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हांगकांग के चुनाव इतने विवादित क्यों हैं?
चीन के व्यापक बदलाव लागू करने के बाद से हांगकांग में पहली बार विधान परिषद (लेजिस्लेटिव काउंसिल या लेगको) के लिए चुनाव हुए हैं.
चीन समर्थक उम्मीदवारों ने हांगकांग के विधान परिषद (लेगको) चुनाव में भारी जीत का दावा किया है. इस चुनाव में अब तक का सबसे कम मतदान हुआ है.
चीन के हांगकांग चुनाव प्रणाली में व्यापक बदलाव लागू करने के बाद ये पहला लेगको चुनाव है. इन बदलावों ने हांगकांग का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल कर रख दिया है.
सरकार का कहना है कि परिवर्तित मतदान व्यवस्था से सिर्फ़ 'राष्ट्रभक्त' लोगों को ही चुनाव में उम्मीदवार बनने का मौक़ा दिया जाएगा और ये लोग ही राजनीतिक सत्ता के पदों पर आसीन हो सकेंगे.
हालांकि आलोचकों का कहना है कि इस व्यवस्था ने शहर की लोकतांत्रिक आवाज़ का गला घोंट दिया है और जो भी बचाखुचा विपक्ष था वो अब समाप्त हो गया है.
हांगकांग पर शासन कैसे चलता है?
हांगकांग ब्रितानी शासन के अधीन था, लेकिन साल 1997 में इसे 'एक देश दो विधान' सिद्धांत के तहत चीन को सौंप दिया गया था.
इसका मतलब ये था कि हांगकांग में कुछ ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था और आज़ादी थी जो चीन के बाक़ी हिस्सों में नहीं थी.
इनमें से एक थी अपनी स्वयं की लघु संसद चुनने की आज़ादी. इसे ही लेजिस्लेटिव काउंसिल या लेगको कहा जाता है.
हांगकांग की विधान परिषद (लेगको) एक शक्तिशाली संस्था है जो ना सिर्फ़ हांगकांग के लिए क़ानून बनाती है बल्कि शहर का बजट और कर भी तय करती है.
हांगकांग में शीर्ष जजों की नियुक्ति और शहर के चीफ़ एग्ज़ीक्यूटिव ऑफ़िसर की नियुक्ती भी लेगको ही करती है.
आमतौर पर लेगको के सदस्यों का कार्यकाल चार साल का होता है, लेकिन बीते साल कोविड महामारी की वजह से चुनाव नहीं हो सका था और इस कारण कार्यकाल एक साल बढ़ गया था.
इससे पहले लेगको के सदस्यों को भौगोलिक सीटों के आधार पर चुना जाता था. यही नहीं कई दबाव समूह भी अपने प्रतिनिधि परिषद में भेजते थे.
चीन ने हांगकांग में क्या किया है?
इसी साल मार्च में चीन ने एक प्रस्ताव पारित किया था जिसके तहत 'देशभक्त ही हांगकांग की सत्ता चलाएंगे.' इस प्रस्ताव ने लेगको के मूल स्वरूप को ही बदल दिया है.
सबसे बड़ा बदलाव ये था कि चीन ने हांगकांग में सीधे तौर पर जनता द्वारा चुने जाने वाले प्रतिनिधियों की संख्या कम कर दी थी. पहले 50 फ़ीसदी सदस्यों का चुनाव सीधे मतदान से होता था. अब जनता सिर्फ़ 22 फ़ीसदी सदस्य ही चुन सकेगी.
अब सभी उम्मीदवारों को एक स्क्रीनिंग समिति से अनुमोदन लेना अनिवार्य कर दिया गया है. इससे चीन के आलोचकों की उम्मीदवारी ख़ारिज करना आसान हो गया है.
नए नियमों ने चुनाव समिति को भी अधिक शक्तियां दी हैं. इस अलग समूह में भी चीन समर्थित लोग ही हैं. आमतौर पर इस स्वतंत्र स्क्रीनिंग समिति का काम हांगकांग के सीईओ को चुनना था, अब पहली बार ऐसा होगा कि लेगको में भी इसकी सीटें होंगी.
साल 2019 में हुए लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों के बाद से ही चीन हांगकांग पर अपना नियंत्रण मज़बूत कर रहा है.
इन नए क़दमों से चीन ये सुनिश्ति कर रहा है कि सत्ता के हर स्तर पर उसके वफ़ादार लोग ही हों.
चीन ने विवादित राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून भी लागू कर दिया है जिसके बाद लोकतंत्र समर्थक लोगों को दंडित करना आसान हो गया है. हाल के महीनों में हांगकांग प्रशासन ने कई लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं को जेल में डाला है.
इस साल लेगको चुनाव कैसे हुआ?
कुल 90 सीटों पर मतदान हुआ है.
इनमें से सिर्फ़ बीस सीटों पर ही सीधे जनता प्रतिनिधियों को चुनेगी. ये भौगोलिक सीटें हैं.
इसके अलावा अन्य 40 सीटों को चुनाव समिति भरेगी. ये कुल सीटों के आधी के लगभग हैं.
बाकी बची 30 सीटों पर दबाव समूह अपने सदस्य भेजेंगे.
इनमें उद्योग, कारोबार और ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिनिधि शामिल हैं. आमतौर पर दबाव समूह भी चीन की तरफ़ ही झुके होते हैं.
इससे हांगकांग का राजनीतिक परिदृश्य कैसे बदलेगा?
आलोचकों का कहना है कि हांगकांग के लोकतांत्रिक संस्थानों और प्रक्रियाओं का क्षरण हो रहा है. वो इशारा करते हैं कि अब सि चुनिंदा लोकतंत्र समर्थक ही लेगको के लिए चुनाव में खड़े हो पा रहे हैं.
इनमें हाई प्रोफ़ाइल लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता जोशुआ वांग भी शामिल हैं जो इस समय जेल में हैं. जोशुआ वांग को इस साल चुनाव लड़ने के अयोग्य करार दिया गया है क्योंकि ये माना गया है कि वो हांगकांग की चीन से आज़ादी के लिए अभियान चला रहे हैं. उन्होंने नए राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून का भी विरोध किया है.
वहीं सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के प्रमुख लो किन हाए का कहना है कि पार्टी के लिए लेगको में जगह बनाना असंभव सा हो गया है. वो उम्मीदवारों के लिए पेश मुश्किलों और दबाव की तरफ़ इशारा कर रहे थे.
अन्य विपक्षी चेहरों ने या तो शहर छोड़ दिया है या वो राजनीति से अलग हो गए हैं.
इस बार लेगको के चुनाव में सिर्फ़ तीन उम्मीदवार ही ऐसे हैं जो अपने आप को लोकतंत्र समर्थक बता रहे हैं.
इसकी तुलना में पिछले चुनाव में लोकतंत्र समर्थक उम्मीदवारों ने 29 सीटें जीती थीं.
वहीं हांगकांग प्रशासन का तर्क है कि नए बदलावों से लोकतंत्र को कोई नुक़सान नहीं हुआ है बल्कि इससे चीन के प्रति वफ़ादारी मज़बूत हुई है.
लेकिन हांगकांग के बहुत से लोग इस तर्क से सहमत नहीं हैं. यही वजह है कि इस बार चुनावों को लेकर हांगकांग में कोई ख़ास उत्साह नहीं है.
हाल ही में हुए एक सर्वे में शामिल आधे से अधिक लोगों का कहना है कि वो चुनावों को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. ये 1991 के बाद से सबसे ख़राब संख्या है.
इस सर्वे में ये भी पता चला कि हांगकांग में राजनीतिक स्थिति को लेकर जनता की संतुष्टि पिछले दस सालों में सबसे कम स्तर पर है.
हांगकांग के बाहर रह रहे कई लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं ने लोगों से विरोध प्रकट करने के लिए खाली वोट डालने की अपील की है.
खाली वोट डालना तो ग़ैर क़ानूनी नहीं है, लेकिन दूसरे लोगों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करना नए राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून का उल्लंघन है. चुनाव का बहिष्कार करना भी अवैध है.
कई लोगों को इन आरोपों के तहत गिरफ़्तार किया गया है. इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने खाली वोट डालने के अपील को फ़ेसबुक पर शेयर किया था.
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