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सियालकोट ईशनिंदाः 'वर्कर एमडी से नाराज़ थे, पर कभी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा' - ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, फ़रहत जावेद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सियालकोट के वज़ीराबाद रोड पर ट्रैफ़िक अभी भी हमेशा की तरह चल रहा था, मगर यहां दुकानों में ख़ामोशी और माहौल में ख़ौफ के साये थे. उनके सामने राख का ढेर था जिसमें जले हुए कपड़े के टुकड़े और एक जोड़ी जूते थे.
पिछले शुक्रवार को लोगों की आंखों के सामने एक जीते-जागते इंसान को क़त्ल करके जला दिया गया था. उस इंसान का शरीर 99 फ़ीसदी जल चुका था और उसके पैरों के अलावा कोई हड्डी नहीं बची थी.
हमें नहीं पता कि ये जूते मारे गए श्रीलंकाई नागरिक प्रियंथा कुमार के थे या फिर उस गुस्साई भीड़ में शामिल किसी व्यक्ति के जो उनके शव को डंडों और जूतों से पीट रही थी.
ईशनिंदा का आरोप लगने के बाद पाकिस्तान में हत्या का यह पहला मामला नहीं है और यहां एक बड़े वर्ग को लगता है कि यह आख़िरी भी नहीं है.
जब मैं शनिवार को इस व्यस्त सड़क पर थी, तब भी यहां भीड़ थी. जब पत्रकार यहां आते हैं तो आसपास के लोग इकट्ठा हो जाते हैं. उनमें बच्चे और बुज़ुर्ग भी होते हैं.
लेकिन घटना के बारे में पूछे जाने पर वे कहने लगे, 'जो हुआ वह बुरा था', या 'हमें कुछ नहीं पता'.
फ़ैक्ट्री के सामने दुकानों और वर्कशॉप की कतार थी, और उनके पीछे घनी आबादी वाला इलाक़ा.
हमने साठ साल के एक दुकानदार से पूछा कि उन्होंने उस दिन क्या देखा और फ़ैक्ट्री के भीतर क्या हुआ था.
वो कहने लगे, "तब बाहर सब कुछ सामान्य था, जैसा कि हर दिन होता है. कोई हंगामा नहीं था. कुछ देर बाद शोर हुआ और कुछ लोग जमा होने लगे, फैक्ट्री के अंदर से भीड़ निकलने लगी. हमें लग रहा था कि फ़ैक्ट्री का अपना कोई मसला होगा. लेकिन भीड़ उत्तेजक हो गई थी, उसके साथ में लाठी डंडे थे और नारेबाज़ी हो रही थी. मैं दुकान बंद करके भाग गया. मुझे नहीं पता था कि हो क्या रहा है. मैं बस यही सोच रहा था कि अपने आपको और अपनी दुकान को बचाऊं."
इस सड़क पर छोटे-छोटे होटल भी थे जहां चाय मिलती थी और छोटी दुकानें भी. मैं यहां बैठे कुछ नौजवानों के पास गई और पूछा कि उस दिन क्या हुआ था.
पहले तो सबने इनकार करते हुए कहा कि हमने कुछ नहीं देखा, लेकिन फिर धीरे-धीरे वो समझाने लगे कि लोग कैसे जमा हो गए थे और अचानक सब कुछ रुक गया था.
चायवाला कारखाने के उन लोगों के बारे में बात करने लगा जो काम से छुट्टी के दौरान यहां चाय की दुकानों और होटलों में आते थे.
'फ़ैक्ट्री के कर्मचारी अपने अधिकारी से नाराज़ थे'
उसने कहा,"इनमें से कई कर्मचारी यहाँ आते थे. वो अपने साथियों से बात करते थे तो हमें भी सबकुछ सुनाई देता था. वो अक्सर कहते थे कि उनका एमडी एक सख़्त आदमी था. उन्हें अनुशासन की भी अधिक चिंता थी. यदि कोई कर्मचारी देर से काम पर आता था, तो वह उसे डांटते थे. ये सभी चीजें इन कर्मचारियों को पसंद नहीं थीं. इन कर्मचारियों को कठोरता पसंद नहीं थी और इसीलिए वो अक्सर अपने अधिकारी के प्रति नाराज़गी व्यक्त करते थे.
ये चायवाला कहता है, "हमने सारी बातें सुनी थीं लेकिन ये कभी नहीं सोचा था कि ऐसा होगा और उन्हें मार दिया जाएगा."
उसका कहना था कि उसने अपने जीवन में ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा था.
उसने कहा,"बहुत ख़ौफ़ है, हम यहां गली में ही रहते हैं. कल से कोई बाहर नहीं निकल रहा है. सब डर गए हैं कि क्या पता कब किसके साथ क्या हो जाए. ऐसा लग रहा है कि ये हम सबके लिए भी एक धमकी है. सुबह बाहर निकलकर देखा तो ये राख का ढेर पड़ा था. मैं रात को घर से बाहर सामान लेने निकला तो इस सड़क पर चलते हुए डर लग रहा था."
'छत पर सोलर पैनल के नीचे छुपे थे प्रियंथा'
पुलिस के मुताबिक जब फ़ैक्ट्री में ये बात फैल गई कि प्रियंथा कुमार पर ईशनिंदा का आरोप लगा है और भीड़ इकट्ठा हो रही है तो उनके कुछ साथी उन्हें बचाने के लिए छत पर ले गए और सोलर पैनल के पीछे छुपाने की कोशिश की.
एक वीडियो में देखा जा सकता है कि उनके सहयोगी मलिक अदनान उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन नारेबाज़ी कर रही गुस्साई भीड़ ने उनकी एक नहीं सुनी.
मलिक अदनान भी इस समय पुलिस सुरक्षा में हैं. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने उनके जज़्बे को सलाम करते हुए उन्हें बहादुरी का पुरस्कार तमग़ा-ए-शुजात देने की घोषणा की है.
ऊंची दीवारों के पहरे में खेल उपकरण बनाने वाली ये फ़ैक्ट्री शनिवार को भी बंद थी. बाहर पुलिस तैनात थी, अंदर जांच अधिकारी खोजबीन कर रहे थे.
फ़ैक्ट्री में जहां श्रीलंकाई नागरिक प्रियंथा कुमार के शव को घसीटा गया था, वहां ख़ून के निशान दिख रहे थे.
छत पर ख़ून के छींटे पड़े थे. प्रियंथा पर हमला यहीं शुरू हुआ था, सीढ़ियों पर घसीटे जाने के निशान थे, दीवारों पर ख़ून के धब्बे.
'उनके पास करने के लिए बहुत काम था'
प्रियंथा कुमार के साथियों का कहना है कि काम में लापरवाही उन्हें बेहद नापसंद थी. कारखाने के वरिष्ठ अधिकारियों में से एक ने कहा कि वे मिलनसार थे, और उन्हें काम करने का जुनून था.
एक अधिकारी ने कहा,"वह कई सालों से हमारे साथ काम कर रहे थे. इससे पहले वो टेक्सटाइल इंडस्ट्री से जुड़े रहे. वो हमारे प्रमुख कर्मचारियों में से एक थे."
यहां से हज़ारों किलोमीटर दूर श्रीलंका में उनकी पत्नी और दो बच्चों ने सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में यहां का पूरा मंज़र देखा है.
वो ये भी जानते हैं कि उनके पिता की पहचान यहां एक पेशेवर के तौर पर थी.
उनकी पत्नी कहती हैं,"मेरे पति बेगुनाह थे. मैंने समाचार में देखा कि उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई. मैंने इंटरनेट पर उन पर किया गया अमानवीय हमला देखा."
उन्होंने श्रीलंका और पाकिस्तान की सरकारों से घटना की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है ताकि उनके पति को इंसाफ़ मिल सके.
प्रियंता कुमार की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यह भी पता चला कि उनका शरीर 99 प्रतिशत जल चुका था, जबकि उनके शरीर में पैरों की हड्डियों के अलावा कोई हड्डी नहीं बची थी. रिपोर्ट के मुताबिक उनकी मौत ब्रेन इंजरी से हुई है.
पहले भी हुए हैं ऐसे हमले
पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोप में हत्या, विरोध और तोड़फोड़ का यह पहला मामला नहीं है.
अभी एक हफ्ते पहले ही ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के चारसद्दा इलाक़े में ग़ुस्साई भीड़ ने एक पुलिस थाने समेत कई सरकारी संपत्तियों में आग लगा दी थी.
वे मांग कर रहे थे कि पुलिस हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उस भीड़ को सौंप दिया जाए. इस व्यक्ति पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया था, ऐसा न करने पर थाने में आग लगा दी गई और इलाक़े में तनाव बढ़ गया.
कुछ साल पहले ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में ही ईशनिंदा के आरोप में यूनिवर्सिटी के एक हॉस्टल में भीड़ ने मशाल ख़ान की बेरहमी से हत्या कर दी थी.
पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोप में सैकड़ों लोग इस समय जेलों में बंद हैं.
इस संबंध में, देश में मौजूदा क़ानूनों के दुरुपयोग को स्वीकार किया जाता है, लेकिन इस क़ानून में संशोधन या परिवर्तन को एक संवेदनशील मुद्दा माना जाता है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विषय पर बात करना ही राजनीतिक आत्महत्या के समान है.
बीबीसी से बात करते हुए इस्लामिक आइडियोलॉजिकल काउंसिल के मौजूदा प्रमुख क़िबला अयाज़ ने कहा: "यह राष्ट्रीय और भावनात्मक परिदृश्य का हिस्सा बन गया है. इसमें बदलाव के लिए सरकार भी तैयार नहीं है. सरकार किसी भी बदलाव का जवाब देने के लिए तैयार नहीं है. जो भी हो रहा है वो इसके ग़लत इस्तेमाल की वजह से है."
सियालकोट में वज़ीराबाद रोड पर ज़्यादतर दुकानें बंद रहीं और जो खुली थीं उनमें ग्राहक नहीं थे.
उसी राख के ढेर के सामने कुछ लोग बेंचों पर बैठे थे. यहां कुछ पल के लिए गाड़ियाँ रुकतीं, फिर हॉर्न बजता और वे आगे बढ़ जातीं.
कुछ देर बाद एक व्यक्ति यहां आया. उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाला. इस जगह का वीडियो बनाया, सेल्फ़ी ली और चला गया.
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