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नेपाल-भारत सीमा विवाद: 'लिपुलेख में सड़क' बनाने के मोदी के एलान पर नेपाल सरकार चुप
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि नेपाल और भारत के बीच विवादित भूमि लिपुलेख में सड़कों को चौड़ा किया जाएगा. नेपाल के विदेश मंत्रालय ने अभी तक इस बयान पर औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है.
मानसरोवर और कैलाश तक भारतीय लोगों को पहुंचने में आसानी हो, इसके लिए भारत लिपुलेख में सड़क को चौड़ा करना चाहता है. लेकिन नेपाल इस इलाके पर अपना दावा करता रहा है.
हालांकि प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा अपनी भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच सीमा मुद्दों पर चर्चा करने वाले थे लेकिन ओमिक्रॉन संक्रमण बढ़ने के कारण उनकी यात्रा स्थगित कर दी गई है.
नेपाल के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता सेवा लमसाल ने कहा है कि नेपाल भारतीय प्रधानमंत्री के एलान पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा.
मोदी ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तराखंड के हल्द्वानी में पिछले दिनों अपनी रैली में कहा कि उनकी सरकार राज्य के लोगों के लाभ के लिए विकास कार्यों में तेजी ला रही है.
हल्द्वानी में 17,500 करोड़ रुपये से अधिक की 23 परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करते हुए मोदी ने कहा, "आपको सुख सुविधा से वंचित रखने वालों के कारण ही मानसरोवर का प्रवेश द्वार मानसखंड सड़क मार्ग से जुड़ने में वंचित रहा."
"हमने न केवल टनकपुर पिथौरागढ़ ऑल वेदर रोड पर काम किया. हमने लिपुलेख में एक सड़क भी बनाई है और आगे विस्तार का काम चल रहा है."
हालांकि, लिपुलेख को नेपाल अपना क्षेत्र बताता रहा है. मगर ये इलाक़ा लंबे समय से भारतीय सैन्य नियंत्रण में रहा है.
नेपाल के धारचुला के मुख्य ज़िला अधिकारी सिद्धराज जोशी ने कहा कि भारतीय पक्ष अभी भी लिपुलेख क्षेत्र में सड़क का विस्तार कर रहा है.
जोशी ने टेलीफोन पर बीबीसी को बताया, "पुरानी सड़क को नया बनाने के बजाय चौड़ा किया जा रहा है. यह अभी भी जारी है."
उन्होंने कहा कि सड़क विस्तार पर नेपाल की आपत्ति पर भारत की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.
लिपुलेख विवादों की एक श्रृंखला
9 अप्रैल, 2008 को भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा धारचुला-लिपुलेख लिंक रोड का उद्घाटन करने के बाद नेपाल ने विरोध किया था.
सड़क के उद्घाटन के तुरंत बाद, काठमांडू में भारतीय राजदूत को विदेश मंत्रालय में बुलाया गया था और एक राजनयिक नोट जारी किया गया था जिसमें भारत से नेपाली धरती पर किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं होने का आग्रह किया गया था.
जब विवाद सतह पर आया तो भारत ने जवाब दिया कि उसने नेपाली धरती पर सड़कें नहीं बनाई हैं.
लेकिन पीएम मोदी की ताज़ा टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि भारत ने इस क्षेत्र में सड़कों का निर्माण जारी रखा है.
इससे पहले भारत ने कालापानी समेत क्षेत्र को अपने नक्शे में शामिल करने के बाद भी नेपाल ने भारत को डिप्लोमैटिक नोट दिया था.
नेपाल ने भी अपना नक्शा अपडेट किया है और लिम्पियाधुरा सहित उन क्षेत्रों को शामिल किया है जो पहले छूट गए थे.
नेपाल द्वारा वार्ता के माध्यम से सीमा विवाद को हल करने की पेशकश के बाद, भारतीय पक्ष ने कहा था कि कोविड-19 के कारण संकट की स्थिति को हल करने के बाद विदेश सचिव के स्तर पर बातचीत की जाएगी.
भारत और चीन ने नेपाल की जानकारी के बिना लिपुलेख दर्रे को व्यापार मार्ग बनाने के लिए 2015 में एक समझौता किया था.
सहमति का विरोध करते हुए नेपाल ने तुरंत दोनों पड़ोसी देशों को राजनयिक नोट भेजे.
नेपाल का दावा
नेपाल दावा करता रहा है कि महाकाली नदी के पूर्वी हिस्से में लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख सहित सभी क्षेत्र 1816 की सुगौली संधि के आधार पर नेपाल के क्षेत्र का हिस्सा हैं.
भारत ने नेपाल और भारत के प्रबुद्ध लोगों के समूह ईपीजी द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को समझने के लिए तीन साल का समय नहीं दिया है. सुगौली की संधि सहित नेपाल-भारत संबंधों में आने वाली समस्याओं के समाधान के लिए सर्वसम्मति बनाने की कोशिश की जा रही है.
नेपाल-भारत सीमा विवाद पर दिल्ली द्वारा ठोस चर्चा करने में देरी करने का जिक्र करते हुए नेपाली विशेषज्ञों ने कहा है कि नेपाली प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान कालापानी विवाद को द्विपक्षीय चर्चा का विषय बनाया जाना चाहिए.
कुछ नेपाली राजनयिक याद करते हैं कि 1960 के दशक की शुरुआत में भारत-चीन युद्ध के बाद, नेपाल ने उत्तरी सीमा पर भारतीय चौकियों को हटाने के संबंध में कालापानी से सैनिकों को हटाने का मुद्दा भी उठाया था.
ये मुद्दा 1994 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी की भारत यात्रा और 1997 में उनके भारतीय समकक्ष आईके गुजराल की नेपाल यात्रा के दौरान उठाया गया था.
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