नरेंद्र मोदी और व्लादिमीर पुतिन की मुलाक़ात पर अमेरिका और चीन की भी नज़र, पर क्यों?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और रूस के बीच 20 साल से सालाना बैठक का सिलसिला एक छोटे से ब्रेक के बाद इस साल दोबारा शुरू हुआ है.
कोविड-19 महामारी की वजह से दोनों देशों के प्रमुख पिछले साल नहीं मिल पाए थे.
इस दौरान रक्षा के अलावा व्यापार और ऊर्जा क्षेत्रों में आपसी सहयोगी बढ़ाने को लेकर दोनों देशों के बीच चर्चा और समझौते हुए.
मोदी-पुतिन क्या बोले?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का सोमवार को स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, "इस साल शांति, दोस्ती और सहयोग की संधि के पांच दशक और रणनीतिक साझेदारी के दो दशक पूरे हो रहे हैं. साझेदारी में 20 वर्ष में जो उल्लेखनीय प्रगति हुई है, उसके मुख्य सूत्रधार आप (पुतिन) ही रहे हैं."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे कहा, "दुनिया में तमाम बदलाव के बीच भारत-रूस की मित्रता में निरंतरता रही. ये सचमुच इंटरस्टेट दोस्ती का एक यूनीक़ और विश्वस्त मॉडल है."
मोदी ने कोविड-19 महामारी के दौरान दोनों देशों के बीच सहयोग का ज़िक्र किया, "आर्थिक साझेदारी बढ़ाने की बात की और कहा, अनेक क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भारत और रूस का एक जैसा मत है."

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पुतिन ने भारत को एक 'ताक़तवर और मित्र देश' बताते हुआ कहा कि इस साल के शुरुआती नौ महीनों में दोनों देशों के बीच हुए ट्रेड में 38 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने कहा कि सैन्य समेत कई क्षेत्रों में दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं.
एके-203 असॉल्ट राइफ़ल पर क़रार
दोनों देशों के बीच हुए समझौतों में सबसे अहम माना जा रहा है एके-203 असॉल्ट राइफ़ल पर हुआ क़रार. इस क़रार के तहत साल 2021 से लेकर 2031 तक इंडो-रशियन राइफ़ल प्राइवेट लिमिटेड से तक़रीबन 6 लाख एके-203 राइफ़ल ख़रीदी जाएगी.
इस राइफ़ल की 600 राउंड प्रति मिनट फ़ायर करने की क्षमता है. सेना के साथ साथ अर्धसैनिक बल, पुलिस के ख़ास महमकों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा.
1990 के दशक में भारत में स्वदेशी असॉल्ट राइफ़ल इंसास बनाने की कोशिश की जिसे सेना ने इस्तेमाल लायक ना होने की वजह से ख़ारिज कर दिया था.
रूस की मदद से उत्तर प्रदेश के अमेठी में 2019 में ऑसल्ट राइफ़ल बनाने की फ़ैक्टरी लगी.

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ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका उदघाटन करने गए थे. ये रूस के साथ भारत का लाइसेंस बेस्ड क़रार है. लाइसेंस के आधार पर करार का मतलब ये कि सैन्य उपकरण बनाने का लाइसेंस विदेश कंपनी का है और उस विदेशी कंपनी ने भारत के साथ क़रार किया है जिस वजह से भारत में ये उत्पाद बना पा रहे हैं.
भारत और रूस के बीच क़रार में टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र और क़ीमतें तय करने की कुछ अड़चनों की वजह से अमेठी की फै़क्टरी में काम शुरू नहीं हो पाया था.

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लेकिन रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दौरे पर ये समझौता हो गया.
इसके अलावा S-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम की डिलिवरी भी एक से दो महीने में शुरू होने की बात कही जा रही है. S-400 रूस का बेहद आधुनिक मिसाइल सिस्टम है. इसकी तुलना अमेरिका के बेहतरीन एयर डिफ़ेंस सिस्टम पैट्रिअट मिसाइल से होती है.
S-400 की ख़रीद को भारत सरकार ने तीन दिन पहले ही 'संप्रभुता' से जोड़ कर बयान जारी किया था, जिसके बाद बाइडन प्रशासन की तरफ़ से कड़ी प्रतिक्रिया आई थी.
इस वजह से वैश्विक राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकार मानते हैं कि मोदी-पुतिन मुलाक़ात पर भारत और रूस से ज़्यादा अमेरिका और चीन की निगाहें होगी.
भारत और रूस के रक्षा क्षेत्र में संबंध
पुतिन के इस बार के दौरे की ख़ास बात ये है कि दोनों देशों के रक्षा और विदेश मंत्रियों ने अलग से बैठकें भी हुई, जिसे 2+2 डायलॉग कहा जाता है. इसका ज़िक्र प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया.
इससे पहले भारत इस तरह की 2+2 डायलॉग क्वॉड देशों (अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान) के साथ ही करता आया है. इस वजह से भी अमेरिका की भौंएं तनी हुई हैं.
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रक्षा मामलों के जानकार राहुल बेदी कहते हैं, "भारत और रूस के बीच रक्षा क्षेत्र में ताल्लुक़ात 1964 से चले आ रहे हैं. अब तक दोनों देशों के बीच तक़रीबन 300 बिलियन डॉलर का व्यापार हुआ है. पिछले छह दशकों में हवाई जहाज़ से लेकर फ़ाइटर एयरक्राफ़्ट, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ़्ट, टैंक, हेलीकाप्टर, आर्टिलरी, कॉम्बैट व्हीकल जैसे काफ़ी सैन्य सामान भारत ने रूस से ख़रीदे हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत रूस के साथ-साथ अमेरिका, फ़्रांस, इज़राइल से भी रक्षा क्षेत्र में क़रार कर रहा है."
इस वजह से रूस की आमदनी भारत से थोड़ी कम ज़रूर हुई है. लेकिन भारत का रक्षा ख़र्च बढ़ा ही है.
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की 2020 में जारी सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत सैन्य क्षेत्र में सबसे ज़्यादा ख़र्च करने वाला दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश हैं. अमेरिका इस सूची में पहले नंबर पर है और चीन दूसरे नंबर पर.
भारत ने साल 2019 में डिफ़ेंस क्षेत्र में 71 बिलियन डॉलर का ख़र्च किया था, जो साल 2018 के मुक़बले 6.8 फ़ीसदी ज़्यादा है.
साल 2019 में चीन ने डिफ़ेंस में 261 बिलियन डॉलर ख़र्च किया था और अमेरिका ने 732 बिलियन डॉलर ख़र्च किया था. अभी तक भारत सैन्य उत्पादों की सबसे ज़्यादा ख़रीदारी रूस से करता है. उसके बाद अमेरिका, इसराइल और फ़्रांस का नंबर आता है.
पिछले 10-15 सालों में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा व्यापार 2008 तक ना के बराबर था, जो 2019 में बढ़ कर 15 बिलियन डॉलर का हो गया था.

अमेरिका रूस की जगह लेना चाहता है?
तो क्या अमेरिका रक्षा सौदे में रूस की जगह जल्द ही ले लेगा?
इस पर राहुल बेदी कहते हैं, "आर्मी हो या फिर नेवी या एयरफ़ोर्स- भारत में तीनों सेनाएं रूसी सामान का ज़्यादातर इस्तेमाल कर रही हैं. फ़ाइटर एयरक्राफ्ट सुखोई रूसी है. टैंक और हेलीकॉप्टर भी ज़्यादातर रूसी हैं. भारत के 16 पनडुब्बियों में से 9 रूसी हैं. ये चीज़ें सालों साल चलती हैं. इन सभी की लाइफ़ आगे 15-20 सालों की और बची है. इस वजह से अमेरिका इतनी जल्दी रूस की जगह नहीं ले पाएगा."
भारत ने हाल ही में रक्षा क्षेत्र में विविधाता लाने के लिए अमेरिका से ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ़्ट और कॉम्बैट हेलीकॉप्टर ख़रीदा है, फ़्रांस से रफाल ख़रीदा है, इज़राइल से मिसाइल सिस्टम ख़रीदा है. रूस का काम पिछले कुछ सालों में भारत के साथ इस वजह से मंदा पड़ा है.

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अमेरिका और रूस की रक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा
तो क्या भारत और रूस की नज़दीकी केवल इस वजह से अमेरिका को खटकती है?
दरअसल 2014 में रूस के क्राइमिया को अपने में मिलाने के बाद और 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस के हस्तक्षेप करने के मामले में सज़ा देने के लिए 2017 में ट्रंप प्रशासन ने काउंटरिंग अमेरिकाज़ एडवर्सरीज़ थ्रू सैंक्शन ऐक्ट (CAATSA) पास किया गया था.
इसके तहत जो भी देश रूस से सैन्य उपकरण ख़रीदेगा, उस पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है. अब भारत ने भी रूस के साथ S400 की डील कर ली है.
हालांकि अमेरिका की तरफ़ से अभी तक ये स्पष्ट नहीं है कि वो किस तरह के प्रतिबंध भारत पर लगाएगा. ज़ाहिर है उनको भी पुतिन-मोदी मुलाक़ात का इंतज़ार है.

ग़ज़ाला वहाब 'फ़ोर्स' मैग़जीन की कार्यकारी संपादक हैं. बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं, "अमेरिका को रूस से बहुत दिक़्क़तें हैं. लेकिन भारत के संदर्भ में बात करें तो अमेरिका को परेशानी इस बात से है कि भारत रूस से ज़्यादा सैन्य सामान ख़रीद रहा है और अमेरिका से कम. अमेरिका और रूस रक्षा क्षेत्र में एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं."
वो आगे कहती हैं, "पिछले कुछ सालों में भारत और रूस के बीच कई रक्षा समझौते अटके पड़े हैं जबकि अमेरिका के साथ हुए ख़रीद की पेमेंट जाती रही. इस वजह से भारत के रक्षा बिल में अमेरिका की बढ़त देखी गई है."
तो क्या रूस और भारत के बीच एके-203 असॉल्ट राइफ़ल क़रार के बाद अमेरिका और भारत की तनातनी और बढ़ सकती है?
इस पर ग़ज़ाला कहती हैं, "इस राइफ़ल को ख़रीदने के लिए भारत सरकार ने कोई टेंडर नहीं निकाला था. ये क़रार 'मेक इन इंडिया' के तहत किया गया है और रूस से भारत इस राइफल को बनाने की तकनीक ले रहा है. राइफ़ल भारत में ही बनेगी. इस वजह से अमेरिका को इस क़रार से दिक़्क़त नहीं है."

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मोदी -पुतिन मुलाक़ात पर चीन की नज़र
जेएनयू के सेंटर फ़ॉर रशियन स्टडी में प्रोफ़ेसर संजय पांडे कहते हैं, "रूस और भारत के बीच एके-203 असॉल्ट राइफ़ल का समझौता इस बात का सबूत है कि दोनों देशों के बीच रक्षा और सामरिक रिश्ते मज़बूत थे और आगे भी रहेंगे. ये इसलिए भी जारी रहेगा क्योंकि दोनों देशों की वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर की चिंताएं एक समान हैं."
"चीन के साथ रूस के अच्छे संबंध हैं. रूस ये संबंध बनाए रखना भी चाहेगा. लेकिन साथ ही रूस ये नहीं चाहेगा कि चीन मध्य एशिया में या यूरेशिया में चीन का दबदबा ज़्यादा बढे़. इस वजह से भारत के साथ रूस भी संबंध बनाए रखना चाहता है."
रूस से दोस्ती के बावजूद चीन भी रूस की इस मानसिकता से वाक़िफ़ है. इस वजह से मोदी-पुतिन मुलाक़ात पर चीन की भी नज़र होगी.
हालांकि ग़ज़ाला कहती हैं, "अफ़ग़ानिस्तान के ताज़ा हालात को देखते हुए रूस की दोस्ती की भारत को फ़िलहाल ज़रूरत है, ताकि अफ़ग़ानिस्तान मसले पर भारत की पूछ बरक़रार रहे."
अफ़ग़ानिस्तान पर रूस में हुई बैठक में रूस ने बाद में भारत को शामिल भी किया था. भारत में अफ़ग़ानिस्तान मसले पर हुई बैठक में इसीलिए रूस शामिल भी हुआ था.
इतना ही नहीं चीन और भारत के बीच सीमा तनाव में भी रूस हमेशा से अच्छे मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है. ज़ाहिर है, कोई भी देश किसी की मदद तभी करेगा, जब किसी तरह का आर्थिक लाभ भी मिले. इस वजह से भारत रूस के साथ रक्षा क़रार आगे भी करेगा ताकि दोनों के बीच लेन-देन का सिलसिला बना रहे.
राहुल बेदी कहते हैं,"भारत के मुक़ाबले चीन रूस से कम रक्षा सामान ख़रीदता है. बल्कि उसे रिवर्स इंजीनियर करता है. वो एक दो सैम्पल लेता है, फिर उस पर काम करके उसे और बेहतर बना कर इस्तेमाल करता है. लेकिन दोनों देशों के बीच सीमा तनाव की वजह भारत रूस से क्या करार करता है, इस पर उसकी नज़र रहती ही है."
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