिया मुसलमानों और हज़ारा समुदाय पर भी हमले होते रहते हैं. इन अल्पसंख्यकों पर हमले को लेकर भी इमरान ख़ान की सरकार पर सवाल उठते हैं कि वो सुन्नी कट्टरपंथ को लेकर सख़्त नहीं है.
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